शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोदश पटल ] [ २६१ ललाटे केशवं धात्रा कुक्षौ नारायणं पुनः अर्यम्णाहृदि मन्त्रेण माधवं कष्ठदेशतः । १३ वरुणेन च गोविन्दं पुनर्दक्षिणपार्श्व कं । अंशुना विष्णुमंसस्थ भगेन मधुसूदनम् । १४ मल विवस्वता युक्तं त्रिविक्रममनन्तरम् । वामपार्श्वस्थमिन्द्रेण वामनाख्यमथांसके । १५ पुष्टया श्रीधरनामानं गले पर्जन्यसंयुतम् । हृषीकेशाह्वय पृष्ठे पद्मनाभं ततः परम् । १६ त्वष्ट्रा दामोदरं पश्चाद्विष्णुना ककुदि न्यसेत् । द्वादशार्ण महामन्त्रं ततो मूर्द्धिन प्रविन्द्यसेत् । १७ आठ वर्णों वाले स्वरूप से समन्वित आठ प्रकृतियों के स्वरूप वोला यह जानना चाहिये । चतुरात्माओं के संयोग से यह सूरियों के द्वारा विशिष्ट बारह अक्षरों वाला कहा गया है । अतएव उन मंत्र के वर्ण आदि द्वादश स्वरों से संयुत होते हैं । ११ । बारह आदित्यों के सहित द्वादश मूर्त्तियों का विन्यास करना चाहिये । वे केशव आदि क्रम से हैं उनको क्रम से देह में आगे कहे जाने वाले विधान से ही करना चाहिये ।१२। धाता के सहित केशव का ललाट में विन्यास करे । यथा— ॐ केशव धातृभ्यां नमः-इति ललाटे । फिर कुक्षि में अर्यमा के साथ नारायण का करे । मंत्र के द्वारा हृदय में कण्ठ देश से माधव का विन्यास करना चाहिये । १३ । पुनः वरुण से युक्त गोविन्द का दक्षिण पार्श्व में करे । अंशु से अंस में विराजमान विष्णु का तथा भग से युक्त मधुसूदन का विन्यास करे । १४ । गलेमें विवस्वान्से युक्त त्रिविक्रम का करे । इसके अनन्तर इन्द्र के सहित वाम पार्श्व में संस्थित वामन नाम वाले का न्यास करना चाहिये । इसके उपरान्त अंस (कंधा) में पुष्टि से युक्त श्रीधर का तथा गले में पर्जन्य से समन्वित हृषीकेश का और इससे आगे पृष्ठ में पद्म नाम का न्यास करे । १५-१६ । त्वष्टा के