शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 289, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रयोदश पटल ] [ २८६ त्रयोदश पटल ॥ विष्णु प्रकरण ॥ अथ वक्ष्ये महामन्त्रान्विष्णोः सर्वार्थसाधकान् । यस्य संस्मरणात् सन्तो भवाब्धेः पारमाश्रितः । १। तारं नमः पदं ब्र यान्तरौ दीर्घसमन्वितौ । पावनोणाय मन्त्रो यं प्रोक्तो वस्वक्षरान्वितः । २ साध्यनारायणः प्रोक्तो मुनिश्च्छन्दउदाहृतम् । मन्त्रस्ये देवी गायत्री देवता विष्णुरव्ययः । ३ क्रुद्धोल्काय हृदाख्यातं महोल्काय शिरः स्मृतन् । वीरोल्काय शिखा प्रोक्ता द्युल्काय कवचं स्मृतम् ।४ सहस्रोल्कायास्त्रमुक्तमङ्गक्लृप्तिरियं मता । भूयोवर्णैर्मनोःषड्भिः षडङ्गानि समाचरेत् ५ अब क्रम से प्राप्त हुए विष्णु देव के मन्त्रों को बतलाया जाता है- इसके अनन्तर सभी अर्थों के साधक भगवान् विष्णु के मन्त्रों को बत- लाया जायेगा, जिन भगवान् विष्णु के केवल संस्मरण करने ही से सन्त गण इस संसार महासागर से पार हो गये थे ।१। मन्त्र का उद्धार कहा जाता है —तार-ओंकार, दीर्घ आकार से समन्वित नकार और रेफ- नमः—यह पद और यवतः—यकार—इस रीति से यह आठ अक्षरों वाला मन्त्र कहा गया है ।२। इसका साध्य नारायण और छन्द मुनि कहा गया है । इस यन्त्र की देवी गायत्री है और इसका देवता अव्यय भगवान् विष्णु है ।३। इसका क्रुद्धोल्काय हृदय कहा गया है तथा महोल्काय शिर बताया गया है । वीरोल्काय शिखा है और उल्काय कवच कहा है ।४। सहस्रोल्काय अस्त्र कहा गया है यह अङ्गक्लृप्ति