भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 310, कुल 511 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 310

३१० ] [ श्रीशारदा तिलक प्रयच्छेज्जपपूजाद्यैर्धनधान्यमहीश्रियः । रवौ सिंहगतेऽष्टम्यां शुक्लपक्षे सितां शिलाम् । ११७ पञ्चगव्येषु निःक्षिप्य स्पृष्ट्वा तमयत जपेत् । उत्तराभिमुखोभूत्वा तां शिलां निखनेद्भुवि । ११८ शत्रु चोरमहाभूतैः कृतां बाधां प्रणाशयेत् । भानूदये भौमवारे साध्यक्षेत्रात्समाहरेत् । ११९ मृत्तिकां सज्जपमंत्री ताम्पुनर्विभजेत्त्रिधा । चुह्लयामेकां समालिख्य पाकपात्रे तथापराम् : १२० गोदुग्धे परमालोड्य शोधितांस्तण्डुलान् क्षिपेत् ।१२१ जप और पूजादि से धन धान्य-नहीं और भी दिया करते हैं । सिंह गत रवि के हो जाने पर अष्टमी में शुक्ल पक्ष में सित शिला को पंच- गव्य में निःक्षिप्त करके उसका स्पर्श करके दश सहस्र जप करे । उत्तर की ओर अभिमुख होकर उस शिला को भूमिमें गाड़ देवे । ११७-११८। इसका यह प्रभाव होता है कि यह शत्रु चोर महाभूतों के द्वारा की हुई बाधा का विनाश कर दिया करता है । सूर्योदय के समय भौम वार में साध्य क्षेत्र से मृतिका समाहरण करे । ११९। मन्त्रधारी उस को जप करता हुआ उसको फिर तीन भागों में विभक्त करे । एक को चूल्हे में लिपे और दूसरो को पाक पात्र में तीसरे को गोदुग्धमें आलोडित करके शोधित तन्डुलों क्षिप्त कर देवे ।१२०-१२१। संस्कृतेऽग्नौ पचेत्सम्यक् चरुं मन्त्री जपन्मनुम् । अवतार्य चरुं पश्चादग्नौ देवं यथाविधि ।१२२ धूपदीपादिकैरिष्ट्वा पुनराज्यप्लुप्तं चरुम् । जुहुयादेधिते वह्नौ यावदष्टोत्तरं शतम् । १२३ एवं सप्तारवारेष जहयात् क्षेत्रसिद्धये । प्रातःकाले भृगोर्वारे मृदं साध्यमहीतलात् ।१२४ आदाय हविरापाद्य पूर्ववज्जुहुयात् सुधीः । विरोधोनपश्यति क्षेत्रे सहचरौराद्यु पक्रमैः । १८५