भारतकोश
संग्रह पर लौटें

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

त्रयोदश पटल ] [ २८६ त्रयोदश पटल ॥ विष्णु प्रकरण ॥ अथ वक्ष्ये महामन्त्रान्विष्णोः सर्वार्थसाधकान् । यस्य संस्मरणात् सन्तो भवाब्धेः पारमाश्रितः । १। तारं नमः पदं ब्र यान्तरौ दीर्घसमन्वितौ । पावनोणाय मन्त्रो यं प्रोक्तो वस्वक्षरान्वितः । २ साध्यनारायणः प्रोक्तो मुनिश्च्छन्दउदाहृतम् । मन्त्रस्ये देवी गायत्री देवता विष्णुरव्ययः । ३ क्रुद्धोल्काय हृदाख्यातं महोल्काय शिरः स्मृतन् । वीरोल्काय शिखा प्रोक्ता द्युल्काय कवचं स्मृतम् ।४ सहस्रोल्कायास्त्रमुक्तमङ्गक्लृप्तिरियं मता । भूयोवर्णैर्मनोःषड्भिः षडङ्गानि समाचरेत् ५ अब क्रम से प्राप्त हुए विष्णु देव के मन्त्रों को बतलाया जाता है- इसके अनन्तर सभी अर्थों के साधक भगवान् विष्णु के मन्त्रों को बत- लाया जायेगा, जिन भगवान् विष्णु के केवल संस्मरण करने ही से सन्त गण इस संसार महासागर से पार हो गये थे ।१। मन्त्र का उद्धार कहा जाता है —तार-ओंकार, दीर्घ आकार से समन्वित नकार और रेफ- नमः—यह पद और यवतः—यकार—इस रीति से यह आठ अक्षरों वाला मन्त्र कहा गया है ।२। इसका साध्य नारायण और छन्द मुनि कहा गया है । इस यन्त्र की देवी गायत्री है और इसका देवता अव्यय भगवान् विष्णु है ।३। इसका क्रुद्धोल्काय हृदय कहा गया है तथा महोल्काय शिर बताया गया है । वीरोल्काय शिखा है और उल्काय कवच कहा है ।४। सहस्रोल्काय अस्त्र कहा गया है यह अङ्गक्लृप्ति

२६० ] [ श्रीशारदा तिलक मानो गयी है। फिर मंत्र के छै वर्णों से छै अङ्गों का समाचरण करना चाहिये ।५। अवशिष्टौ पुनर्वर्णौ विन्यसेत्कुक्षिपृष्ठयोः । बद्धदिक चक्रमन्त्रेण मन्त्रवर्णान्स्तनौ न्यसेत् ।६। आधारे हृदये वक्त्रे दोःपादमूलेसु नासिके । कण्ठे नाभौ हृदि कुचे पार्श्वपृष्ठेषु तत्परम् ।७ मूर्द्धास्य नेत्रश्रवणघ्राणेषु तदनन्तरम् । दोःपादसन्ध्‌यंगुलिषु धातुप्राणेषु हृत्स्थले ।८ मूर्द्धेक्षणास्यहृत्कुक्षिसोरुजंघापदद्वये । एकैकशोन्यरेद्वर्णान् गण्डांसोरुपदेषु च ।६ चक्रशङ्खगदाम्भोजपदेष्ववहितो न्यसेत् ।१० अवशिष्ट वर्णों को फिर कुक्षि और पृष्ठों में विन्यस्त करे। बद्धदिक् चक्र मन्त्र के द्वारा मन्त्र के वर्णों का स्तनों में न्यास करे ।६। इसके पीछे आधार, हृदय, मुख, बाहु और पदों के मूल, नासिका, कण्ठ, नाभि, हृदय, कुच, पार्श्व पृष्ठ में न्यास करना चाहिये । इसके अनन्तर मूर्धा, मुख, नेत्र, श्रवण, घ्राण में न्यास करना चाहिये । बाहु, पाद, सन्धि, अंगुलियों में, धातु प्राणों में, हृदय स्थल में, मूर्धा, ईक्षण, मुख, हृदय, कुक्षि, ऊरु दोनों जाँघों में और पादों में एक-एक वर्णों का गन्ड--अंस और पदों में न्यास करना चाहिए ।७-८-६। शंख, चक्र, गदा, और अम्भोज पदों में अवहित होकर न्यास करे ।१०। अष्टाणोंष्टप्रकृत्यात्या ज्ञेयोऽसौ चतुरात्मनाम् । संयोगात्सूरिभिः प्रोक्तो विशिष्टो द्वादशाक्षरः । अतस्तन्मन्त्रवर्णाद्या द्वादशस्वरसंयुताः ।११ द्वादशादित्यसहिता मूर्त्तिर्द्वादश विन्यसेत् । केशवाद्यःक्रमादुद्देहे वक्ष्यमाणविधानतः ।१२

त्रयोदश पटल ] [ २६१ ललाटे केशवं धात्रा कुक्षौ नारायणं पुनः अर्यम्णाहृदि मन्त्रेण माधवं कष्ठदेशतः । १३ वरुणेन च गोविन्दं पुनर्दक्षिणपार्श्व कं । अंशुना विष्णुमंसस्थ भगेन मधुसूदनम् । १४ मल विवस्वता युक्तं त्रिविक्रममनन्तरम् । वामपार्श्वस्थमिन्द्रेण वामनाख्यमथांसके । १५ पुष्टया श्रीधरनामानं गले पर्जन्यसंयुतम् । हृषीकेशाह्वय पृष्ठे पद्मनाभं ततः परम् । १६ त्वष्ट्रा दामोदरं पश्चाद्विष्णुना ककुदि न्यसेत् । द्वादशार्ण महामन्त्रं ततो मूर्द्धिन प्रविन्द्यसेत् । १७ आठ वर्णों वाले स्वरूप से समन्वित आठ प्रकृतियों के स्वरूप वोला यह जानना चाहिये । चतुरात्माओं के संयोग से यह सूरियों के द्वारा विशिष्ट बारह अक्षरों वाला कहा गया है । अतएव उन मंत्र के वर्ण आदि द्वादश स्वरों से संयुत होते हैं । ११ । बारह आदित्यों के सहित द्वादश मूर्त्तियों का विन्यास करना चाहिये । वे केशव आदि क्रम से हैं उनको क्रम से देह में आगे कहे जाने वाले विधान से ही करना चाहिये ।१२। धाता के सहित केशव का ललाट में विन्यास करे । यथा— ॐ केशव धातृभ्यां नमः-इति ललाटे । फिर कुक्षि में अर्यमा के साथ नारायण का करे । मंत्र के द्वारा हृदय में कण्ठ देश से माधव का विन्यास करना चाहिये । १३ । पुनः वरुण से युक्त गोविन्द का दक्षिण पार्श्व में करे । अंशु से अंस में विराजमान विष्णु का तथा भग से युक्त मधुसूदन का विन्यास करे । १४ । गलेमें विवस्वान्से युक्त त्रिविक्रम का करे । इसके अनन्तर इन्द्र के सहित वाम पार्श्व में संस्थित वामन नाम वाले का न्यास करना चाहिये । इसके उपरान्त अंस (कंधा) में पुष्टि से युक्त श्रीधर का तथा गले में पर्जन्य से समन्वित हृषीकेश का और इससे आगे पृष्ठ में पद्म नाम का न्यास करे । १५-१६ । त्वष्टा के

२६२ ] [ श्रीशारदा तिलक संयुत दामोदरका और पीछे विष्णुके सहित का ककुद् में विन्यास करना चाहिए ।१७। पुनः किरीटमन्त्रेण व्यापकं विन्यसेत्ततः । ब्रूयात्किरीटकेयूरहारं मकरकुण्डजम् ।१८ शंखचक्रगदाऽम्भोजहस्तं पीताम्बरं धरम् । श्रीवत्साङ्कियवक्षोऽन्ते स्थलशब्दमुदीरयेत् ।१६ श्रीभूमिसहितं स्वात्मज्योतिर्द्वयमुदाहृतम् । पश्चाद्दीप्तिकरायेति सहस्रादित्यतेजसे ।२० नमोऽन्तः प्रणवाद्योऽयं किरीटमनुरीरितः । एवं न्यासन्तनो कृत्वा ध्यायेन्नारायणं परम् ।२१ उद्यत्कोटिदिवाकराभमनिशं शंखं गदां पङ्कजं । चक्रं बिभ्रतमिन्दिरावसुमती संशोभि पार्श्वद्वयम् । केयूराङ्गदहारकुण्डलधरं पीताम्बरं कौस्तुभो । दीप्तं विश्वधरं स्ववक्षसि लसत्श्रीवत्सचित्हं भजे ।२२ फिर किरीट मन्त्र के द्वारा व्यापक विन्यास करे । अब उस किरीष मन्त्र का उद्धार बतलाया जाता है—किरीट केयूर हार और मकर कुण्डल वाले—शंख चक्र, गदा, अम्भस्त और पीताम्बर' धर'—कहे । श्रीवत्साङ्कित वक्ष अन्त में स्थल शब्द को कहे । श्रीज्योति सहित और स्वात्म ज्योतिर्द्वयं कहे । इसके पीछे दीप्ति कराया और सह- स्रादित्य तेजस-यह बोले । इसके आदि में प्रणव है और अन्त में 'नमः-यह पद होता-यह किरीट मन्त्र कहा गया है । इस रीति से शरीर में न्यास करने पर नारायण का न्यास करना चाहिए ।१८। ।१६-२०-२१। अब ध्यान बतलाते हैं-उदीय मान करोड़ों सूर्योंकी भामा से अन्वित-निरन्तर शंख-गदा-पंकज और चक्र से शोभित- दोनों पाश्वों में इन्दिरा और बसुमती से सुशोभित-केयूर, अङ्गद, हार और कुन्डलों के भारी-पीत वस्त्र वाले कौस्तुभ से उव्दीप्त-अपने

त्रयोदश पटल ] [ २६३ वक्षःस्थल में शोभित श्रीवत्स के चिन्ह वाले विश्वम्भर का भजन करता हूँ । २२। विकारलक्षं प्रजपेन्मनुमेनं समाहितः । तद्दशांशं सरसिजैर्जुहुयान्मधुरप्लुतैः ।२३ पीठे सम्पूजयेद्देवं विमलादिसमन्विते । विमलोत्कर्षिणी ज्ञाना क्रिया योगा ततः परम् ।२४ प्रह्वी सत्या तथेशानाऽनुग्रहा नवमी तथा । नमो भगवते ब्रूयाद्विष्णवे च पदं वदेत् ।२५ सर्वभूतात्मने वासुदेवायति वदेत्ततः । सर्वात्मसंयोगपदाद्योगपद्मपदं पुनः ।२६ पीठात्मने हृदन्तोऽयं मन्त्रस्तारादिरीरितः । दत्वानेनासनं मन्त्री मूत्तिं मूलेन कल्पयेत् ।२७ इस मन्त्र का सोलह लाख जप करे और परम सावधान रह कर ही जप करना चाहिए । जप का दशांश मधुरों में प्लुत कमलों से होम करना चाहिये । नौ शक्तियों के नामों का परिगणन किया जाता है— विमला-उत्कर्षिणी-ज्ञाना-क्रिया-योगा-प्रह्वी-सत्या-ईशाना कनुग्रहा नवमी है। सर्व प्रथम 'नमो भगवते'-यह कहे । इसके पीछे 'विष्णवे- यह पद कहना चाहिये । इसके अनन्तर 'सर्व भूतात्मने वासु देवाय'- यह कहे । सर्वात्म संयोग पद से पीछे 'योग पद्म पद' कहे । 'पीठात्मने' कहे। यह हृत् अन्त वाला प्रणव के आदि वाला मन्त्र कहा गया है। मन्त्रधारी इस मन्त्र से आसन अर्पित करके मूलमन्त्र के द्वारा मूर्ति की कल्पना करे ।२४-२७। आवाह्य पूजयेद्देवं सुगन्धिकुसुमादिभिः । अङ्गान्यभ्यर्च्य मन्त्राणांकेसरेषु समर्चयेत् ।२८ दलेषु वासुदेवाद्या मूर्त्तीः शक्तिसमन्विताः । वासुदेवं संकर्षणं प्रद्युम्नमनिरुद्धञ्च ।२६

२६४ ] [ श्रीशारदा तिलक हिमपीततमालेन्द्रनीलाभाः पीतवाससः । शङ्खचक्रगदाम्भोजधरा एते चतुर्भुजाः । ३० शान्तिश्रियं सरस्वत्या रतिं कोणदलेष्विमाः । श्वेतकाञ्चनगोदुग्धदूर्वावर्णाः सुभूषिताः । ३१ हेतीनचैं°दलाग्रेषु शङ्खं चक्रं गदाम्बुजे । कोस्तुभं मुसलं खड्गं वनमालां यथाक्रमम् । ३२ रक्ताच्छपोतकनकश्यामकृष्णासिपाण्डरान् । बहिरग्रे समभ्यर्चेन्गरुडं कुङ्कुमप्रभम् । ३३ आवाहन करके सुगन्धित कुसुम आदि उपचारों के द्वारा देव के अभ्यर्चन करना चाहिये । अङ्गोंका यजन करके मंत्रके वर्णों का केसरों में अर्चन करे । २८। दलों में शक्ति समन्वित वसुदेव आदि की मूर्तियों अर्चन करना चाहिये । वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध — इन चारों का यजन करे । हिम, पीत, तमाल और इन्द्रनील की आभा वाले हैं—पीत वर्ण का वस्त्र धारण करने वाले—शंख, चक्र, गदा और पद्म के धारी और चार भुजाओं से युक्त हैं ।२६-३०। कोणों के दलोंमें शांति-श्री-सरस्वती और रति इसका यजन करे । ये चारों क्रम से श्वेत, कांचन, गोदुग्ध और दूर्वा के वर्णों वाली है तथा समलंकृत है ।३१। इनके आयुधों का दलों के अग्रभागों में अर्चन करे । वे आयुध शंख, चक्र, गदा, पद्म, कौस्तुभ, मुसल, खड्ग, वन माला क्रममस्मार हैं ।३२। रक्त, अच्छ, पोत, कनक, श्याम, कृष्ण, असित और पाण्डुर वर्णों वाले हैं । बाहिर इनके आगे कुंकुम के प्रभा से संयुत गरुड़देव का अभ्यर्चन करे ।३३। मुक्तामणिक्यसंकाशौ तक्षिणोत्तरतो निधी । ध्वजं वरुणदिग्भागे श्यामलं पूजयेत्ततः । ३४। अरुणं विघ्नमाग्नेय श्याममार्यं निशाचरे । श्यामां दुर्गीवायुकौरो सेनान्यपीतश्वरेरे । ३५

त्रयोदश पटल ] [ २६५ इन्द्रादीन्पूजयेत्पश्चाद्वज्राद्यायुधसंयुतान् । इति सम्पूजतेद्विष्णुं प्रोक्ततैवरणैः सह ।३६ धर्मार्थकामान् लब्ध्वान्ते विष्णोः सायुज्यमाप्नुयात् । प्रणवो हृद्भगवते वासुदेवाय कीर्त्तितः ।३७ प्रधानं वैष्णवे तन्त्रे मन्त्रोऽयं द्वादशाक्षरः । ऋषिः प्रजापतिश्छन्दो गायत्री परिकीर्त्तिता ।३८ देवताऽस्य मनोः प्रोक्ता वासुदेवो मनीषिभिः । तारेण हृदयं प्रोक्तं नमसा शिर ईरितम् ।३६ चतुर्वर्णैः शिखाप्रोक्ता पञ्चार्णैः कवचं मतम् । समस्तेन भुवेदस्त्रमङ्गकल्पनमीरितम् ।४० मूर्द्धिन भाले दृशोरस्ये गले दोहृदयाम्बुजे । कुक्षौ नाभौ ध्वजे जानुद्वये पादद्वये तथा ।४१ दक्षिण और उत्तर में मुक्ता और मणिक्य के सदृश दोनों निधियों का अर्चन करना चाहिये । वरुण दिशामें श्यामल ध्वजका पूजन करना चाहिये ।३४। आग्नेय कोण में अरुण विघ्न का तथा निशाचर कोण में श्याम आर्य का यजन करना चाहिये । वायु कोण में श्यामा दुर्गा का तथा ईश्वर में पीत सेनान्य का पूजन करे ।२५। इसके पीछे आयुधों से संयुक्त इन्द्र आदि का पूजन करना चाहिये । इत रीति से कथित आवरणों के सहित विष्णु भगवान् का पूजन करना चाहिये ।३६। यह पूजन करने वाला पुरुष धर्म-अर्थ-काम की प्राप्ति करके अन्त में विष्णु भगव त् के सायुज्य की प्राप्ति किया करता है । अब द्वादशा- क्षरों से युक्त वासुदेव का मंत्र बताया जाता है । इसका उद्धार इस तरह से है-प्रणव, हृत भगवते, नमः वासुदेवाय-यह कहा गया है । वैष्णव तंत्र में यह-प्रधान द्वादशाक्षर मंत्र है । इसका ऋषि प्रजापति है और इसका छन्द गायत्री कहा गया है ।३७-३८। मनीषियों के द्वारा इस मंत्र का देवता वासुदेव कहे गये हैं । तार से हृदय कहा गया है और नमः से शिर कहा गया है ।३६। चार वर्णों से शिखा कही गयी है और

२६६ ] [ श्रीशारदा तिलक पाँच वर्णों से कवच माना गया है। सम्पूर्ण से अस्त्र होता है। यह अङ्गों की कल्पना की गयी है ।४०। मूर्द्धा में-भाल-नेत्रों में-गले में- बाहुओं में, हृदयाम्बुज में, कुक्षि, नाभि-ध्वज दोनों जानु और दोनों पैरों में न्यास करना चाहिये ।४१। विष्णुं शारदचन्द्रकोटिसदृशं शङ्खं रथाङ्गं गदा। मम्भोजं दधतं सिताब्जनिलयं कान्त्या जगन्मोहनम् । आवद्धांगदहारकुण्डलमहामौलि स्फुरत्कङ्कणं । श्रीवत्साङ्कमुदारकौस्तुभधरं वन्दे मुनीन्द्रैः स्तुतम् ।४२ वर्णलक्षं जपेन्मन्त्रं दीक्षितोविजितेन्द्रियः । तत्सहस्रं प्रजुहुयात्तिलैराज्यपरिप्लुतैः ।४३ पीठे प्रागीरिते मूत्ति मूलमन्त्रेण कल्पयेत् । पूजयेद्विधिनाऽनेन वासुदेवं विधानवित् ।४४ प्रथमावृतिरङ्गैः स्याद् वासुदेदादिभिः परा । शान्त्यादिशक्तिसहितैः परा द्वादशमूर्त्तिभिः ।४५ चतुर्थी सुरनाथायैर्वज्राद्यैः पञ्चमी मता । एवं सम्पूजितोविष्णुः प्रदद्यादिष्टमात्मनः ।४६ अब ध्यान बतलाया जाता है-शरद्काल में उदीयमान करोड़ों चन्द्रों के समान-शंख, चक्र, गदा और पद्म को धारण करते हुए- श्वेत कमल में निवासी, कान्ति के द्वारा जगत् को मोहन करने वाले- अङ्गद, हार, कुण्डल और मौलिमुकुट को बाँधे हुये-स्फुर्तमणि कंकणों से संयुत - श्रीवत्स के चिन्ह से युक्त, कौस्तुभधारी-मुनीन्द्रोंसे स्तुति किये जाते, भगवान् विष्णु की वन्दना करता हूँ ।४२। मन्त्र में जितने वर्ण हैं उतने लाख मन्त्र का दीक्षित तथा इन्द्रियों को जीतने वाला होकर जप करे । उतने ही सहस्रका घृत में परिप्लुत तिलोंके द्वारा होम करे ।४३। पूर्व में बताये हुये पीठ में मूल मन्त्र से मूत्ति की कल्पना करनी चाहिये । विधान के ज्ञाता पुरुष को इसी विधान से भगवान वासुदेव का पूजन करना चाहिए ।४४। प्रथम आवृत्ति अङ्गों से होती है और

त्रयोदश पटल ] [ २६७ दूसरी वासुदेव आदि के द्वारा करे । शक्ति आदिके सहित द्वादश मूर्तियों से तीसरी आवृत्ति होती है । सुरनाथादि के द्वारा चौथी और वज्रादि द्वारा पाँचवीं आवृत्ति की जाती हैं ।४५। इस तरह से पूजित किया गया अपना अभीष्ट प्रदान कर दिया करते हैं ।४६। पायसेन घृताक्तेन मन्त्रवर्णसहस्रकम् । जुहुयान्मनसः शुद्धयै समिद्भिः क्षीरभूरुहाम् ४७ तत्संख्यया यथोक्ताभिः सर्वपापविमुक्तये । हृल्लेखाबीजयुगलं रमाबीजयुगं पुनः ।४८ लक्ष्म्यन्ते वासुदेवाय हृदन्तः प्रणवादिकः । चतुर्दशाक्षरोमन्त्रः प्रोक्तोऽयं सुरपादपः ।४६ हृदयं शक्तिबीजाभ्यां रमाभ्यां शिर ईरितम् । लक्ष्म्यै प्रोक्ता शिखा वर्म वासुदेवाय कीर्त्तितम् । नमसास्त्रं समुद्दिष्टं सर्वं तारादि कल्पयेत् ।५० घृत में अक्त पायस से मन्त्रके वर्ण जितने हैं उतने ही सहस्र आहू तियाँ देनी चाहिये । यह हवन मन की शुद्धि के लिए दूध वाले वृक्षों की समिधाओंसे करना चाहिये ।४७। सब पापों की विमुक्तिके लिये यथोक्त संख्या में होम करे । अब लक्ष्मी वासुदेव मन्त्र का उद्धार बताया जाता है-हृल्लेखा, भुवनेशी बीज रमा—श्री बीज ये दोनों के बीजों का युगल होना चाहिये । लक्ष्मी पद के अन्त में ‘वासुदेवा’ यह पद होवे अन्त में ‘नमः’-यह पद और आदि में प्रणव होना चाहिए । यह चौदह अक्षरों वाला मन्त्र कल्पवृक्ष जैसा ही कहा गया है । जैसे कल्पवृक्ष सब मनोरथों को पूर्ण करता है वैसे यह भी मनोभीप्सितों को पूर्ण किया करता है ।४८-४६। शक्ति बीजों से हृदय और रमा के बीजों से शिर कहा गया है । लक्ष्म्यै शिखा और वासुदेवाय वर्म कहा गया है । नम- स् से अस्त्र उद्दिष्ट किया है और तारादि से सबकी कल्पना करे ।५०। विद्युच्चन्द्रनिभं वपुः कमलजावैकुण्ठयोरेकतां । प्राप्तं स्नेहवशेन रत्नविलसद्भूषाभिरालङ्कृतम् ।

२६८ ] [ श्री शारदा तिलक विद्यापङ्कजदर्पणं मणिमयं कुम्भं सरोजं गदां । शङ्खं चक्रममूनि विभ्रदमितां दिश्याच्छ्रियं वः सदा ।५१ वर्णलक्षं जपेदेनं तत्सहस्रं सरोरुहैः । होमं कुर्याद्विकसितैर्मधुरत्रयसंयुतैः ।५२ पूजा स्याद्वैष्णवीपीठे द्वादशाक्षरवर्त्मना । पायसेन कृतोहोमो लक्ष्मीवंश (वश्य) प्रदायकः ।५३ मधुराक्तैस्तिलैर्हुत्वा सर्वकार्याणि साधयेत् । तारो हृद्विष्णवे पश्चात् ङेन्तः सुरपतिर्भवेत् ।५४ महावलाय ठद्वन्द्वं मनुरष्टादशाक्षरः । ऋषिरिन्दुविराट्छन्दो देवता दधिवामनः ।५५ अब ध्यान कहा जाता है-विद्युल्लता और चन्द्र के सदृश-कमल जा (लक्ष्मी) और वैकुण्ठ नारायण की एकता को स्नेह के वश से प्राप्त हुआ-रत्नों से सुशोभित सुन्दर भूषणोंसे समलंकृत, विद्या, पंकज, दर्पण, मणियों से परिपूर्ण कुम्भ, सरोज, गदा, शंख, चक्र, इनको धारण करने वाला वपु आपकी अमित श्री को प्रदान करे ।५१। इस मंत्र का वर्ण लक्ष अर्थात् जितने भी मंत्र में वर्ण होवें उतने ही लाख जप करना चाहिये । जितने लाख जप होंवे उतनी ही सहस्र सरोरुहोंके द्वारा आहु- तियां देकर होम करो । सरोरुह विकसित होवे और मधुर त्रय से अक्त होने चाहिये ।५२। द्वादशाक्षर मंत्र के ही मार्ग के द्वारा वैष्णवी पीठ पर पूजा होनी चाहिये । पायस के द्वारा किया हुआ होम लक्ष्मी के वश्य का प्रदाता होता है ।५३। मधुर त्रय में अक्त किये हुये तिलों के द्वारा होम करके सभी कार्यों का साधन किया करता है । अब दधि वामन मंत्र का उद्धार कहा जाता है-तार-प्रणव, हृत्-नमः, फिर विष्णव- यह पद, पीछे चतुर्थ्यन्त सुरपति पद होना चाहिये । इसके पश्चात् 'महावलाय'यहपद और दो ठकार अर्थात् ठः-ठः होना चाहिये । यह मंत्र अठारह अक्षरों वाला होता है । इसका ऋषि इन्दु है और विराट् छन्द है और इसका देवता दधि वामन होता है ।५४-५५।

त्रयोदश पटल ] [ २६६ हृदयेन शिरोद्वाभ्यां शिखा त्रिभिरुदीरिता । कवचं पञ्चभिः प्रोक्तं नेत्रं तावद्भिरक्षरैः ।५६ द्वाभ्यामस्त्रमिति प्रोक्तः प्रकारोऽङ्गस्य सूरिभिः । मूर्द्धनि भाले दृशोर्युग्मे कर्णनासोष्ठतालुषु ।५७ कण्ठे बाहुद्वये पृष्ठे हृदयोदरनाभिषु । गुह्योरुजानुयुग्मेषु जङ्घयोः पादयोर्न्यसेत् । अष्टादश मनोर्वर्णान् पश्चादेनं विचिन्तयेत् ।५८ मुक्तागौरं नवमणिलसद्भूषणं चन्द्रसंस्थम् । भृङ्गाकारैरलकनिकरैः शोभिवक्त्रारविन्दम् । हस्ताब्जाभ्यां कनककलशं शुद्धतोयाभिपूर्णम् । दध्यन्नाढ्यं कनकचषकं धारयन्तं भजामः ।६० हृदय से शिर-दो से, शिखा तीन से कही गयी है । कवच पाँच से कहा गया है । यह अङ्ग का प्रकार सूरियों के द्वारा कहा गया है । तथा नेत्र भी उतने ही अक्षरों से होता है तथा दो से अस्त्र बताया गया है। इसके न्यास का क्रम यह है कि-मूर्धा, भाल, दोनों नेत्र, कान, नासिका, ओष्ठ, तालु, कण्ठ, दोनों बाहु, पृष्ठ दोनों जाँघ, और दोनों पदों में न्यास करना चाहिये । ये मंत्र के अठारह वर्णों का न्यास है। इसके पश्चात् इनका चिन्तन करे ।५६-५८। अब ध्यान बताया जाता है—मुक्ता के समान गौर वर्ण से अन्वित नौ प्रकार की मणियों से कान्ति युक्त भूषण वाले-चन्द्र में विराजमान, भ्रमरों के आकार वाले अलकों (केशों) के समूहों से परम शोभा युक्त मुख कमल से सम- न्वित-दोनों करकमलों से शुद्ध जल से परिपूर्ण दो कलशों को धारण किये हुये -- दधि अन्न से युक्त सुवर्ण के चषक को धारण करने वाले का हम भजन करते हैं ।६०। गुणलक्षं जपेन्मन्त्रं तद्दशांशं घृतप्लुतैः । पायसान्नैः प्रजुहुयाद्दध्यन्नं वा यथाविधि ।६१

३०० ] [ श्रीशारदा तिलक चन्द्रान्तं कल्पिते पीठे प्रागुक्ते तं समर्चयेत् । मूर्त्ति मूलेन संकल्प्य वक्ष्यमाणविधानतः ।६२ षडङ्गानि समभ्यर्च्य केसरेषु यथापुरा । अभ्यर्च्य वासुदेवादीन् ध्वजादीनर्चयेत्ततः ।६३ केशवाद्या दलाग्रेषु सुरेन्द्रादीननन्तरम् । वज्रादीनि गजानष्टौ सप्तावरणमीरितम् ।६४ विधानयेतद्देवस्य कीर्त्तितं सुरपूजितम् । पायसाज्येन जुहुयात्सहस्रं श्रियमा नुयात् ।६५ धान्यहोमेन धान्याप्तिः शतपुष्पीसमुद्भवैः । बीजैः सहस्रसंख्यातो होमो भयविनाशनः ।६६ इस मन्त्र का तीन लाख जप करे । घृतमें प्लुत पायसान्न से उतने ही सहस्र अर्थात् जप का दशांश हवन करना चाहिये । अथवा विधि के अनुसार दधि अन्न का होम करे ।६१। पूर्व में कहे हुये चन्द्रान्त पीठ में उसका समर्चन करे । वक्ष्यमाण विधान से मूल मन्त्र से मूर्त्ति की कल्पना करे । पूर्व की तरह से छ अङ्गों का केसरों में यजन करना चाहिये । वासुदेव आदि का अर्चन करके फिर ध्वजादिक का अर्चन करे ।६२-६३। दलों के अग्रभागों में केशव आदि का और इसके अन- न्तर सुरेन्द्र आदि का पूजन करे । वज्रादिक का और आठ दिग्गजों का अर्चन करे । यह सात आवरण कहें गये हैं ।६४। यही देव का विधान है जो सुरगणों द्वारा भी पूजित होता है । पायस और घृत से होम करे और सहस्र आहुतियों देवे तो श्री प्राप्ति किया करता है ।६५। धान्य के होम से धान्य की प्राप्ति हुआ करती है । शतपुष्पी के बीजों से एक सहस्र संख्या में किया हुआ होम भय का विनाश करने वाला है ।६६। दध्योदनेन शुद्धेन हुत्वा सुच्येव दुर्गतेः ।६७ स्मृत्वा त्रैविक्रमं रूपं जपेन्मन्त्रमनन्यधीः । मुक्तो बन्धाद्भवेत्सद्यो नात्र कार्या विचारणा ।६८

त्रयोदश पटल ] [ ३०१ पट्टे संपाद्य देवेशं भित्तौ वा पूजयेत्सुधीः । सुगन्धिकुसुमैर्नित्यं महतीं श्रियमाप्नुयात् ।६६ स साध्यतारोज्ज्वलकर्णिकाब्जमष्टाक्षरैर्रुज्ज्वलकेशराढ्यम् । मन्त्राक्षरद्वन्द्वयुताष्टपत्रं शिष्टार्णयुग्मोल्लसितान्तपत्रम् ।७० द्वादशाक्षरसंवीतं तद्वहिर्मातृकाक्षरैः । विदध्याद्वैष्णवं यन्त्रं सर्वसम्पत्प्रदायकम ।७१ शुद्ध दध्योदन से होम करके मानव दुर्गतिसे मुक्त हो जाया करता है ।६७। अनन्य बुद्धि वाला होकर भगवान् के त्रैविक्रम स्वरूप क स्मरण करके मंत्र का जप करे तो बन्धन से तुरन्त ही मुक्त हो जाय करता है इसमें लेश मात्र भी संशय नहीं है ।६८। देवेश्वर को किस पट्टे पर सम्पादित करे अथवा भीत में काढ़कर सुधी उनका पूजन करे नित्य ही सुगन्धित पुष्पोंके द्वारा यजन करे तो बड़ी श्री का लाभ किय करता है ।३६। अब मन्त्र निर्माण का प्रकार बतलाया जाता है कमल की कर्णिका के साध्य और साधक के कर्म के सहित प्रणव लिखे । यह कमल नारायण में अष्टाक्षरों से समन्वित और उज्ज्वल केसर से आढ्य होवे । इसके आठ पत्र मातृकाक्षरों के द्वन्द्व से युक्त होवे और शिष्ट वर्णों के युग्मों से अन्तिम पत्र शोभित करे ।७०। इसको द्वादश अक्षरों से संवेष्टित करे और उसकेबाहिर मातृकाओंसे संवीत करना चाहिये । इस प्रकार से इस वैष्णव यंत्र की रचना करनी चाहिए । यह मंत्र सब प्रकार की सम्पदा का प्रदान करने वाला है ।७१। उद्गिरतपदमाभाष्य प्रणवोद्गीथशङ्खतः । सर्ववागीश्वरेत्यन्ते प्रवदेदीश्वरेत्यथ ।७२ सर्ववेदमयाचिन्त्यदान्ते सर्वमुच्चरेत् । बोधयद्वितयान्तोऽयं मन्त्रास्तारादिरीदितः ।७३ ऋषिर्ब्रह्मास्य सन्दिष्टश्छन्दोऽनुष्टुबुदाहृतम् । देवता स्याद्धयग्रीवो वागैश्वर्यप्रदोद्विभुः । तारैण पादैर्मन्त्रस्य पञ्चाङ्गानि प्रकल्पयेत् ।७४

३०२ ] [ श्रीशारदा तिलक शरच्चशाङ्कप्रभमश्ववक्त्रं मुक्तामयैराभरणैरुपेतम् । रथांगषङ्खाङ्कितबाहुयुग्मञ्जानुद्वयन्यस्तकरम्भजानः ।७५ वर्णलक्षं जपेन्मन्त्रं कुन्दपुष्पैर्मधुप्लुतैः । दशांशं वैष्णवे वह्नौ जुहुयान्मन्त्रसिद्धये ।७६ अब हयग्रीव मंत्र को बतलाया जाता है-उद्गिरत्-इस पद को बोलकर प्रणवोद्गोत शब्द कहे। अन्त में, सर्व वागीश्वर और इसके अनन्तर ईश्वर-यह कहे। सर्वं वेद मयाचिन्त्य पद के अन्त में सर्व का उच्चारण करे । बोधय-बोधय-यह अन्त में कहे। इसके आदि में प्रणव है-ऐसा यह मंत्र बताया गया ।७२-७३। इसका ऋषि ब्रह्मा है-और और छन्द अनुष्टुप कहा गया है। इसका देवता हयग्रीव है जो विभु- वाक् और ऐश्वर्य का प्रदाता है। तार अर्थात् प्रणव के सहित मंत्र के पादों से पांच अङ्गों की कल्पना करनी चाहिये ।७४ ।अब ध्यान कहा जाता है-शरत्काल के चन्द्रमा के समान प्रभा से युक्त आभा के सदृश मुख वाले-मुक्ताओं से परिपूर्ण आभूषणों से समुपेत, चक्र और शंख से अंकित बाहुओं वाले दोनों जांघुओं पर कर को न्यस्त रखने वाले का हम भजन करते हैं ।७४-७५। मंत्र के वर्णों के अनुसार उतने ही लाख मंत्र का जप करे और मधुर प्लुत कुन्द के पुष्पों से होम करे । होम वैष्णव अग्नि में ही मंत्र की सिद्धि के लिये करना चाहिये ।७६। अष्टाक्षरोदिते पीठे हयग्रीव प्रपूजयेत् । बीजेन मूर्तिसङ्कल्प्य बीजमुद्गिद्यते यथा ।७७ वियदृगुस्थमर्धीशबिन्दुमद्वीजमीरितम् । केसरेषु चतुर्वेदांश्चतुर्दिक्षु समर्चयेत् ।७८ विदिक्ष्वङ्गस्मृतिर्न्यायसर्वशस्त्राणि पूजयेत् । अर्चयेत्पत्रमध्येपु विधानेनाङ्गदेवताः ।७६ बाह्ये लोके श्वरन्स्तेषां वस्त्राद्यस्त्राणि संयजेत् । एवं योभजते देवं साक्षाद्वागीश्वरोभवेत् ।८०

त्रयोदश पटल ] [ ३०३ बैल्वैः फलैः कृतोहोम श्रीकरः परिगीयते । कुन्दुपुष्पाणि जुहुयादिच्छन् वाकछ्रियमव्ययाम् ।८१ अष्टाक्षरोदित पीठ पर हयग्रीव भगवान् का पूजन करना चाहिये । बीज के द्वारा मूर्ति की कल्पना करे बीज का इस तरह से उद्धार किया जाता है-विद्यत्-हः भृगु-सकार, उसमें स्थित अधीश-ऊदार, और बिन्दु-अनुस्वार, यह बीज कहा गया है । केसरों में चार बीजों को चार दिशाओंमें समर्चत करना चाहिये ।७७-७८। विदिशाओं में अङ्ग स्मृति, न्यास और सब शास्त्रों का पूजन करना चाहिये । पत्रों के मध्यों में विधान से अङ्ग देवताओं को अचित करे ।७६। वाहिरमें लोकेश्वर और उनके वज्रादि अस्त्रों का अर्चन करे । इस तरह से जो मानव देव का यजन किया करता है वह साक्षात् वागीश्वर ही हो जाया करता है।८०। बिल्व के फलों के द्वारा होम करने वाला श्री के करने वाला परिगीत किया जाता है । अन्वय । वाक् श्री की इच्छा करता हुआ कन्दके पुष्पों का हवन करे ।८१। मानुनानेन सञ्जप्तं घृतं ब्राह्मी रसैः शृतम् । कबितामावहेत्पुंसामनर्गलविजृम्भणाम् ।८२ वचाम नसञ्जाप्तां भक्षयेत्प्रातरन्वहम् । सर्ववेदागमादीनां व्याख्याता जायतेऽचिरात् ।८३ मनोरस्य समोनास्ति ज्ञानैश्वर्य्यप्रदोऽसरः । अनन्तोऽग्म्यासना सेन्दु बीज राताय हृन्मनुः ।८४ षडरोऽयमादिष्टोभजतां कामदामणिः । ब्रह्मा प्रोक्तो मुनिश्चन्दो गायत्र देवता मनो ।८५ देशिकेन्द्रैः समाख्यातो रामोराक्षसमर्द्दनः । दीर्घभाजा स्वबीजेन कुर्यादङ्गानि षट्क्रमात् ।८६ ब्राह्मी के रस से श्रुत को इस मंत्र के द्वारा अभिमन्त्रित करे तो इसके पास से पुरुष अनर्मल विजृम्भण वाली कविता का आवा- हन कर लेता है ।८२। इस मन्त्र से भली भाँति जपी हुई बच को प्राप्त

३०४ ] [ श्रीशारदा तिलक काल में प्रतिदिन भक्षण करे तो सब वेदों और आगमों आदि का शीघ्र व्याख्या करने वाला हो जाया करता है ।८३। इस मंत्र के समान ज्ञान और ऐश्वर्य के प्रदान करने वाला दूसरा कोई भी मंत्र नहीं है। अब राम मंत्र भी बतलाया जाता है--अनन्त, आकार, अग्न्या सन--रेफ के आसन वाँला, सेन्दु-अनुस्वार से युक्त बीज है--'रामायहृत्त--नम । यह मंत्र छँ अक्षरों वाला कहा गया है। इसके सेवन करने वालों को यह कामनाओं की देने वाली मणि है अर्थात् चिन्तामणि के समान है। इसका मुनि ब्रह्मा कहा गया है, मन्त्र का छन्द गायत्र है, इसका देवता आचार्यों के द्वारा राक्षसों के मर्दन करने वाले राम कहे गये है। दीर्घ के सेवन करने वाले अपने ही बीज के क्रम से छँ अङ्गों को करना चाहिए ।८६। ब्रह्मरन्ध्रे दध्रुवोर्मध्ये हृन्नाभ्यन्ध्युषु पादयोः । षडक्षराणि विन्यस्येन्मन्त्रस्य मनुवित्तमः ।८७ कायाम्भोधरकान्तिकान्तमनिशं वीरासनाध्यासितम् । मुद्रां ज्ञानमयीं दधानमपहं हस्ताम्बुजं जानुनि । सीतां पार्श्वगतां सरोरुहकरां विद्युन्निभां राघवम् । पश्यन्तं मुकुटांदादिविविधाऽऽकल्पोज्वलांगम्भजे ।८८ वर्णलक्षं जपेन्मन्त्रं तद्दशांशं सरोरुहैः । जुहुयादर्चिते बह्नौ ब्राह्मणान् भोजयेत्ततः ।८६ । पूजयेद्वैष्णवे पीठे मूर्त्ति मूलेन कल्पयेत् । श्रीसीतायै द्वितान्तेन सीतां पार्श्वगतां यजेत् ।६० अग्रे पार्श्वद्वये शांगं शरान गानि तद्वहिः । हनुमन्तं ससुग्रीवं भरतं संविभीषणम् ।६१ लक्ष्मणांगदशत्रुघ्नाञ्जाम्बवन्तं दलेष्विमान् । वाचयन्तं हनूमन्तमग्रतो धृतपुस्तकम् ।६२ यजेद्भरतशत्रुघ्नौ पार्श्वयोर्धृतचामरौ । धृता। पत्रं हस्ताभ्यां लक्ष्मणं पश्चिमे यजेत् ।६३

त्रयोदश पटल ] [ ३०५ ब्रह्म रन्ध्र में, भौंहों के मध्य में हृदय, नाभि अन्धु और पादों में मन्त्र के ज्ञाता को मन्त्र के छः अक्षरों का विन्यास करना चाहिये ।८७। अब ध्यान बतलाया जाता है-कृष्ण मेघ के समान कान्ति से परम रम्य-निरन्तर वीरासन पर आध्यासित - ज्ञानमयी मुद्रा को धारण करने वाले दूसरे हस्त कमल को अपने जानु पर रखते हुए - पार्श्व में संस्थिता-कमलों के समान करों वाली, विद्युल्लता के तुल्या सीता को देखते हुये-ज्ञानमयी मुद्रा को धारण करने वाले-मुकुट और अङ्गद आदि अनेक आभरणों से उज्ज्वल अङ्गों वाले श्रीराघव का मैं यजन करता हूँ ।८८। मन्त्र में जितने वर्ण है उतने ही लाख मन्त्र का जप करे और जप का दशांश भाग का अर्चित् अग्नि में कमलों के द्वारा होम करे । इसके अनन्तर ब्राह्मणों को भोजन करावे ।८६। वैष्णव पीठ पर पूजन करे और मूल मन्त्र से मूर्ति की कल्पना करनी चाहिये । श्री सीतायै ओर दो ठकार अन्त में होवे, इस मन्त्र से पार्श्व में संस्थिता श्री सीता का यजन करना चाहिये ।६०। आगे दोनों पार्श्वों में शाङ्गंशरों को और उनके बाहिर अङ्गों का यजन करे । हनुमान्, सुग्रीव, भरत, विभीषण, लक्ष्मण, अङ्गद, शत्रुघ्न, जामवन्त, इनको दलों में पूजित करना चाहिये । हनुमान्जी को जो धरी हुई पुस्तक को बाँच रहे हैं पूजित करना चाहिये । दोनों पार्श्व भागों में चमर धारण करते हुये भरत और शत्रुघ्न का अर्चन करे । पश्चिम में अपने दोनों हाथों से आत पत्र (छत्र) धारण करने वाले लक्ष्मण का यजन करना चाहिये ।६१-६३। धृष्टं जयन्तं विजयं सुराष्ट्रं राष्ट्रवर्द्धनम् । अकोप धर्मपालाख्यं सुमन्तं च दलाग्रतः ।६४ सर्वाभरणसंपन्नाँल्लोकेशानर्चयेत्ततः । तदस्त्राणि ततो वाह्ये वज्रादीनि प्रपूजयेत् ।६५ एवं पूजादिभिः सिद्धे मनौ कर्म्माणि साधयेत् । जातीप्रसूनैर्जुहुयाच्चन्दनाम्भः समुक्षितैः ।६६

३०६ ] [ श्रीशारदा तिलक राजवश्याय कमलैर्घनधान्यादिरम्पदे । नीलोत्पलानां होमेन वशयेदखिलं जगत् । ६७ बिल्वप्रसूनैर्जुहुयादिन्दिराऽऽवाप्यते नरः । दूर्वाहोमेन दीर्घायुर्भवन्मन्त्री निरामयः । ६८ रक्तोत्पलहुतामन्त्री धनमाप्नोति वांछितम् । मेधाकामन होतव्यं पलाशकुसुमैर्नवैः । ६६ तज्जप्तमम्भः प्रपिबेत्कविर्भवति वत्सरात् । तन्मन्त्रितान्नं भुञ्जीत महदारोग्यमाप्नुयात् । १०० दलों के अग्रभाग में धृष्ट—जयन्त—विजय—सुराष्ट्र—राष्ट्र- वर्धन—अकोप—धर्मपाल और सुनन्तका यजनकरे । ६०। इसके उपरान्त सभी आभरणों से सुसम्पन्न लोकपालों का अर्चन करना चाहिये । उनके बाहिर में उनके आयुधों का, वज्रादिक का पूजन करे । ६५। इस तरह से अर्चन आदि के द्वारा मन्त्र के सिद्ध हो जाने पर अभीष्ट कर्मों का साधन करना चाहिए । चन्दन के जल में समुक्षित करके जाती के कुसुमों के द्वारा होम करें । ६६। राजा को वश्य करने के लिए कमलों से होम करे तथा धनधान्य आदि सम्पदा को प्राप्त करने के लिये भी कमलों के द्वारा होम करे । नीलोत्पलों के द्वारा किये हुए होम से सम्पूर्ण जगत को वश में कर लिया करता है । ६७। इन्दिरा की प्राप्ति करने के लिए विल्व वृक्ष के पुष्पों से हवन करे । दूर्वा के होम से मंत्र- धारी पुरुष दीर्घ आयु वाला और नीरोग होता है । ६८। रक्तोत्पलों के होम से मंत्र को धारण करने वाला अपना वांछित धन प्राप्त किया करता है। मेधा की कामना वाले को नवीन पलाश के पुष्पों से होम करना चाहिए । ६६। इस मंत्र से अभिमंत्रित जल का पान करे तो एक वर्ष में मनुष्य कवि हो जाता है। उस मंत्र से मंत्रित अन्न को खावे' तो महान् आरोग्य को प्राप्त किया करता है । १००। तारं मध्ये विलिखतु मनुं षट्सु कोणेषु सन्धि- ष्वङ्गं मायां स्मरमपि लिखेत्कोणगण्डेषु पश्चात् ।

त्रयोदश पटल ] [ ३०७ किञ्जल्केषु स्वरगणमथो यन्त्र मध्येपु मालामन्त्रो- त्थाणान् गुहमुखमितनष्टमे पञ्चवर्णान् ।१०१ दशाक्षरेण संवेष्ट्य कादिवर्णैश्च भूपुरे । दिग्विदिक्षु लिखेद्बीजे नरसिंहवराहयोः ।१०२ नमो भगवते ब्रूयाच्चतुर्थ्या रघुनन्दनम् ।' रक्षोध्नविषदायान्ते मधुरादि समीरयेत् ।१०३ प्रसन्नवदनायेति पश्चादमिततेजसे । बलाय पश्चाद्रामाय विष्णवे तदनन्तरम् । प्रणवादि नमोन्तोऽय मालाममुरोदीरितः ।१०४ जानकीवल्लभायाथ भवेत्पावकवल्लभा । हृमादिरेषः कथितो राममन्त्रो दशाक्षरः ।१०५ जपादिसार्वितं यन्त्रं स्वर्णपट्टादिकल्पितम् । बाहुना विधृतं दद्याद्विजयश्रीपराक्रमान् ।१०६ अब धारण यन्त्र बतलाया जाता है मध्य में प्रणव लिखे, छः कोणों में मन्त्र लिखे, सन्धियों में अङ्गलिखे, पीछे कोण गण्डों में क्रम से माया और स्वर का भी लेखन करे । यन्त्र के मध्य किजल्कों में स्वर गण को लिखना चाहिये । मालामन्त्रोत्थ गुह मुखसित पांच वर्णों को अष्टम में लिखे । दशाक्षर और कादि वर्णों से भूपुर में संवेष्टित करना चाहिए । दिशा और विदिशाओं में नरसिंह और वराह के बीजों को लिखे ।१०१-१०२। अब माला मन्त्र को बतलाया जाता है-आदि में 'नमो भगवते' यह बोले । फिर चतुर्थी अन्त वाले 'रघुनन्दन' इस पद को कहे अर्थात् 'रघुनन्दनाय' यह कहे । फिर ,रक्षोध्न विषदाय, यह कहे और अन्त में मधुरादि कहना चाहिये । फिर 'प्रसन्न वदनाय' यह और पीछे 'अमिततेजसे' यह बोले । 'बलाय' पीछे 'रामाय' और इसके अनन्तर विष्णवे, यह कहें । इसके आदि में प्रणव और अन्त में 'नमः' यह पद होता है । यह माला मन्त्र कहा गया है ।१०३-१०४। 'जानकी वल्लभाय' । फिर पावक वल्लभा अर्थात् 'स्वाहा' कहे । यह

३०८ ] [ श्रीशारदा तिलक हुम् आदि वाला है और दश अक्षरों का राम मन्त्र होता है ।१०५। जप आदि से साधित किये हुये यन्त्र को स्वर्णपट्ट आदि पर कल्पित करे । इसको बाहु पर विघृत करे तो वह विजय श्री और पराक्रम देता है ,१०६। गदितं राममन्त्रस्य विधानं सुरपूजितम् । तारं नमो भगवते वराहपदमीरयेत् । १०० रूपाय भूर्भुवः स्वः स्यात् पतये तदनन्तम् । स्यात् भूपतित्वं मे पदान्ते देह्यन्ते च ददापय ।१०८ वह्निजायावधिर्मन्त्रः स्यात्त्रयस्त्रिंशदक्षरः । भार्गवो मुनिराख्यात श्छन्दोऽनुष्टुबुदाहृतम् ।१०६ देवतादिवराहोऽस्य मन्त्रस्य कथितो बुधैः । एकदंष्ट्राय हृदयं व्योम्नोल्काय शिर.स्मृतम् ।११० शिखा तेजोऽधिपतये विश्वरूपाय वर्म च । महावराहायास्त्रं स्यात्पञ्चाङ्गमिति कल्पयेत् ।१११ यह राम मन्त्र का सुरों द्वारा पुजित विधान कहा गया है । आदि में प्रणव-फिर 'नमो भगवते' यह पद-इसके बाद 'वराह पद' को कहे । फिर 'रूपाय भूर्भवः, स्वः' कहे । इसके अनन्तर 'पतये'- यह पद बोले । फिर 'भूपति त्व ये'-इस पद के अन्त में 'देहि' और अन्त में 'ददापय' कहे । अन्त में 'स्वाहा' कहे । यह मन्त्र तैंतीस अक्षरों का होता है । इसका मुनि भार्गव और छन्द अनुष्टुप् कहा गया है ।१०७-१०६। इस मन्त्र का देवता आदि वराह है-ऐसा बुधगणों ने कहा है । एह दंष्ट्राय-इसका हृदय है । व्योम्नोल्काय-शिर कहा गया है । तेजोऽधिपतये-इसकी शिखा है और विश्वरूपाय-इसका वर्म होता है । महावराहाय-अस्त्र है इस तरह से पञ्चाङ्ग की कल्पना करनी चाहिये ।११०-१११। आपादञ्जानुदेशाद्वरकनकनिभं नाभिदेशादधस्ता। न्मुक्ताभं कण्ठदेशात्तरुणारविनिभं मस्तकान्नीलभासम् ।