भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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पृष्ठ 284

२८४ ] [ श्रीशारदा तिलक अश्वाकारमनर्घ रत्नविलसद्भूषालसत्कन्धरं रत्नैरिन्द्रयनिर्गतैर्वसुमतीमाच्छादयन्तं स्मरेत् । ११९ लक्षं मनुं जपेदेनं पयोऽन्नेन ससर्पिषा । दशांशं जुहुयाद्वह्नौ तुरगाग्निमनस्मरन् । १२० पीठं प्रागीपितेऽभ्यर्च्य दङ्गैस्तन्मूर्त्तिभिः सह । आशापालैस्तदीयास्त्रै रचये द्धव्यवाहनम् । १२१ प्रातः स्नानरतो मन्त्री सहस्रं योजपेन्मनुम् । जित्वा रोगान्सुखं जीवेत् श्रिया वर्षशतं नरः । १२२ हृत्प्रमाणे जले स्थित्वा भानमालोक्य संयतः । चतुः सहस्रं प्रजपेन्नित्यं संवत्सरावधि । १२३ अब ध्यान कहते हैं—सुवर्ण अश्वत्थ से निकले हुये सिन्दूर के पुंज के समान प्रभा से युक्त, ज्वालाओं से अङ्ग रोगों के निश्चित होने वाले कान्ति के द्वारा जगत को मोहने वाले, अश्व के आकार से अन्वित, बहुमूल्य रत्नों से शोभित कन्धरा वाले, इन्द्रियों से निर्गत रत्नों से वसु, मती को उदित करते हुए हुतवह का स्मरण करना चाहिये । ११९। इस मंत्र का एक लाख जप करे । घृत के सहित पद अन्न से जप का दशांश वह्नि में होम करे और तुरगाग्नि का स्मरण करता रहे । १२०। पूर्व मे कहे हुए पीठ पर अङ्गों और मूर्त्तियों के सहित अर्चन करना चाहिए । दिक्पालों और उनके आयुधों के साथ हव्य वाहन का अर्चन करे । १२१। जो मंत्रधारी स्नानरत होकर प्रातःकाल में इस मन्त्र को एक सहस्र जप करे वह मानव रोगों पर विजय पाकर सुख पूर्वक श्री के साथ सौ वर्ष तक जीवित रहा करती है । १२२। हृदय तक प्रमाण वाले जल में स्थित होकर भानुदेव का दर्शन करके संयत रहे और एक वर्ष तक नित्य चार हजार जप करे । १२३। अपमृत्यु भयं रोगं कृत्यादारिद्र यसम्भवन् । क्लेशान्निर्ज्जित्य तेजस्वी जीवेद्वर्षशतं पुनः । १२४