भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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त्रयोदश पटल ] [ ३०१ पट्टे संपाद्य देवेशं भित्तौ वा पूजयेत्सुधीः । सुगन्धिकुसुमैर्नित्यं महतीं श्रियमाप्नुयात् ।६६ स साध्यतारोज्ज्वलकर्णिकाब्जमष्टाक्षरैर्रुज्ज्वलकेशराढ्यम् । मन्त्राक्षरद्वन्द्वयुताष्टपत्रं शिष्टार्णयुग्मोल्लसितान्तपत्रम् ।७० द्वादशाक्षरसंवीतं तद्वहिर्मातृकाक्षरैः । विदध्याद्वैष्णवं यन्त्रं सर्वसम्पत्प्रदायकम ।७१ शुद्ध दध्योदन से होम करके मानव दुर्गतिसे मुक्त हो जाया करता है ।६७। अनन्य बुद्धि वाला होकर भगवान् के त्रैविक्रम स्वरूप क स्मरण करके मंत्र का जप करे तो बन्धन से तुरन्त ही मुक्त हो जाय करता है इसमें लेश मात्र भी संशय नहीं है ।६८। देवेश्वर को किस पट्टे पर सम्पादित करे अथवा भीत में काढ़कर सुधी उनका पूजन करे नित्य ही सुगन्धित पुष्पोंके द्वारा यजन करे तो बड़ी श्री का लाभ किय करता है ।३६। अब मन्त्र निर्माण का प्रकार बतलाया जाता है कमल की कर्णिका के साध्य और साधक के कर्म के सहित प्रणव लिखे । यह कमल नारायण में अष्टाक्षरों से समन्वित और उज्ज्वल केसर से आढ्य होवे । इसके आठ पत्र मातृकाक्षरों के द्वन्द्व से युक्त होवे और शिष्ट वर्णों के युग्मों से अन्तिम पत्र शोभित करे ।७०। इसको द्वादश अक्षरों से संवेष्टित करे और उसकेबाहिर मातृकाओंसे संवीत करना चाहिये । इस प्रकार से इस वैष्णव यंत्र की रचना करनी चाहिए । यह मंत्र सब प्रकार की सम्पदा का प्रदान करने वाला है ।७१। उद्गिरतपदमाभाष्य प्रणवोद्गीथशङ्खतः । सर्ववागीश्वरेत्यन्ते प्रवदेदीश्वरेत्यथ ।७२ सर्ववेदमयाचिन्त्यदान्ते सर्वमुच्चरेत् । बोधयद्वितयान्तोऽयं मन्त्रास्तारादिरीदितः ।७३ ऋषिर्ब्रह्मास्य सन्दिष्टश्छन्दोऽनुष्टुबुदाहृतम् । देवता स्याद्धयग्रीवो वागैश्वर्यप्रदोद्विभुः । तारैण पादैर्मन्त्रस्य पञ्चाङ्गानि प्रकल्पयेत् ।७४