शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 302, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें३०२ ] [ श्रीशारदा तिलक शरच्चशाङ्कप्रभमश्ववक्त्रं मुक्तामयैराभरणैरुपेतम् । रथांगषङ्खाङ्कितबाहुयुग्मञ्जानुद्वयन्यस्तकरम्भजानः ।७५ वर्णलक्षं जपेन्मन्त्रं कुन्दपुष्पैर्मधुप्लुतैः । दशांशं वैष्णवे वह्नौ जुहुयान्मन्त्रसिद्धये ।७६ अब हयग्रीव मंत्र को बतलाया जाता है-उद्गिरत्-इस पद को बोलकर प्रणवोद्गोत शब्द कहे। अन्त में, सर्व वागीश्वर और इसके अनन्तर ईश्वर-यह कहे। सर्वं वेद मयाचिन्त्य पद के अन्त में सर्व का उच्चारण करे । बोधय-बोधय-यह अन्त में कहे। इसके आदि में प्रणव है-ऐसा यह मंत्र बताया गया ।७२-७३। इसका ऋषि ब्रह्मा है-और और छन्द अनुष्टुप कहा गया है। इसका देवता हयग्रीव है जो विभु- वाक् और ऐश्वर्य का प्रदाता है। तार अर्थात् प्रणव के सहित मंत्र के पादों से पांच अङ्गों की कल्पना करनी चाहिये ।७४ ।अब ध्यान कहा जाता है-शरत्काल के चन्द्रमा के समान प्रभा से युक्त आभा के सदृश मुख वाले-मुक्ताओं से परिपूर्ण आभूषणों से समुपेत, चक्र और शंख से अंकित बाहुओं वाले दोनों जांघुओं पर कर को न्यस्त रखने वाले का हम भजन करते हैं ।७४-७५। मंत्र के वर्णों के अनुसार उतने ही लाख मंत्र का जप करे और मधुर प्लुत कुन्द के पुष्पों से होम करे । होम वैष्णव अग्नि में ही मंत्र की सिद्धि के लिये करना चाहिये ।७६। अष्टाक्षरोदिते पीठे हयग्रीव प्रपूजयेत् । बीजेन मूर्तिसङ्कल्प्य बीजमुद्गिद्यते यथा ।७७ वियदृगुस्थमर्धीशबिन्दुमद्वीजमीरितम् । केसरेषु चतुर्वेदांश्चतुर्दिक्षु समर्चयेत् ।७८ विदिक्ष्वङ्गस्मृतिर्न्यायसर्वशस्त्राणि पूजयेत् । अर्चयेत्पत्रमध्येपु विधानेनाङ्गदेवताः ।७६ बाह्ये लोके श्वरन्स्तेषां वस्त्राद्यस्त्राणि संयजेत् । एवं योभजते देवं साक्षाद्वागीश्वरोभवेत् ।८०