भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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त्रयोदश पटल ] [ ३११ राजवृक्षसमुत्थाभिः समिद्भिर्ननुताऽमुना । त्रिसहस्रं प्रजुहुयात्तस्य स्युः सर्वसम्पदः ।१२६ शालिभिर्जुहुयान्मन्त्रो नित्यमष्टोत्तरं शतम् । समृद्धैर्धान्यसङ्घातैः शोभते तस्य मन्दिरम् । १२७ तावदाज्येन जुहुयान्मण्डलात्स्वर्णमाप्नुयात् । लाजै कन्यामवाप्नोति मध्वक्तैर्निजवाञ्छितम् ।१२८ संस्कार किए हुये अग्नि में भली-भाँति पाचन करे । मंत्रधारी मंत्र का जप करते हुये ही चरु का पाक करे । पीछे चरु को उतार लेना चाहिए । अग्नि में विधि के साथ देव का धूप दीप आदि के द्वारा यजन करके पुनः आज्य में प्लुत चरु संज्वलित वह्नि में अष्टो- त्तर शत आहुतियाँ देनी चाहिए ।१२२-१२३। इस रीति से सप्तारवारों में क्षेत्र की सिद्धि के लिये हवन करे भृगुवार में प्रातःकाल के समय में साध्य महा तल से मृत्तिका लाकर हवि सम्पादित कर सुधी पूर्व की ही भाँति होम करे । इससे चौरादि उपक्रमों के साथ क्षेत्र में विरोध होता है वह नष्ट हो जाता है । राजवृक्ष से समुद्भूते समिधाओं के द्वारा इस मन्त्र से तीन सहस्र आहुतियां देवें तो उसके पास सभी सम्पदायें हो जाया करती हैं ।१२४-१२६। मन्त्रधारी शालियों के द्वारा नित्य ही एक सौ आठ बार होम करे तो उसका मन्दिर धान्य के संघातोंसे और समृ- द्धियों से शोभित हो जाता है ।१२७। तब तक घृतसे होम करे जब तक मण्डल से स्वर्ण को प्राप्त करे । मधु से अक्त लाखाओं से होम करने से कन्या अपना वाञ्छित वर प्राप्त कर लिया करती है ।१२८। मधुरत्रयसंयुक्तै र्जुहुयादुत्पलै र्न्नवैः । महतीं श्रियमाप्नोति मण्डलात्पूर्वसंख्यया ।१२६ मध्ये बीजं सतारं दहनपुरयुगे चक्रवर्णान् षडस्रि- ष्वालिख्याङ्गि सन्धिष्वथ करणदलेरम्बुज केसरेषु । अष्टार्णान्विन्द्वमध्ये लिखतु वसुमितान्मन्त्रवर्णांश्चतुर्थे । शिष्टान्पत्रे पुरस्ताद्वपुदनकमले केमरस्थस्वरराड्ये ।१३०