भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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त्रयोदश पटल ] [ २६५ इन्द्रादीन्पूजयेत्पश्चाद्वज्राद्यायुधसंयुतान् । इति सम्पूजतेद्विष्णुं प्रोक्ततैवरणैः सह ।३६ धर्मार्थकामान् लब्ध्वान्ते विष्णोः सायुज्यमाप्नुयात् । प्रणवो हृद्भगवते वासुदेवाय कीर्त्तितः ।३७ प्रधानं वैष्णवे तन्त्रे मन्त्रोऽयं द्वादशाक्षरः । ऋषिः प्रजापतिश्छन्दो गायत्री परिकीर्त्तिता ।३८ देवताऽस्य मनोः प्रोक्ता वासुदेवो मनीषिभिः । तारेण हृदयं प्रोक्तं नमसा शिर ईरितम् ।३६ चतुर्वर्णैः शिखाप्रोक्ता पञ्चार्णैः कवचं मतम् । समस्तेन भुवेदस्त्रमङ्गकल्पनमीरितम् ।४० मूर्द्धिन भाले दृशोरस्ये गले दोहृदयाम्बुजे । कुक्षौ नाभौ ध्वजे जानुद्वये पादद्वये तथा ।४१ दक्षिण और उत्तर में मुक्ता और मणिक्य के सदृश दोनों निधियों का अर्चन करना चाहिये । वरुण दिशामें श्यामल ध्वजका पूजन करना चाहिये ।३४। आग्नेय कोण में अरुण विघ्न का तथा निशाचर कोण में श्याम आर्य का यजन करना चाहिये । वायु कोण में श्यामा दुर्गा का तथा ईश्वर में पीत सेनान्य का पूजन करे ।२५। इसके पीछे आयुधों से संयुक्त इन्द्र आदि का पूजन करना चाहिये । इत रीति से कथित आवरणों के सहित विष्णु भगवान् का पूजन करना चाहिये ।३६। यह पूजन करने वाला पुरुष धर्म-अर्थ-काम की प्राप्ति करके अन्त में विष्णु भगव त् के सायुज्य की प्राप्ति किया करता है । अब द्वादशा- क्षरों से युक्त वासुदेव का मंत्र बताया जाता है । इसका उद्धार इस तरह से है-प्रणव, हृत भगवते, नमः वासुदेवाय-यह कहा गया है । वैष्णव तंत्र में यह-प्रधान द्वादशाक्षर मंत्र है । इसका ऋषि प्रजापति है और इसका छन्द गायत्री कहा गया है ।३७-३८। मनीषियों के द्वारा इस मंत्र का देवता वासुदेव कहे गये हैं । तार से हृदय कहा गया है और नमः से शिर कहा गया है ।३६। चार वर्णों से शिखा कही गयी है और