शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 305, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रयोदश पटल ] [ ३०५ ब्रह्म रन्ध्र में, भौंहों के मध्य में हृदय, नाभि अन्धु और पादों में मन्त्र के ज्ञाता को मन्त्र के छः अक्षरों का विन्यास करना चाहिये ।८७। अब ध्यान बतलाया जाता है-कृष्ण मेघ के समान कान्ति से परम रम्य-निरन्तर वीरासन पर आध्यासित - ज्ञानमयी मुद्रा को धारण करने वाले दूसरे हस्त कमल को अपने जानु पर रखते हुए - पार्श्व में संस्थिता-कमलों के समान करों वाली, विद्युल्लता के तुल्या सीता को देखते हुये-ज्ञानमयी मुद्रा को धारण करने वाले-मुकुट और अङ्गद आदि अनेक आभरणों से उज्ज्वल अङ्गों वाले श्रीराघव का मैं यजन करता हूँ ।८८। मन्त्र में जितने वर्ण है उतने ही लाख मन्त्र का जप करे और जप का दशांश भाग का अर्चित् अग्नि में कमलों के द्वारा होम करे । इसके अनन्तर ब्राह्मणों को भोजन करावे ।८६। वैष्णव पीठ पर पूजन करे और मूल मन्त्र से मूर्ति की कल्पना करनी चाहिये । श्री सीतायै ओर दो ठकार अन्त में होवे, इस मन्त्र से पार्श्व में संस्थिता श्री सीता का यजन करना चाहिये ।६०। आगे दोनों पार्श्वों में शाङ्गंशरों को और उनके बाहिर अङ्गों का यजन करे । हनुमान्, सुग्रीव, भरत, विभीषण, लक्ष्मण, अङ्गद, शत्रुघ्न, जामवन्त, इनको दलों में पूजित करना चाहिये । हनुमान्जी को जो धरी हुई पुस्तक को बाँच रहे हैं पूजित करना चाहिये । दोनों पार्श्व भागों में चमर धारण करते हुये भरत और शत्रुघ्न का अर्चन करे । पश्चिम में अपने दोनों हाथों से आत पत्र (छत्र) धारण करने वाले लक्ष्मण का यजन करना चाहिये ।६१-६३। धृष्टं जयन्तं विजयं सुराष्ट्रं राष्ट्रवर्द्धनम् । अकोप धर्मपालाख्यं सुमन्तं च दलाग्रतः ।६४ सर्वाभरणसंपन्नाँल्लोकेशानर्चयेत्ततः । तदस्त्राणि ततो वाह्ये वज्रादीनि प्रपूजयेत् ।६५ एवं पूजादिभिः सिद्धे मनौ कर्म्माणि साधयेत् । जातीप्रसूनैर्जुहुयाच्चन्दनाम्भः समुक्षितैः ।६६