शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 280, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें२८० ] [ श्रीशारदा तिलक शक्तिस्वस्तिकदर्भमुष्टिकजपस्रक्स्रुवाभीवरान् दोर्भिर्विभ्रतमञ्चितत्रिनयन रक्ताभमग्नि भजे ।६५ गुरोर्लब्धमनुर्मन्त्री चतुर्दश्यामुपोषितः । जपेद्भानुसहस्राणि शुद्धाचारोजितेन्द्रियः ।६६ अमावास्यादिने विप्रान् भोजयेन्मधुरोत्तरैः । भक्ष्यभोज्यैर्यथाशक्ति दद्यात्तेभ्योऽथदक्षिणाम् ।६७ भुक्त्वास्वयं समानीय होमद्रव्याणि शोधयेत् । अपरं दिनमारभ्यहोमं कुर्यादतन्द्रितः ।६८ मूल मंत्र के क्रम से विभक्त पाँच-छै-चार-पाँच-तीन- दो से अङ्ग क्रिया कही गयी है ।६४। अब ध्यान का क्रम कहा जाता है-असामक्त सुवर्णमाल्य से संयुत-अरुण सृक् और चन्दन से सम- लकृत ज्वाला के पुंज के सदृश जटाकलाप से शोभित मस्तक वाले शुक्ल वस्त्रधारी, करों, में शक्ति, स्वस्तिक, दर्भ मुष्टि, जप, माला- स्रुक्, स्रुव्, अभय और वरदानों को धारण किये हुए, तीन नेत्रों से आंचित-रक्त आभा वाले अग्नि देव का सेवन करता है ।६५। मंत्र के धारण करने वाला पुरुष गुरुदेव से मंत्र का लाभ करके चतुर्दशी में उपवास करे और शुद्ध आचार वाला तथा इन्द्रियों को जीतने वाला बारह सहस्र मंत्र का जप करे ।६६। अमावस्या के दिन में मधुरोत्तर भक्ष्यों तथा भोज्यों से विप्रों को भोजन करावे और अपनी शक्ति के अनुसार दक्षिणा देनी चाहिए ।६७। स्वयं भोजन करके होम द्रव्यों को लाकर शोधन करे । दूसरे दिन में अशन करके अतन्द्रित होकर होम करना चाहिये ।६८। क्रमाऽवटससिद्व्रीहितिलराजीहविर्घृतैः । प्रत्येकमष्टोत्तरशतं जुहुयाहिनशा सुधीः ।६६ दशाहमेवं निर्वर्त्य विधानेन विधानवित् । दत्त्वा पूर्णाहुतिं सम्यगेकादश्या द्विजोत्तमान् ।१००