शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३०४ ] [ श्रीशारदा तिलक काल में प्रतिदिन भक्षण करे तो सब वेदों और आगमों आदि का शीघ्र व्याख्या करने वाला हो जाया करता है ।८३। इस मंत्र के समान ज्ञान और ऐश्वर्य के प्रदान करने वाला दूसरा कोई भी मंत्र नहीं है। अब राम मंत्र भी बतलाया जाता है--अनन्त, आकार, अग्न्या सन--रेफ के आसन वाँला, सेन्दु-अनुस्वार से युक्त बीज है--'रामायहृत्त--नम । यह मंत्र छँ अक्षरों वाला कहा गया है। इसके सेवन करने वालों को यह कामनाओं की देने वाली मणि है अर्थात् चिन्तामणि के समान है। इसका मुनि ब्रह्मा कहा गया है, मन्त्र का छन्द गायत्र है, इसका देवता आचार्यों के द्वारा राक्षसों के मर्दन करने वाले राम कहे गये है। दीर्घ के सेवन करने वाले अपने ही बीज के क्रम से छँ अङ्गों को करना चाहिए ।८६। ब्रह्मरन्ध्रे दध्रुवोर्मध्ये हृन्नाभ्यन्ध्युषु पादयोः । षडक्षराणि विन्यस्येन्मन्त्रस्य मनुवित्तमः ।८७ कायाम्भोधरकान्तिकान्तमनिशं वीरासनाध्यासितम् । मुद्रां ज्ञानमयीं दधानमपहं हस्ताम्बुजं जानुनि । सीतां पार्श्वगतां सरोरुहकरां विद्युन्निभां राघवम् । पश्यन्तं मुकुटांदादिविविधाऽऽकल्पोज्वलांगम्भजे ।८८ वर्णलक्षं जपेन्मन्त्रं तद्दशांशं सरोरुहैः । जुहुयादर्चिते बह्नौ ब्राह्मणान् भोजयेत्ततः ।८६ । पूजयेद्वैष्णवे पीठे मूर्त्ति मूलेन कल्पयेत् । श्रीसीतायै द्वितान्तेन सीतां पार्श्वगतां यजेत् ।६० अग्रे पार्श्वद्वये शांगं शरान गानि तद्वहिः । हनुमन्तं ससुग्रीवं भरतं संविभीषणम् ।६१ लक्ष्मणांगदशत्रुघ्नाञ्जाम्बवन्तं दलेष्विमान् । वाचयन्तं हनूमन्तमग्रतो धृतपुस्तकम् ।६२ यजेद्भरतशत्रुघ्नौ पार्श्वयोर्धृतचामरौ । धृता। पत्रं हस्ताभ्यां लक्ष्मणं पश्चिमे यजेत् ।६३