शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 290, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें२६० ] [ श्रीशारदा तिलक मानो गयी है। फिर मंत्र के छै वर्णों से छै अङ्गों का समाचरण करना चाहिये ।५। अवशिष्टौ पुनर्वर्णौ विन्यसेत्कुक्षिपृष्ठयोः । बद्धदिक चक्रमन्त्रेण मन्त्रवर्णान्स्तनौ न्यसेत् ।६। आधारे हृदये वक्त्रे दोःपादमूलेसु नासिके । कण्ठे नाभौ हृदि कुचे पार्श्वपृष्ठेषु तत्परम् ।७ मूर्द्धास्य नेत्रश्रवणघ्राणेषु तदनन्तरम् । दोःपादसन्ध्यंगुलिषु धातुप्राणेषु हृत्स्थले ।८ मूर्द्धेक्षणास्यहृत्कुक्षिसोरुजंघापदद्वये । एकैकशोन्यरेद्वर्णान् गण्डांसोरुपदेषु च ।६ चक्रशङ्खगदाम्भोजपदेष्ववहितो न्यसेत् ।१० अवशिष्ट वर्णों को फिर कुक्षि और पृष्ठों में विन्यस्त करे। बद्धदिक् चक्र मन्त्र के द्वारा मन्त्र के वर्णों का स्तनों में न्यास करे ।६। इसके पीछे आधार, हृदय, मुख, बाहु और पदों के मूल, नासिका, कण्ठ, नाभि, हृदय, कुच, पार्श्व पृष्ठ में न्यास करना चाहिये । इसके अनन्तर मूर्धा, मुख, नेत्र, श्रवण, घ्राण में न्यास करना चाहिये । बाहु, पाद, सन्धि, अंगुलियों में, धातु प्राणों में, हृदय स्थल में, मूर्धा, ईक्षण, मुख, हृदय, कुक्षि, ऊरु दोनों जाँघों में और पादों में एक-एक वर्णों का गन्ड--अंस और पदों में न्यास करना चाहिए ।७-८-६। शंख, चक्र, गदा, और अम्भोज पदों में अवहित होकर न्यास करे ।१०। अष्टाणोंष्टप्रकृत्यात्या ज्ञेयोऽसौ चतुरात्मनाम् । संयोगात्सूरिभिः प्रोक्तो विशिष्टो द्वादशाक्षरः । अतस्तन्मन्त्रवर्णाद्या द्वादशस्वरसंयुताः ।११ द्वादशादित्यसहिता मूर्त्तिर्द्वादश विन्यसेत् । केशवाद्यःक्रमादुद्देहे वक्ष्यमाणविधानतः ।१२