भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 281, कुल 511 में से

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द्वादश पटल ] [ २८१ सम्पूज्य तर्पयेद्द्विजैर्यथा विभवमादरात् । गुरवे दक्षिणां दद्यादरुणां गां पयस्विनीम् ॥१०१ वासांसि धरधान्यानि दत्त्वा सम्प्रीणयेत्पुनः । स्वमण्डलान्तं प्रजयेत्पीठं सनवशक्तिकम् ॥१०२ पीता श्वेताऽरुणा कृष्णा धू म्रा तीव्रा स्फुलिङ्गिनी । रुचिरज्वालिनी प्रोक्ता कृशानोर्नव शक्तयः ॥१०३ सुधी पुरुष क्रम से वट की समिध!, व्रीहि, तिल, राजी, हवि, घृत से दिन में ही प्रत्येक का अष्टोत्तर शत होम करे ।६६। विधान के ज्ञाता को चाहिये कि विधि - विधान से दश दिन पर्यन्त इसको करके एकादशी में भलीभांति पूर्णाहुति देकर द्विजोत्तमो का पूजन करके श्रेष्ठ विप्रों को आदर से विभव के अनुसार तृप्त करना चाहिए ।१००। फिर अपने श्री गुरुदेव के लिए दक्षिणा तथा अरुण वर्ण वाली पयस्विनी गौ, वस्त्र, धनधान्य देकर उनकी प्रीणित करे । अपने मण्डल के अन्दर नौशक्तियों से समन्वित पीठ का अर्चन करना चाहिए ।१०१-१०२। अब उन नौ शक्तियों के कर्मोंका परिगणन किया जाता है-पीता, श्वेता, अरुणा, कृष्णों, धूम्रा, तीवा, स्फुलिङ्गिनी, रुचिर ज्वालिनी और कृशालु-ये नौ शक्तियाँ होती है ।१०३। स्वबीजेनासनं दद्यान्मूर्त्तिमूलेन कल्पयेत् । तत्र सम्पूजयेद्वह्निं विधिना प्रोक्तलक्षणम् ॥१०४ अङ्गपूजां पुरा कृत्वा मूर्तीरष्टौ दलष्विमाः । जातवेदा सप्तजिह्वाहव्यवाहनसंज्ञकः ॥१०५ अश्वोदरजसंज्ञोन्यः पुनवैश्वानराह्वयः । कौमारतेजाः स्याद्द्विश्वमुखोदेवमुखः परः ॥१०६ अर्च्यत्स्वस्तिकशक्तिभ्यां विराजितकराम्बुजाः । लोकेशानर्चयेद्वाह्ये वज्राद्यायुधसंयुतान् ॥१०७ इतित्सम्पूज्येग्नित्यं जपेन्मात्रं सहस्त्रकम् । जायते वत्सरादर्वाग्वनधान्यसमृद्धिमान् ॥१०८

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