शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 279, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वादश पटल ] [ २७६ इन्दुभ्यां विगलत्सुधापरिचित मन्त्रान्त्यबीज ततः । प्राच्ये तत्परमामृतार्द्रशशिना ससिक्तमाद्यं स्मरन् । मन्त्री मन्त्रमिमं जपेद्विषगदोन्मादापमृत्यज्वरान् । जित्वा वर्षशतं विशिष्टविभवोजीवेत्सुखं बन्धुभिः ।६१ व्याहृतित्रयमग्निः स्ताज्जातवेद इहावह । सर्वकर्माणि संभाष्य साधयाग्निप्रियां ततः ।६२ ताराद्योय मन्ः प्रोक्तः पञ्चविंशतिवर्णवान् । ऋिषिर्भृगुर्भवेच्छन्दो गायत्रं देवताऽनलः ।६३ एक सौ आठ बार मन्त्र का जाप करे और उस जल को सुधा से परिपूर्ण स्मरण करके जिसका उससे अभिषिंचन करे वह विगत आमय (रोग) वाला हो जाया करता है ।८६। मनुष्य आयु-आरोग्य और अमित विभवों को लाभ किया करता है। इसी विधान के करने से विष से आत्तं मानव निर्विष हो जाया करता है ।६०। इन्दुओं से गल कर गिरने वाली सुधा से परिचित फिर मन्त्र का अन्तिम बीज-प्राच्य में उस पर अमृत में आर्द्र चन्द्र से संसिक्त आद्य का स्मरण करता हुआ मन्त्रधारी इस मन्त्र का जप करे तो विषगद-उन्माद-अपामृत्यु- ज्वरों को जीतकर विशिष्ट वैभव वाला होते हुए बन्धुओं के साथ सुख पूर्वक सौ वर्ष तक जीवित रहा करता है ।६१। व्याहृतियों का जप और अग्नि फिर जात-वेद इहावह। इसके पीछे 'सर्व कर्माणि' यह कहे । फिर 'साधय, -यह पद कहकर स्वाहा' कहे । इसके आदि में प्रणव होता है-यह ऐसा मन्त्र कहा गया है जिसमें पच्चीस वर्ण होते हैं। इसका ऋषि भृगु-छन्द गायत्र और इसका देवता अनल कहा गया है ।६२-६३। विभक्तैः पञ्चभिः षड्भिश्चतुर्भि पञ्चभिस्त्रिभिः । द्वाभ्यामङ्गक्रिया प्रोक्ता वर्णै मूलमनोः क्रमात् ।६४ अं सामक्तसुवर्णमाल्यमरुणस्रक्चन्दनालङकृतं । ज्वालापुञ्जजटाकलापविलसन्मौलि सुशुल्कांशुकम् ।