भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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पृष्ठ 282

२८२ ] [ श्रीशारदा तिलक साज्यमन्नं प्रजुहुयाद्वत्सराल्लभते श्रियम् । कुसुमैर्ब्रह्मवृक्षस्य दधिक्षौध्रप्लुतैः ।१०६ करवीरप्रसूनैर्वा मण्डलात्स्यात्समृद्धिमान् । षण्मासं कपिलाज्येन जुहुयाद्वत्सरान्तरे ।११० तस्य संजायते लक्ष्मीः कीर्तिस्त्रैलोक्यवन्दिता। शालिभिर्जुहुयान्नित्यं विधिनाष्टोत्तरशतम् ।१११ अपने बीज के द्वारा आसन समर्पित करे और मूल मन्त्र से मूर्त्ति की कल्पना करनी चाहिए । इसके अनन्तर कहे हुए लक्षण वाले वह्नि का विधि के साथ पूजन करना चाहिये ।१०४। पहिले अङ्ग पूजा करके दलों में इस अष्ट मूर्तियों का यजन करे । जात वेदा-सप्तजिह्वा-हव्य वाहन-यशवीदरज-वैश्वानर-कौमार तेजा-विश्य मुख-देव मुख स्वस्तिक और शक्ति के सहित करों में अम्बुज रखे हुए अर्चन करना चाहिए । बाहिर में लोकेशों का जो वज्रायुधों के संयुत होवें अर्चन करे । इस प्रकार से नित्य ही एक सहस्र आठ बार पूजन करना चाहिए इसका यह प्रभाव है कि एक वर्ष के पहिले ही धन-धान्य की समृद्धि वाला हो जाता है ।१०५-१०८। आज्य के सहित अन्न का हवन करना चाहिए । इसमें एक वर्ष में श्री को लाभ क्रिया करता है। ब्रह्म वृक्ष के पुष्पों से जो दही और शहद और घृतसे आप्लुत करके होम करे अथवा करवीर के पुष्पों से होम करे तो मण्डल में समृद्धिमान् हो जाता है । छै मास तक कपिला गौ के घृत से होम करे तो वर्षके अन्दर ही उसको लक्ष्मी और त्रैलोक्य से वन्दित कीर्त्ति हो जाया करती है। शाली से नित्य विधि से एक सौ आठ बार हवन करना चाहिए ।१०६-१११। व्रीहिगोमहिषान्गाद्यैर्भवनां तस्य पूर्यते । तिलहोमेन महतीं लक्ष्मीमाप्नोति मानवः।११२ पलाशविल्वखदिरशमीदुग्धमहीरुहाम् । विकं'कताकारवधयोः समिद्भिः करवीरजैः । ११३