भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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३०० ] [ श्रीशारदा तिलक चन्द्रान्तं कल्पिते पीठे प्रागुक्ते तं समर्चयेत् । मूर्त्ति मूलेन संकल्प्य वक्ष्यमाणविधानतः ।६२ षडङ्गानि समभ्यर्च्य केसरेषु यथापुरा । अभ्यर्च्य वासुदेवादीन् ध्वजादीनर्चयेत्ततः ।६३ केशवाद्या दलाग्रेषु सुरेन्द्रादीननन्तरम् । वज्रादीनि गजानष्टौ सप्तावरणमीरितम् ।६४ विधानयेतद्देवस्य कीर्त्तितं सुरपूजितम् । पायसाज्येन जुहुयात्सहस्रं श्रियमा नुयात् ।६५ धान्यहोमेन धान्याप्तिः शतपुष्पीसमुद्भवैः । बीजैः सहस्रसंख्यातो होमो भयविनाशनः ।६६ इस मन्त्र का तीन लाख जप करे । घृतमें प्लुत पायसान्न से उतने ही सहस्र अर्थात् जप का दशांश हवन करना चाहिये । अथवा विधि के अनुसार दधि अन्न का होम करे ।६१। पूर्व में कहे हुये चन्द्रान्त पीठ में उसका समर्चन करे । वक्ष्यमाण विधान से मूल मन्त्र से मूर्त्ति की कल्पना करे । पूर्व की तरह से छ अङ्गों का केसरों में यजन करना चाहिये । वासुदेव आदि का अर्चन करके फिर ध्वजादिक का अर्चन करे ।६२-६३। दलों के अग्रभागों में केशव आदि का और इसके अन- न्तर सुरेन्द्र आदि का पूजन करे । वज्रादिक का और आठ दिग्गजों का अर्चन करे । यह सात आवरण कहें गये हैं ।६४। यही देव का विधान है जो सुरगणों द्वारा भी पूजित होता है । पायस और घृत से होम करे और सहस्र आहुतियों देवे तो श्री प्राप्ति किया करता है ।६५। धान्य के होम से धान्य की प्राप्ति हुआ करती है । शतपुष्पी के बीजों से एक सहस्र संख्या में किया हुआ होम भय का विनाश करने वाला है ।६६। दध्योदनेन शुद्धेन हुत्वा सुच्येव दुर्गतेः ।६७ स्मृत्वा त्रैविक्रमं रूपं जपेन्मन्त्रमनन्यधीः । मुक्तो बन्धाद्भवेत्सद्यो नात्र कार्या विचारणा ।६८