भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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द्वादश पटल ] [ २८३ प्रसूनैः कुमुदैः पद्मैः कह्लारैररुणोत्पलैः । जातीप्रसूनैर्दूर्वाभिर्नित्यमष्टोत्तरं शतम् । ११४। एकेन जुहुयान्मन्त्री प्रतिपत्स्वथ वा सुधीः । साधयेदखिलान्कामान् षण्मासान्नत्र संशयः । ११५ उत्तिष्ठ पुरुष ब्रूयाद्धरिपिङ्गलतत्परम् । लोहिताक्षरपदं देहि मेददापयठद्वयम् । ११६ चतुर्विंशत्यक्षरात्मा समृद्धिमन्नु रीरितः । ऋष्यादयः पुरा प्रोक्ताः षड्भूतकरणैस्त्रिभिः । ११७ चतुर्भियुगलेनार्णैर्मूलमन्त्रसमुद्भवैः । विदधीत षडङ्गानि जातियुक्तानि मन्त्रवित् । ११८ उसका भवन व्रीहि गो-महिषी अन्य आदि से भर जाया करता है। तिलों से होम करने से बहुत बड़ी लक्ष्मीको मानव प्राप्तकर लिया करता है । ११२। पलाश-खदिर-शमी और दूध वाले वृक्ष- विकंकतक, अपावध को तथा करवीर की समिधाओं से कुमुद पद्म-कल्हार-अरुणोत्पल-जाती पुष्प और दूर्वा से तथा नित्य ही एक सौ आठ हवन करे । ११३-११४। मन्त्रधारी से हवन करे अथवा सुधी प्रतिपदा से होम करे । इससे होता सम्पूर्ण मनोरथों का साधन कर लेता है और छै मासों के अन्दर ही सब साधन बन जाता है। इसमें कुछ भी संशय नहीं है ।११५। अब तुरगगग्निमन्त्रको बताया जाता है-उत्तिष्ठ पुरुष-बोले और इसके पीछे हरि पिङ्गल-यह कहे लोहिताक्षर पद कहकर 'देहि में ददापय और दोठकार कहे। यह चौबीस अक्षरों वाला समृद्धि मन्त्र कहा गया है। इसके ऋषि पहिले ही कह दिये गये हैं। तीन षड्भूत करणों से-चारों से-युगल अर्णों से तथा मूल मन्त्र समुद्भूतों से छै अङ्गों को मन्त्र वेत्ता जाति युक्त करें । ।११६-११८। स्वर्णश्वत्थविनिर्गतं हुतवहं सिन्दूरपुञ्जप्रभं । ज्वालाभिर्निचितांवरोमनिनचय कन्त्या जगन्मोहनम् ।