शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
त्रयोदश पटल ] [ ३०६ ईडे हस्तैर्दधानं रथचरणदरौ खड्गखेटौ गदाख्यां । शाक्तं दानाभये च क्षितिधरणलसद्दंष्ट्रमाद्यं वराहम् ।११२ लक्षमेकं जपेन्मन्त्रं मधुराक्तैः सरोरुहैः । जुहुयात्तद्दशांशेन पीठे विष्णोःप्रपूजयेत् ।११३ मूर्त्तिं मूलेन संकल्प्य वक्ष्यमाणविधानतः । पूर्वादिषु चतुर्दिक्षु हृदाद्यङ्गानि पूजयेत् ।११४ अस्त्रं कोणेष्वधश्चोर्ध्वं चक्राद्यस्त्राणि तद्बहिः । चक्रं शङ्खमसिं खेटं गदां शक्तिं वराप्रये ।११५ संपूज्या बाह्यलोकेशान् बहिरस्त्राणि संयजेत् । ध्यानादेवो धनं दद्याज्जपद्वाह्यात् वसुन्धराम् ।११६ अब ध्यान कहा जाता है—चरणों से लेकर जानु देश तक श्रेष्ठ कनक के समान प्रभा से आन्वित है नाभि देव से नीचे मुक्ता की आभा से युक्त हैं। कण्ठ देश से तरुण सूर्य के सदृश हैं। मस्तक से नील आभा सम्पन्न हैं। कर कमलों के द्वारा रथ चरण दरौं—खड्ग खेट, गदा—शक्ति दान-अभय धारण करने वाले और भूमि को धारण करने में शोभित दाढ़ वाले आद्य वराह का स्तवन करता हूँ ।११२। मधुर त्रय में अक्त सरोरुहों से ,होम करे और एक लाख मन्त्र का जप करना चाहिये । जप का दशांश का हवन करना चाहिये । भगवान् विष्णु को पीठ पर अर्चन करे ।११३। मूल मन्त्र के द्वारा मूर्ति की कल्पनाकरे जिसका विधान आगे बताया जायगा । पूर्वादि चारदिशाओं में हृदयादि अंगों का पूजन करे ।११४। नीचे और ऊपर कोणों में अस्त्र का तथा उसके वाहिर चक्रादि आयुधों का अर्चन करना चाहिये । आयुधों के नामों का परिगणन किया जाता है—चक्र, शंख, असि, खेट, गदा, शक्ति, वरदान, अभयदान है। वाहिर लोकेशों का तथा उनके बाहिर उनके अस्त्रों का यजन करना चाहिये । देव ध्यान से धन दिया करते हैं और जप करने से वसुन्धरा को देते हैं ।११५-११६।
३१० ] [ श्रीशारदा तिलक प्रयच्छेज्जपपूजाद्यैर्धनधान्यमहीश्रियः । रवौ सिंहगतेऽष्टम्यां शुक्लपक्षे सितां शिलाम् । ११७ पञ्चगव्येषु निःक्षिप्य स्पृष्ट्वा तमयत जपेत् । उत्तराभिमुखोभूत्वा तां शिलां निखनेद्भुवि । ११८ शत्रु चोरमहाभूतैः कृतां बाधां प्रणाशयेत् । भानूदये भौमवारे साध्यक्षेत्रात्समाहरेत् । ११९ मृत्तिकां सज्जपमंत्री ताम्पुनर्विभजेत्त्रिधा । चुह्लयामेकां समालिख्य पाकपात्रे तथापराम् : १२० गोदुग्धे परमालोड्य शोधितांस्तण्डुलान् क्षिपेत् ।१२१ जप और पूजादि से धन धान्य-नहीं और भी दिया करते हैं । सिंह गत रवि के हो जाने पर अष्टमी में शुक्ल पक्ष में सित शिला को पंच- गव्य में निःक्षिप्त करके उसका स्पर्श करके दश सहस्र जप करे । उत्तर की ओर अभिमुख होकर उस शिला को भूमिमें गाड़ देवे । ११७-११८। इसका यह प्रभाव होता है कि यह शत्रु चोर महाभूतों के द्वारा की हुई बाधा का विनाश कर दिया करता है । सूर्योदय के समय भौम वार में साध्य क्षेत्र से मृतिका समाहरण करे । ११९। मन्त्रधारी उस को जप करता हुआ उसको फिर तीन भागों में विभक्त करे । एक को चूल्हे में लिपे और दूसरो को पाक पात्र में तीसरे को गोदुग्धमें आलोडित करके शोधित तन्डुलों क्षिप्त कर देवे ।१२०-१२१। संस्कृतेऽग्नौ पचेत्सम्यक् चरुं मन्त्री जपन्मनुम् । अवतार्य चरुं पश्चादग्नौ देवं यथाविधि ।१२२ धूपदीपादिकैरिष्ट्वा पुनराज्यप्लुप्तं चरुम् । जुहुयादेधिते वह्नौ यावदष्टोत्तरं शतम् । १२३ एवं सप्तारवारेष जहयात् क्षेत्रसिद्धये । प्रातःकाले भृगोर्वारे मृदं साध्यमहीतलात् ।१२४ आदाय हविरापाद्य पूर्ववज्जुहुयात् सुधीः । विरोधोनपश्यति क्षेत्रे सहचरौराद्यु पक्रमैः । १८५
त्रयोदश पटल ] [ ३११ राजवृक्षसमुत्थाभिः समिद्भिर्ननुताऽमुना । त्रिसहस्रं प्रजुहुयात्तस्य स्युः सर्वसम्पदः ।१२६ शालिभिर्जुहुयान्मन्त्रो नित्यमष्टोत्तरं शतम् । समृद्धैर्धान्यसङ्घातैः शोभते तस्य मन्दिरम् । १२७ तावदाज्येन जुहुयान्मण्डलात्स्वर्णमाप्नुयात् । लाजै कन्यामवाप्नोति मध्वक्तैर्निजवाञ्छितम् ।१२८ संस्कार किए हुये अग्नि में भली-भाँति पाचन करे । मंत्रधारी मंत्र का जप करते हुये ही चरु का पाक करे । पीछे चरु को उतार लेना चाहिए । अग्नि में विधि के साथ देव का धूप दीप आदि के द्वारा यजन करके पुनः आज्य में प्लुत चरु संज्वलित वह्नि में अष्टो- त्तर शत आहुतियाँ देनी चाहिए ।१२२-१२३। इस रीति से सप्तारवारों में क्षेत्र की सिद्धि के लिये हवन करे भृगुवार में प्रातःकाल के समय में साध्य महा तल से मृत्तिका लाकर हवि सम्पादित कर सुधी पूर्व की ही भाँति होम करे । इससे चौरादि उपक्रमों के साथ क्षेत्र में विरोध होता है वह नष्ट हो जाता है । राजवृक्ष से समुद्भूते समिधाओं के द्वारा इस मन्त्र से तीन सहस्र आहुतियां देवें तो उसके पास सभी सम्पदायें हो जाया करती हैं ।१२४-१२६। मन्त्रधारी शालियों के द्वारा नित्य ही एक सौ आठ बार होम करे तो उसका मन्दिर धान्य के संघातोंसे और समृ- द्धियों से शोभित हो जाता है ।१२७। तब तक घृतसे होम करे जब तक मण्डल से स्वर्ण को प्राप्त करे । मधु से अक्त लाखाओं से होम करने से कन्या अपना वाञ्छित वर प्राप्त कर लिया करती है ।१२८। मधुरत्रयसंयुक्तै र्जुहुयादुत्पलै र्न्नवैः । महतीं श्रियमाप्नोति मण्डलात्पूर्वसंख्यया ।१२६ मध्ये बीजं सतारं दहनपुरयुगे चक्रवर्णान् षडस्रि- ष्वालिख्याङ्गि सन्धिष्वथ करणदलेरम्बुज केसरेषु । अष्टार्णान्विन्द्वमध्ये लिखतु वसुमितान्मन्त्रवर्णांश्चतुर्थे । शिष्टान्पत्रे पुरस्ताद्वपुदनकमले केमरस्थस्वरराड्ये ।१३०
३१२ ] [ श्रीशारदा तिलक मन्त्राणान् वेदसंख्यान् दलमनुविलिखेदन्त्यमन्त्येऽथ वाह्यं । किञ्जल्कैः कादिवर्णैर्विकसितकमले षोडशारे यथावत् । मन्त्राणान्युग्मशस्तच्चरपमदलगतं शिष्टवर्णं लिखित्वा । तारक्षमाकोलबीजैस्तदनुपरिवृतं साध्यनामार्णमध्यैः । १३१. दर्भितैः साध्यनामार्णैर्मन्त्रवर्णैर्बृ त्तम्बहिः । भूविम्बेनास्य कोणेषु भूबीजं साध्यसंयुक्तम् । १३२ अष्टशूलेषु वाराह भबोज सहितं लिखेत् । सार्धीशबिन्दुगगनं बीजं वाराहमीरितम् । १३३ तीनों मधुरों से संयुत नवीन उत्पलों से होम करे तो मण्डल से पूर्व संख्या में करने से बहुत बड़ी श्री की प्राप्ति किया करता है । १२६। अब मन्त्र बतलाते हैं दहनपुर युग में परस्पर व्यति भिन्न षट्कोण के मध्य में प्रणव के सहित बीज अर्थात् साध्य-साधक के कर्म के सहित बीज को लिखे। और षट्कोण में अङ्गों को लिखकर सन्धियों में करण दलों से तथा केसरों में अम्बुज को लिखे। आठ वर्णों को पत्र मध्य में लिखे तथा वसुमती अर्थात् आठ परिमाण में मन्त्र के वर्णों को चतुर्थ लिखे। केसरों में स्थित स्वरों से आठ दलों वाले कमल में आने पत्र में लिखे । १३०। चार सख्या वाले मन्त्रके वर्णों को दलानुसार लिखे और अन्त्य को अन्त्य में लिखे। फिर इसके अनन्तर वाह्य में कादिवर्ण वाले किजल्कों से षोड़शार विकसित कमल में यथा रीति मन्त्र के वर्णों को युग्म से तच्चर पम दलगत वर्ण को लिखकर प्रणव-क्षमा- कोल बीजों से उसके अनुसार परिवृत करे । बाहिर साध्य के नाम के वर्णों के मध्य ताले दर्भित साध्य वर्णों से वृत करे । इसके कोणों में भूबिम्ब से साध्य से संयुत भूबीज को लिखे और अष्ट दलों में भूबीज से सहित वाराह को लिखना चाहिए । अब वाराही बीज को बतलाया जाता है । अधीश-आकार, गमन-हवार, बिन्दु-अनुस्वार-यही वाराह बीज कहा गया है ।१३१-१३३।
त्रयोदश पटल ] [ ३१३ रोचना गुरुकर्पूरलाक्षाकुङ्कुमचन्दनैः । गोमयाम्भसि सम्पिष्टैर्लिखेद्यन्त्रं शुभे दिने । १३४ लेखिन्या हेममय्याच सर्वकामप्रसिद्धये । स्वर्णपट्टे लिखेद्यन्त्रं राज्यश्रीसमवाप्तये । १३५ ग्रामसिद्ध्यै रजतजे ताम्रपट्टे धनाप्तये । भूर्जपत्रे निजेष्टाप्तौ क्षौमे भूमिद्विये लिखेत् । १३६ जपपूजादिभिः सिद्धं यन्त्रं कुर्यान्निजेप्सितम् । ग्रामपत्तनराष्ट्रेषु मन्त्रमेतत्सुसाधितम् । १३७ निखनेच्छुभवारौ साङ्गन्दिक्षु समर्चयेत् । क्षुद्रापमृत्युचोरादिभूतव्यालयमहाभयैः । १३८ नशक्यते परन्द्रष्टु तं वंश देवता वलात् । धरण्यन्ते धरेद्वन्द्वं द्विठान्तोऽयं ध्रुवादिकः । एकोनविंश यर्णाढ्यं धराहृदयमीरितम् । १४० वराहोऽस्य मुनिः प्रोक्तश्छन्दोनिचुदुदाहृतम् । देवता सर्वभूतानां प्रकृतिर्मसुधामता । १४१ रोचना—अगुरु—कर्पूर—लाक्षा—कुंकुम—चन्दन को गोमय के जल में पिष्ठ करके किसी शुभ दिन में यन्त्र को लिखना चाहिये । ।१३४। लेखनी हेममयी हो तो उससे लिखे तो सब कामनाओं की सिद्धि होती है । राज्य श्री की सम्पत्ति की प्राप्ति के लिखेसुवर्ण के पट्ट पर मन्त्र को लिखना चाहिये ।१३५। ग्राम की सिद्धि के लिये चाँदी के पट्ट पर लिखे और धन की प्राप्ति के लिये ताम्र के पट्ट पर लिये । अपने अभीष्ट की प्राप्ति में भोजपत्र पर तथा भूकी सिद्धि के लिये क्षोम पर लिखना चाहिये ।१३६। जप और पूजा आदि के द्वारा सिद्ध किया हुआ मन्त्र अपना ईप्सित को करे । ग्राम—पत्तन और राष्ट्र में यह मन्त्र सुसाधित होता है । शुभ वार आदि में गाड़ देवे और अग सहित दिक्षाओं में समर्चन करना चाहिये । इसके प्रभाव से क्षुद्र—अपमृत्यु चोर आदि—भूत व्याल और महान रोगों के द्वारा ऊसके वश को
३१४ ] [ श्रीशारदा तिलक कष्ट नहीं हो सकता । धरणि के अन्त में धरे दो वार दो ठकार अन्त में है और आदि में ध्रुव है-यह इक्कीस-वर्णोंमें आढ्य मन्त्रहोता है । इसका हृदय धरा कहा गया है। इसका ऋषि वराहहै और निचृद छन्द होताहै। इसका देवता समस्त प्राणियोंको प्रकृति धरा मानी गयी है । १३७-१४१। हृदयं त्रिभिराख्यातं चतुर्भिः शिर ईरितम् । त्रिभिः शिखा समुद्दिष्टा कवचं पञ्चभिर्मतम् । १४२ द्वाभ्यां नेत्रं समाख्यातं द्वाभ्यामस्त्रं पुनर्भवेत् । मन्त्रवर्णैः षडङ्गानि कुर्यादेवं विधानवित् । १४३ श्यामां विचित्रांऽशुकरत्नभूषणां पद्मासनां तुङ्गपयोधरोन्नताम् । इन्दीवरे द्वे नवशालिमञ्जरीं शुकं दधानां वसुधांभजामहे । १४४ लक्षमेकं जपेन्मन्त्रं धराहृदयमादरात् । स सर्पिषा पायसेन जुहुयात्तद्दशांशतः । १४५ तां विष्णोः पूजयेत्पीठे वक्ष्यमाणविधानतः । अङ्गानि पूजयेदादौ भूवह्निजलमारुतान् । १४६ दिक्पत्रेषु गमभ्यर्च्य कोणपत्रेषु तत्कलाः । आशापालाः पुनः पूज्या वज्राद्यसमन्विताः । १४७ तीन से हृदय कहा गया है और चार से शिर होता है । तीन से शिखा समुद्दिष्ट की गयी है और कवच पाँच से बताया है । १४२। दो से नेत्र और पुनः दो से अस्त्र होता है । विधान का ज्ञान रखने वाला पुरुष इस प्रकार से मन्त्र के वर्णों के द्वारा षट् अङ्गों को करे । १४३। अब ध्यान हैं-श्याम वर्ण से युक्त-अद्भुत वस्त्रों और रत्नोंके आभूषणोंसे भूषित-पद्म के आसन पर विराजमान-तुङ्गपयोधरों से समुन्नत हो इन्दीवर-नवीन शाली की मंजरी और शुक को धारण करने वाली वसुधा का भजन करते हैं । १४४। बड़े आदर के साथ इस धरा हृदय मन्त्र का एक लाख जप करे । जपका दशांश घृतसे संयुत पायस से होम करना चाहिये । १४५। उस का भगवान् विष्णु के पीठ पर वक्ष्यमान (आगे कहे जाने वाले) विधान से पूजन करे । आदिमें अङ्गों का यजन
त्रयोदश पटल ] [ ३१५ करना चाहिये । भू वह्नि-जल-मारुत का दिक् पत्रों में भली-भाँति अर्चन करके कोण पत्रों में उनकी कलाओं का यजन करे। फिर दिक्पालों का वज्र आदि अस्त्रों से समन्वितों का पूजन करना चाहिए ।१४६-१४७। एव सिद्धमनुमंन्त्रो साधयेत् स्वमनोरथान् । मधुरत्रयसंयुक्त' जुक्ष्यादरुणोत्पलैः ।१४८ सहस्र भूसमृद्धिः स्यात्तथा नीलोत्पलै शुभैः । प्रियङ्गपुष्पैर्मध्वक्तैर्धनधान्यमहोश्रियः ।१४६ मञ्जरीं शालिसम्भूतां मधुरत्रयलोलिताम् । जुहुयात्साधियते वह्नौ मण्डलात् स्याद्धरापतिः ।१५० शुक्रवारे दिनमुख गृहीत्वा साध्यभूमृदस् । तामम्भसि विनिः क्षिप्य शोधितेऽत्र चरुं पचेत् ।१५१ पयोगृताभ्यां सहितं जुहुयात्त हुताशने । षण्मासं शुक्रवारेषु हुत्वैवं प्राप्नुयान्महीम् ।१५२ धरामेवं पपेन्मन्त्रो पशुरत्नधनादिभिः । धरायाः वल्लभः स स्यान्नात्र कार्या विचारणा ।१५३ इस प्रकार से मन्त्र सिद्ध कर लेने वाला मन्त्रधारी अपने मनोरथों को साधित किया करता है । तीनों मधुरोंसे संयुत अरुणोत्पलों के द्वारा हवन करना चाहिए ।१४८। एक सहस्र आहुतियों के देने से भूमि की समृद्धि होती है । शुभ नीलोत्पलों-प्रियंगु-पुष्पों को मधु में अक्त करके उनसे होम करे तो धन-धान्य-भूमि और श्री की वृद्धि होती है । शाली की मञ्जरी को तीनों मधुरों में लोलित करके साधित वह्नि में होम करे तो मण्डल से धरापति हो जाया करता है ।१४६-१५०। शुक्रवार में प्रातःकाल में साध्य की भूमि की मृत्तिका को ग्रहण करके उसको शोधित जल में डालकर इसमें चरुका पाचन करना चाहिये ।१५१। उसका पय और घृत में सहित रखकर अग्नि में होम करना चाहिए । छ मास तक शुक्रवारों में इसी प्रकार से होम करके मही की
३१६ ] [ श्रीशारदा तिलक प्राप्त किया करता है। ५२। मंत्रधारी इस प्रकार से धरा का जप करे तो पशु-रत्न-धन आदि के साथ वह धरा का स्वामी होता है इसमें कुछ भी विचारणा नहीं करनी चाहिए। ५३। ―― चतुर्दश पटल ॥ नारसिंह प्रकरण ॥ अथाभिधास्ये विधिवन्नारसिंहं महामनुम् । उग्रं वीरं वदेत्पूर्वं महाविष्णुमनन्तरम् । १। ज्वलन्तं पदमाभाष्य सर्वतोमुखमीरयेत् । नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं वदेत्ततः ।२ नमाम्यहमयं प्रोक्तो मन्त्रराजः सुरद्रुमः । ऋषिर्ब्रह्मा समुद्दिष्टश्छन्दोऽनुष्टुबुदाहृतम् । देवता नरसिंहः स्यात्सुरासुरनमस्कृतः । ३ चतुर्भिर्हृदयं वर्णैः शिरस्तावद्भिरेरितम् । शिखाऽष्टाभिः समुद्दिष्टा षड्भिः कवचमीरितम् ।४ तावद्भिर्नयनं प्रोक्तमस्त्रं स्यात्करणाक्षरैः । शिरोललाटनेत्रेषु मुखबाह्वङ्घ्रिसन्धिषु । ५ साग्रेषु कुक्षौ हृदये गले पार्श्वद्वये पुनः । अपरांगे ककुदि च न्यसेद्वर्णान्यथाक्रमात् । ६ इसके अनन्तर विधि के साथ नृसिंह के महान् मंत्र राज के विषय में बतलाऊँगा-पूर्व में-उग्र वीर-इन पदों को कहे। इसके अनन्तर 'महाविष्णु' इसको बोले । फिर 'ज्वलन्त'-इस पद को कहकर 'सर्वतो मुख' यह कहना चाहिये । इसके उपरान्त नृसिंह भीषण भद्र मृत्युमृत्यु' इन पदों को कहे। फिर 'नमाम्यहम्" यह कहे—यह मंत्रराज कह।
चतुर्दश पटल ] [ ३१७ गया है जो कल्प वृक्ष के समान होता है । इसका ऋषि ब्रह्मा, अनुष्टुप् छन्द कहा गया है । इसके देवता नृसिंह हैं जो सभी सुरों और असुरों के द्वारा वन्दित होते हैं ।१-३। चार वर्णों से हृदय और चार से ही शिर कहा गया है । आठ से शिखा और छै से कवच बताया गया है ।४। उतने ही से नमन कहा है और अस्त्र करणाक्षरों से होता है । वर्णों को क्रम के अनुसार शिर, ललाट, नेत्रों, मुख, बाहु, चरण, सन्धियों, साग्रों, कुक्षि, हृदय, कण्ड और दोनों पार्श्वों में, अपराङ्ग में और ककुद में न्यास करना चाहिये ।५-६। माणिक्याद्रिसमप्रभं निजरुचा संत्रस्तरक्षोगणम् । जानुन्यस्तकराम्बुजं त्रिनयनं रक्तोल्लसद्भूषणम् ॥ बाहुभ्यां धृतचक्रशंखमनिशं दंष्ट्राग्रवकोल्लस । ज्वालाजिह्वमुदग्रकेशनिचय ं वन्दे नृसिंहं विभुम् ।७ वर्णलक्षं जपेन्मन्त्रं तत्सहस्रं घृतप्लुतैः । पायसन्नैः प्रजहुयाद्विधिवत्पूजितेऽनले ।८ एवं कृते भवेन्मन्त्री सिद्धमन्त्रः प्रतापवान् । पूजा प्रागोरिते पीठे मूर्त्ति मूलेन कल्पयेत् ।६ पूजयेद्विधिवत्तस्यां दैत्यशत्रु मनन्यधीः । अङ्गान्यादौ समाराध्य दिग्दलेषु यजेत्पुनः ।१० पक्षीन्द्र शंकर ं मेषमव्रजयोनि यथाक्रमम् । श्रियं ह्रियं धृतिं पुष्टिमङ्- घ्यादिषु यजेत्ततः ।११ लोकपालाः समभ्यर्च्यस्तद्देस्त्राणि ..तः परम् । इत्थं जपादिभिः सिद्धे मनौ काम्यानि साधयेत् ।१२ अब नृसिंह भगवान् का ध्यान बतलाया जाता है—माणिक्य के पर्वत के समान प्रभा से समवेत—अपनी रुचि से राक्षसगणों को सत्रस्त करने वाले, जानुओं पर अपने कर-कमलों को न्यस्त किये हुए, तीन नेत्रों से समन्वित, रक्त उल्लसत् भूषणों से युक्त बाहुओं में निरन्तर चक्र और शंख को धारण करने वाले, दाढ़ों के अग्रभाग से उल्लासित ज्वाला-
३१८ । [ श्रीशारदा तिलक युत जीभ वाले, ऊपरकी ओर उठे हुए केशोंके समूहों से युक्त विभु भग- वान् नृसिंह की वन्दना करता हूँ ।७। इस मंत्र के जितने वर्ण हैं उतने ही लाख इस मन्त्र का जप करना चाहिए और उतने ही सहस्र घृत से प्लत पायसान्न से विधि के साथ समर्चित अग्नि में होम करे ।८। इस प्रकार से करने पर मन्त्रधारी सिद्ध मन्त्र वाला हो जाया करता है और प्रताप वाला होता है । पूर्व मे वर्णित पीठपर पूजा करनी चाहिए और मूल मन्त्र के द्वारा मूर्ति की कल्पना करनी चाहिये ।६। उसी मूर्ति में अनन्य धी वाला पुरुष दैत्यों के शत्रु नृसिंह भगवान् का विधि के साथ अर्चन करे । आदि में अङ्गों की समाराधना करके पुनः दिन्दलों में यजन करना चाहिये ।१०। फिर पक्षीन्द्र शंकर-शेष अन्य योनि का क्रमानुसार यजन करे । श्री-ह्री धृति-पुष्टि का अन्धू आदि में यजन करना चाहिये ।११। लोकपालों का भली भाँति अर्चन करे और इनके उपरान्त आगे उनके अस्त्रों का यजन करना चाहिये । इस प्रकार से जप आदि के द्वारा मन्त्र के सिद्ध हो जाने पर काम्य कर्मों का साधन करना चाहिए ।१२। उद्यत्कोटिरविप्रभं नरहरिं कोटीरहारोज्ज्वलम् । दंष्ट्राभीममुखं लसन्नखमुखैर्दीर्घैरनेकभुजैः । निर्भिन्नासुरनाथमग्निशशभृत्यूर्यात्मनेत्रत्रयम् । विद्युत्पुञ्जजटाकलापभयदं वह्निं वमन्तं भजे ।१३ सौम्ये सौम्यं स्मरेत्कार्ये क्रूरे क्रूरमिमं भजेत् । श्रीपुष्पैर्जुहुयान्मन्त्री बिल्वकाष्ठैंधितेनले ।१४ सहस्रं श्रियमाप्नोति पत्रैर्वा बिल्वसम्भवैः । प्रसूनैर्वा फलैस्तद्वद्दुर्वाहोतादरोगताम् ।१५ मन्त्रजप्तं वचां श्वेतां भक्षयेत्प्रातरन्वहम् । वाक्सिद्धिं लभते मन्त्री वाचस्पतिरिवापरः ।१६ सलिले देवमभ्यर्च्य गन्धपुष्पादिभिः शुभैः । दूर्वाभिस्तत्र जुहुयान्नित्यमष्टोत्तरं शतम् ।१७
चतुर्दश पटल ] [ ३१६ अब ध्यान कहा जाता है-उदीयमान करोड़ों सूर्यों के समान प्रभा से अन्वित-किरीट और हार से समुज्ज्वल दाढ़ों के द्वारा भीषण मुख से युक्त, कान्तियुक्त नखों और मुखों से जो दीर्घ, अनेक भुजाओंसे युक्त है-समन्वित असुरों के स्वामी हिरण्यकशिपु को विदीर्ण करने हुए-अग्नि और शश को धारण करने वाले सूर्य के स्वरूप वाले तीन नेत्रों से समन्वित विद्युत से पुंज के समान जटाओं के समुदाय से भय प्रदाता-वह्निका यजन करते हुए नृसिंह भगवान् का भजन करता हूँ ।१३। सौम्य कार्य में इनके सौम्य स्वरूप का तथा क्रूर कर्म में इन के क्रूर स्वरूपका सेवन करनाचाहिए। विल्व वृक्षके काष्ठोंकी समेधित अग्नि में अथवा पत्रों से श्री पुष्पोंके द्वारा मन्त्रधारी होम करे । एक सहस्र आहुतियों से श्रीको प्राप्ति किया करता है। प्रसूनों से अथवा फलों से उसी भाँति दूर्वा के होम से निरोगिता को प्राप्त किया करता है ।१४-१५। मन्त्र के द्वारा जप की हुई श्वेत वच का प्रति दिन प्रातः काल में भक्षण करे तो मन्त्रधारी वाक् सिद्धि को प्राप्त कर लेता है और दूसरे वाचस्पति के ही समान हो जाया करता है ।१६। जल में परम शुभ गन्ध पुष्पादि के द्वारा देव का अभ्यर्चन करके वहाँ पर नित्य ही अष्टोत्तर शत का होम करे ।१७। उपसर्गा विनश्यन्ति क्षुद्रभूतज्वरादिभिः । दुःस्वप्ने निशि संजाते स्नात्वा मन्त्रममुं जपेत् ।१८ अनिद्रो मन्त्रवित्पश्चात्सुस्वप्नस्तस्य जायते । व्याघ्रचौरमृगादिभ्यो महारण्ये भयाकुले ।१९ रक्षोन्मनु रयं जप्तो भयेष्वन्येषु मन्त्रिणम् । अनेन मन्त्रितं भस्म विषग्रहमहाभयान् ।२० नाशयेदचिरादेव मन्त्रस्यास्य प्रभावतः । घोरेऽभिचारे सोन्मादे महोत्पाते महाभये ।२१ पपेन्मंत्रं स्मरेद्देवं दुःखान्मुक्तो भवेन्नरः । सिंहरूपं महाभीमं नखदंष्ट्रातिभीषणम् ।२२
३२० ] [ श्रीशारदा तिलक स्मृत्वाऽऽत्मानं रिपुं पश्चाद्ध्यायेन्मृगशिशुं पुरः । गृहीत्वा गलदेशे तं पुनर्दिक्षु क्षिपेद्द्रुतम् ।२३ इसके करने पर क्षुद्र भूत ज्वर आदि के द्वारा होने वाले उपसर्ग विनष्ट हो जाया करते हैं। रवि में दुःस्वप्न केहो जाने पर स्नान करके इस मन्त्र का जप करना चाहिए। २८। इसके पीछे मन्त्र का ज्ञाता निद्रा रहित रहेतो उसको सुन्दर स्वप्नहुआ करता है। भयसे समाकुल महान् अरण्य में व्याघ्र चोर और मृगादि से यह जपा हुआ मंत्र रक्षा किया करता है तथा अन्य प्रकार के मंत्रों में भी यह मंत्रधारी की रक्षा करता है। इसके द्वारा अभिमंत्रित भस्म विष ग्रह के महान् भयों का तुरन्त ही विनाश कर दिया करता है। इस मन्त्र का यह प्रभाव होता है। घोर अभिचार मे उन्माद में महान् उत्पात में और महान् भय में इस महान् मंत्र का जप करे और देव का स्मरण करना चाहिए। इससे मनुष्य दुःख से विमुक्त हो जाया करता है। अपने आपको सिंह के स्वरूप वाला महान् भीषण नखों और दंष्ट्रा से अत्यन्त भयानक स्मरण करके इसके पश्चात् शत्रु को अपने आगे मृग के शिशु के रूप में ध्यान करना चाहिये। उसके कण्ठ को पकड़कर उसको शीघ्रही दिशाओं में क्षिप्त कर देवे ।१६-२३। पुत्रमित्रकलत्राद्यं रुच्चाटोजायते रिपोः । पूर्वमृत्युपदे साध्यनामकृत्वा स्वयं हरिः २४ निशितैखदंष्ट्राग्रैः खाद्यमानं रिपुं स्मरेत् । नित्यमष्टोत्तरशतं जपेन्मन्त्रमतन्द्रितः ।२५ जायते मण्डलादर्वाक् शत्रु वैवस्वतप्रियः । कुर्वीत यत्नं विधिवच्छत्रुसेनानिवारणे ।२६ बिभीतकाष्ठे ज्वलिते पावके रिपुमर्द्दनम् । विचित्य देवं नृहरिं सम्पूज्य कुसुमादिभिः ।२७ समूलतू (तूलम्) लैर्जुहुयाच्छरैर्दशशतं पृथक् । रिपुं खादन्निव जपेतिभेदन्निव च तान् जपे (क्षिपे) त ।२८
चतुर्दश पटल ] [ ३२१ हुत्वा सप्तदिनं मन्त्री सेनामिष्टा महीपतेः । प्रस्थापयेच्छुभेलग्ने परराज्यजयेच्छया ।२६ तस्याः पुरस्तान्नृहरिं निघ्नन्तं रिपुमण्डलम् । स्मृत्वा प्रयोगं कुर्वीत यावदायाति सा पुनः ।३० विजित्य निखिलाञ्छत्रून् सहवीरश्रिया सुखम् । आगत्य विजयी राजा ग्रामक्षेत्रधनादिभिः ।३१ प्रीणयेन्मन्त्रिणं सम्यग्विभवैः प्रीतमानसः । मन्त्री यदि न सन्तुष्टोह्यनर्थः स्यान्महीपतेः ।३२ बीजं साध्यसमन्वितं प्रविलिखेन्मध्येऽष्टपत्रेष्वथो । मन्त्रार्णान् श्रुतिशो विभज्य विलिखेत् लिप्या बहिर्वेष्टयेत् । यन्त्रं क्षुद्रविषग्रहाभयरिपुप्रध्वसनं श्रीप्रदम् ।३३ रिपु को पुत्र-मित्र-कलत्र आदि से उच्चाटन हो जाता है । पूर्व मृत्यु पद में ( मन्त्र में तो दो मृत्यपद है उनमें पिछले मृत्यु पद में ) साध्य का नाम करके हरि स्वयं पैने नखों के अग्र भागों के द्वारा खद्य- अर्थात् खाये जाने वाले अपने शत्रु का स्मरण करना चाहिए । तन्द्रा रहित होकर नित्य ही मन्त्र को एक सौ आठ बार जपे तो मण्डल से पहिले ही शत्रु यमराज का प्रिय अर्थात् मृत हो जाया करता है । विधि के साथ शत्रु के निवारण करने में यत्न करना चाहिए । २४- २६। बिभीत वृक्ष के काष्ठ से ज्वलित अग्नि में रिपु के मर्दन का ध्यान करके कुसुम आदि उपचारों से नृसिंह देव का पूजन करे । २७ मूल के सहित तूल शरों से पृथक् एक सहस्र का होम करे । रिपु को खाते हुये के समान तथा उसका भेदन करते हुये के समान जप करे ।२१। मन्त्रधारी सात दिन होम करके राजा को अभीष्ट सेना को शुभ लग्न में प्रस्थान करावे और दूसरे की राज्य की इच्छा से करावे ।२६। उस सेना के आगे रिपु मण्डल का निहनन करते हुये नृसिंह भगवान् का स्मरण करके जब तक फिर न आवे प्रयोग करे ।३०।
३२२ ] । श्रीशारदा तिलक इसका यह प्रभाव होता है कि विजय श्री के साथ सुख पूर्वक समस्त शत्रुओं को जीतकर राजा विजयी होता हुआ आकर ग्राम क्षेत्र धन आदि से भली भाँति प्रसन्न होकर विभवों से मन्त्रधारी को प्रीणित करे । यदि मन्त्रधारी सन्तुष्ट न होवे तो राजा का अनर्थ होता है । ।३१-३२। अब यन्त्र बतलाया जाता है—साध्य से समन्वित बीज को लिखे और आठ पत्रों में मध्य से श्रुतिशः विभाग करके मन्त्र के वर्षों को लिखना चाहिए । बाहर लिपि से वेष्टित कर देवे । बाह्य कोणों में गत बीज से बद्ध वसुधा गेह (भूपूर) दो से समावृत्त मन्त्र होता है। वह यन्त्र क्षुद्र, विष—ग्रह रोग—रिपुओं के नाश करने वाला तथा श्री का प्रदाता है । ३३। कृत्वा नवपदात्मानं मण्डलं यन्त्रसयुतम् । अस्मिन् संस्थापयेन्मन्त्री कलशान्नव शोभनान् ३४ कषायतयोसम्पूर्णान् वस्त्ररत्नादिसंयुतान् । मध्ये सम्पूजयेद्दे तृसिंह शान्तविग्रहम् । ३५ तार्क्ष्यादीन्तूजयेन्मन्त्रो पूर्वादिषु यथाक्रमम् । इति संसाधितैस्तौयैरभिषिञ्चेत्प्रियं नरम् । ३६ अभिचारग्रहोन्मादा विनश्यन्त्यरिभिः सह । अभिषिक्तस्तदा विप्रान् पूजयेद्देवता धिया ३७ यथावत्पूजयेत्पश्चाद्भक्त्या गुरुमवञ्चयत् । राजा विजयामाप्नोति युद्धेषुः विधिनाऽमुना । ३८ नौ पदों के स्वरूप वाले मण्डल की रचना करके जो मन्त्र से संयुत होवे । इसमें मन्त्रधारी पुरुष नौ परम शोभन कलशों की स्थापना करे । जो कषाय जल से परिपूर्ण और नौ रत्नादि से समन्वित होवे । मध्य में परम शान्त शरीर वाले नृसिंह देव का इस प्रकार से पूजन करना चाहिए ।३४-३५। मन्त्रधारी पूर्व आदि दिशाओं में क्रम के अनुसार तार्क्ष्य आदि का अर्चन करे । इस रीति से संसाधित जलों से प्रिय मनुष्य का अभिषिंचन करना चाहिए । ३६। अभिचार—यह— उन्माद शत्रुओं के साथ विनष्ट हो जाया करते हैं । उस समय में
चतुर्दश पटल ] [ ३२३ अभिषिक्त होकर विप्रों को देवता की बुद्धि से पूजा करनी चाहिये । ३७। इसके पीछे वंचना न करते हुए भक्ति की भावना से यथा रीति से गुरुदेव का अर्चन करे । इस विधि से राजा, युद्धों में विजय को प्राप्त किया करता है । ३८। वीजाङ्क गणपञ्चकं प्रविलिखेच्छेषस्य भोगे पुनः द्वात्रिंशत्पदसंयुते परिलिखेन्मन्त्राक्षराणि क्रमात् । पुच्छेनाम जपादिसाधितमिदं होमेन सम्पातितम् । भूतापस्मृतिदुःखरोगशमनं मन्त्रं रिपुध्वसनम् । ३६ क्षकारी वह्निमारूढो मनुस्वरसमन्वि : । बिन्दुनादलसन्नूर्द्धा बीजं नरहरेर्मतम् । ४० बीजं नमोभगवते नरसिंहाय तत्परम् । स्याज्जवालामालिने पश्चाद्दीप्तदंष्ट्रीय तत्परम् । ४१ अग्निनेत्राय सर्वादि दक्षोधनाय पदं वदेत् । सर्वभूतविनाशान्तं नकारो दीर्घवान् मेरुत् । ४२ सर्वज्वरविनाशान्ते नायाणौर्दहयुग्मकम् । पचद्वयं रक्षयुग्मं हुं फट् स्वाहा ध्रुवादिकाः । ४३ सप्तषष्ट्यक्षरैः प्रोक्तो ज्वालामाली महामुनिः । हृत्तयोदशिभिः प्रोक्तं शिरोदशभिरीरितम् । ४४ शिखैकादशभिः प्रोक्ता वर्माष्टादशभिर्मतम् । वर्णैर्द्वादशभिर्न्नैत्रमस्त्रं स्यात्करणाक्षरैः । ४५ फिर शेष के भोग में बीजों के गण पंचक को लिखे और क्रम से बत्तीस पद संयुक्त में मन्त्र के अक्षरोंको लिखना चाहिए । पुच्छ में नाम लिखे । इसको जपादि से साधित करे और होम से सम्पादित करे । यह मन्त्र भूत, अपस्मृति, दुःख, रोग का शमन करने वाला तथा शत्रुओं के ध्वंस करने वाला होता है । ३६। क्षकार वह्नि (रेफ) से संयुत होवे और मन्त्र के स्वरों से समन्वित होवे और विन्दु तथा नादसे उल्लसित मूर्द्धा वाला नृसिंह का बीज माना गया है । ४०। अब ज्वाला
३२४ ] [ श्रीशारदा तिलक नृसिंह मन्त्र को बताया जाता है-आदि में बीज फिर 'नमोभगवते'- यह पद, इसके बाद 'नरसिंहाय'-यह पद, पश्चात् 'ज्वाला मालिने'- यह पद, पीछे 'दीप्तदंष्ट्रा'-यह पद, फिर, 'अग्नि नेत्राय' यह पद, और सर्वादि में 'रक्षोघ्नाय'-यह पद बोलना चाहिए । 'सर्व भूत विनाशांत' के अन्त में दीर्घ नकार होता है। दो बार 'पच' शब्द और दो बार 'रक्ष' शब्द होता हैं, ध्रुव आदि में और 'हूँ फट् स्वाहा' यह पद होना चाहिये । यह सड़सठ अक्षरों वाला ज्वालामाली महा मन्त्र कहा गया है। इसका हृदय तेरह से बताया गया है और शिर दश से कहा है। द्वादश वर्णों से नेत्र तथा अस्त्र करणाक्षरों से कहा है । शिखा ग्यारह से और वर्म अठारह से बताया गया है ॥ ४१-४५। एवमङ्गानि विन्यस्य चिन्तयेन्मन्त्रदेवताम् ॥ ४६ उज्ज्वलप्रलयानालाभमयुग्मनेत्रमनारतम् । भासुरं शिखिनः शिखाभिरुदग्रदंष्ट्रिमुखाम्बुजम् ! रक्षासां भयदं विकीर्णजटाकलापविभीषणम् । शंशचक्रकृपाणखेटकधारिणं नृहरिं भजे ॥४७ लक्षमेकं जपेन्मन्त्रं तद्दशांशं समाहितः । कपिलाज्येन जुहुयात् समिद्धे हव्यवाहने ॥४८ प्रागुक्ते पूजयेत्पीठे देवं संप्रोक्तवर्त्मना । कुर्वीय मन्त्रराजोक्तान् प्रयोगान्मन्तुनाऽधुना ॥४६ विशेषात् क्षुद्रभूतारिनाशनोऽयं मनुः स्मृतः । पाशशक्तिर्नरहरिरंकुशो वर्म फट् मनुः ।५० षडक्षरो नरहरिः कथितः सर्वकामदः । ऋषिर्ब्रह्मा समुद्दिष्टः पंक्तिश्छन्द उदाहृतम् । देवता नरसिंहोऽस्य षड्बीजैरङ्गकल्पना ॥५१ इस रीति से अङ्गों का विन्यास करके मन्त्र के देवता का चिंतन करना चाहिए । अब ध्यान बतलाया जाता है-उज्ज्वल प्रणय की अग्नि की आभा के समान आभा वाले-निरन्तर अयुग्म नेत्र से युक्त,
चतुर्दश पटल ] [ ३२५ भासुर-शिखोंकी शिखाओंके समान उपदंष्ट्राओंसे युक्त मुख कमल वाले- राक्षसों को भय कर देने वाले-फैले हुये जटाओं के समुदाय से भीषण- शंख, चक्र, कृपाण और खेटक को धारण करने वाले भगवान् नरसिंह का भजन करता हूँ ।४६-४७। इस मन्त्र का एक लाख जप करना चाहिये । जप का दशांश कपिलाओंके घृतसे समद्धि अग्निमें परम समाहित होकर होम करे ।४८। पहिले बताये हुए पीठ पर कहे हुए मार्ग के द्वारा देवका पूजन करना चाहिये । इस मन्त्र के द्वारा मन्त्र में कहे हुए प्रयोगों को करना चाहिए ।४६। विशेष रूप से यह मन्त्र क्षुद्र, भूत-और शत्रुओं का विनाश करने वाला होता है ऐसा कहा गया है । पाश शक्ति है, नरहरि अंकुश है-और वर्म फट् होता है । यह नरहरि का मन्त्र छै अक्षरों वाला है और सब कामनाओं का प्रदाता कहा गया है । इसका ऋषि कहा गया है और पंक्ति छन्द बताया गया है । इसका देवता नरसिंह है । छै बीजों से अङ्गों को कल्पना करे ।५०-५१। कोपादालोलजिह्वं विवृतनिजमुखं सोमसूर्याग्निनेत्रं पादादनाभिरक्तप्रभमुपरि सितं भिन्नदैत्येन्द्रगात्रम् । चक्रं शंखं सपाशांकुशकुलिशगदादारुणान्युद्वहन्तम् । भीमं तीक्ष्णोग्रदंष्ट्रं मणिमयविविधाऽऽकल्पमीडे नृसिंहम् ।५२ तुलक्षं जपेदेतं घृतेन जुहुयात्ततः । तत्सहस्रं समिद्धेऽग्नौ तोषयेद्द्रविणैर्गुरुम् ।५३ अर्चा प्रागीरिते पीठेमूर्त्तिं भूलेन कल्पयेत् । अङ्गवृत्तैर्बहिष्चक्रं शंखं पाशाङ्कशौ पुनः ।५४ वज्रं कौमोदकीं खड्गखेटौ पत्रेषु पूजयेत् । इन्द्राद्यानेतदस्त्राणि पूजयेद्बाह्यतः सुधीः ।५५ अब ध्यान बताया जाता है-कोप से आलोल अर्थात् चंचल जिह्वा वाले-अपने मुख को खोले हुये-सोम, सूर्य और अग्नि के नेत्रों से युक्त करणों से नाभि पर्यन्त रक्त प्रभा संयुत ऊपर के भाग में सित-दैत्येन्द्र हिरण्यकशिपु के गात्र को विदीर्ण करने वाले-शंख, चक्र, पाश,
३२६ ] [ श्रीशारदा तिलक अंकुश, कुलिश गदा आदि दारुण आयुधों को धारण करते हुए-परम भीषण-तीक्ष्ण और उग्र दंष्ट्राओं से समन्वित, मणियों से परिपूर्ण अनेक भूषणों से भूषित भगवान् नृसिंह देव का मैं स्तवन करता हूँ ।५२। इस मन्त्र का छ लाख जप करे और उतने ही सहस्र घृत के द्वारा समिद्ध अग्नि में होम करना चाहिए । अपने गुरु को द्रव्य के दान द्वारा सन्तुष्ट करे ।५३। पहिले कथित पीठ पर पूजा करे और मूल मन्त्र से मूर्त्ति की कल्पना करनी चाहिए । अङ्ग वृत्त से बाहर चक्र-शंख-पाश- अंकुश-वज्र-कौमोदकी खड्ग-खेटक पत्रों में अर्चन करना चाहिये । उपासक को इन्द्र आदि का और इनके आयुधों की बाहर पूजा करनी चाहिये ।५४-५५। एवं कृत्वा पुरश्चयी मन्त्रेणानेन मन्त्रवित् । प्रयोगान् कल्पनिर्दिष्टान् कुर्यात् स्वस्यापरस्यवा ।५६ रक्तोत्पलस्त्रिमध्वक्तैः सहस्रं जुहुयान्नवैः । नित्यं मासाद्भवेदिष्टं वत्सराद्धनधान्यवान् ।५७ रक्तैस्त्रिमधुरोपेतैः पद्मैर्भानुसहस्रकम् । जुहुयान्महतीं लक्ष्मीमायुर्वश्यमवाप्नुयात् ।५८ लाजांस्त्रिमधुरोपेतान्प्रातः कालेषु जुह्वतः । कन्यासिद्धिर्भवेत्पश्चात्कन्यायाः सद्गरोभवेत् ।५६ दूर्वाः पयोघृताभ्यक्ता दशोत्तरशतं सुधीः । अन्वहं जुहुयात्सम्यग्दीर्घमायुरवाप्नुयात् ।६० तस्य रोगाः प्रणश्यन्ति कृत्याद्रोहादिभिः सह । सपञ्चगव्यं जुहुयादपामार्गस्य मञ्जरीः ।६१ नित्यं सहस्रमानेन सप्ताहं विजितेन्द्रियः । होमोऽयं सर्वथा भतकृत्यारोगान् प्रणाशयेत् ।६२ सतिलैराष्यपामार्गहविराज्यैर्यथाक्रमम् । द्विसहस्रं प्रजुहुयात् क्षुद्ररोगग्रहान् जयेत् ।६३
चतुर्दश पटल ] । ३२७ इस तरह से पुरश्चरण करने वाला मन्त्र का ज्ञाता इस मंत्र के द्वारा कल्प में निर्दिष्ट अपने अथवा दूसरे के प्रयोगों को करे ।५६। नवीन सहस्र उत्पलों को तीन मधुरों में अक्त करके नित्य होम करे तो एक ही मास में अभीष्ट की प्राप्ति होती है और एक वर्षमें धन धान्य- वान् हो जाया करता है ।५७। तीन मधुरों से उपेत रक्त पद्द्मों के द्व रा बारह सहस्र आहुतियां देवे तो लक्ष्मी आयु तथा वशीकरण की प्राप्ति होती है ।५८। तीन मधुरों से समुपेत लाजाओं का प्रातःकाल में हवन करने वाले पुरुष को कन्या की सिद्धि हो जाती है और कन्या को श्रेष्ठ वर की प्राप्तिहो जाया करती है ।५६। सपुरुष पय और घृतमें अव्यक्त दूर्वा का एक सौ दश वार प्रतिदिन होम करे तो भली भाँति दीर्घ आयु प्राप्त करता है ।६०। उस पुरुष के कृत्याद्रोह आदि के सहित सभी रोग नष्ट हो जाया करते हैं । अपामार्ग की मजरी से एक सप्ताह तक जिते- न्द्रिय रहकर होम करे तो यह होम सर्वदा भूत, कृत्या रोगों का विनाश कर दिया करता है ।६१-६२। क्रम के अनुसार ति-राजी-अपामार्ग- हवि-आज्य से दो सहस्र आहुतियां देवे तो क्षुद्र रोग और ग्रहों पर विजय प्राप्त कर लिया करता है ।६३। पयोक्तै रमृताखण्डैस्त्रिसहस्रं चतुर्दिनम् । अनेन विहितो हमो ग्रहज्वरविनाशनः ।६४ नृसिंहशक्तिबीजे द्वे शूले तारगते लिखेत् । तत्र ग्रहास्तं संस्थाप्य जपेन्मन्त्रं षडक्षरम् ।६५ अविश्य सद्यस्तं मुञ्चेद्ग्रहः क्रन्दन्भयाकुलः ।६६ आलिख्याग्निपुरद्वयं तदुदरे शक्तिं ससाध्यां लिखेत् । षट्कोणेषु षडक्षराण्यथमनोः किञ्जल्कसंस्थान् स्वरान् । पत्रेष्वष्टसु मन्त्रराजविहितान्वर्णान् क्रमाद्द्वादशः । काद्यर्णैः पुनरावृतं त्रितिपुरे कोणेषु चिन्तामणिम् ।६७ नारसिंहमिदद्यन्त्रं लिखितं भूर्जपत्रके । विधृतं शिरसा शीर्षरोगभूतज्वरान् हरेत् ।६८
३२८ ] [ श्रीशारदा तिलक दूध में अक्त अमृता (गिलोय) के खण्डोंके द्वारा दो सहस्र चार दिन तक होम करे उसके द्वारा किया हुआ होम यह ज्वर का विनाश करने वाला हुआ करता है ।६४। नृसिंह शक्ति के दो बीज और प्रणव गत शूलों को लिखे ! वहीं पर ग्रहोंसे आर्त्त व्यक्ति को स्थापित करके छं अक्षरों वाले मंत्र का जप करे। अविष्ट होकर तुरन्त ही भय से आकुल होकर रुदन करता हुआ यह उसको छोड़ दिया करता है ।६५। ६६। अग्नि पुर लिख कर उसके उदर में साध्य के सहित शक्ति का लेखन करे । छं कोणों में छ अक्षरों को लिखे मन्त्र के किंजल्को में स्थित स्वरों को और आठ पत्रों में मन्त्रराज में विहित वर्णोंकी क्रमसे लिखे । चारों ओर कादिवर्णों से त्रिपुर में कोणों में चिन्तमणि को पुनः आवृत्त करे ।६७। यह नरसिंह यन्त्र होता है। इसको भोज पत्र पर लिखे और इसको शिरपर बांधे तो यह दीर्घ रोग-भूत ज्वरोंका हरण किया करता है ।६८। बहुनात्र किमुक्तेन मन्त्रै तैरूदीरितैः । समोनास्ति मनुः कश्चिच्छायानुग्रहकारकः ६९ तारो भृगुर्वियद्भूयस्तदाढ्यं वह्निदीर्घयुक् । पावकः कवचान्तो मनुः सप्ताक्षरः स्मृतः ।७० अहिर्बुध्न्यो मुनिः प्रोक्तश्छन्दोऽनुष्टुबुदाहृतम् । देवता मुनिभिः प्रोक्तश्चक्ररूपीहरिः स्वयंम् ।७१ अचक्राय हृदाख्यातं विचक्राय शिरः स्मृतम् । सुचक्राय शिखा प्रोक्ता श्रीचक्राय तनुच्छदम् ।७२ सञ्चक्राय स्मृतं नेत्रं ज्वालाचक्राय तत्परम् । षडङ्गमन्त्राः प्रत्येकं द्विष्टान्ता जातिसंयुताः ।७३ ए ह्रीं चक्रेण बध्नामि नमश्चक्राय ठद्वयम् । मन्त्रेणानेन कुर्वीत दिशां प्रागादि बन्धनम् ।७४ यहाँ पर अत्यधिक कहने से क्या लाभ है। यही कहना पर्याप्त है कि इन उदीरित मन्त्रों के समान छायानुग्रह करने वाला अन्य कोई