शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 312, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें३१२ ] [ श्रीशारदा तिलक मन्त्राणान् वेदसंख्यान् दलमनुविलिखेदन्त्यमन्त्येऽथ वाह्यं । किञ्जल्कैः कादिवर्णैर्विकसितकमले षोडशारे यथावत् । मन्त्राणान्युग्मशस्तच्चरपमदलगतं शिष्टवर्णं लिखित्वा । तारक्षमाकोलबीजैस्तदनुपरिवृतं साध्यनामार्णमध्यैः । १३१. दर्भितैः साध्यनामार्णैर्मन्त्रवर्णैर्बृ त्तम्बहिः । भूविम्बेनास्य कोणेषु भूबीजं साध्यसंयुक्तम् । १३२ अष्टशूलेषु वाराह भबोज सहितं लिखेत् । सार्धीशबिन्दुगगनं बीजं वाराहमीरितम् । १३३ तीनों मधुरों से संयुत नवीन उत्पलों से होम करे तो मण्डल से पूर्व संख्या में करने से बहुत बड़ी श्री की प्राप्ति किया करता है । १२६। अब मन्त्र बतलाते हैं दहनपुर युग में परस्पर व्यति भिन्न षट्कोण के मध्य में प्रणव के सहित बीज अर्थात् साध्य-साधक के कर्म के सहित बीज को लिखे। और षट्कोण में अङ्गों को लिखकर सन्धियों में करण दलों से तथा केसरों में अम्बुज को लिखे। आठ वर्णों को पत्र मध्य में लिखे तथा वसुमती अर्थात् आठ परिमाण में मन्त्र के वर्णों को चतुर्थ लिखे। केसरों में स्थित स्वरों से आठ दलों वाले कमल में आने पत्र में लिखे । १३०। चार सख्या वाले मन्त्रके वर्णों को दलानुसार लिखे और अन्त्य को अन्त्य में लिखे। फिर इसके अनन्तर वाह्य में कादिवर्ण वाले किजल्कों से षोड़शार विकसित कमल में यथा रीति मन्त्र के वर्णों को युग्म से तच्चर पम दलगत वर्ण को लिखकर प्रणव-क्षमा- कोल बीजों से उसके अनुसार परिवृत करे । बाहिर साध्य के नाम के वर्णों के मध्य ताले दर्भित साध्य वर्णों से वृत करे । इसके कोणों में भूबिम्ब से साध्य से संयुत भूबीज को लिखे और अष्ट दलों में भूबीज से सहित वाराह को लिखना चाहिए । अब वाराही बीज को बतलाया जाता है । अधीश-आकार, गमन-हवार, बिन्दु-अनुस्वार-यही वाराह बीज कहा गया है ।१३१-१३३।