भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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चतुर्दश पटल ] [ ३२५ भासुर-शिखोंकी शिखाओंके समान उपदंष्ट्राओंसे युक्त मुख कमल वाले- राक्षसों को भय कर देने वाले-फैले हुये जटाओं के समुदाय से भीषण- शंख, चक्र, कृपाण और खेटक को धारण करने वाले भगवान् नरसिंह का भजन करता हूँ ।४६-४७। इस मन्त्र का एक लाख जप करना चाहिये । जप का दशांश कपिलाओंके घृतसे समद्धि अग्निमें परम समाहित होकर होम करे ।४८। पहिले बताये हुए पीठ पर कहे हुए मार्ग के द्वारा देवका पूजन करना चाहिये । इस मन्त्र के द्वारा मन्त्र में कहे हुए प्रयोगों को करना चाहिए ।४६। विशेष रूप से यह मन्त्र क्षुद्र, भूत-और शत्रुओं का विनाश करने वाला होता है ऐसा कहा गया है । पाश शक्ति है, नरहरि अंकुश है-और वर्म फट् होता है । यह नरहरि का मन्त्र छै अक्षरों वाला है और सब कामनाओं का प्रदाता कहा गया है । इसका ऋषि कहा गया है और पंक्ति छन्द बताया गया है । इसका देवता नरसिंह है । छै बीजों से अङ्गों को कल्पना करे ।५०-५१। कोपादालोलजिह्वं विवृतनिजमुखं सोमसूर्याग्निनेत्रं पादादनाभिरक्तप्रभमुपरि सितं भिन्नदैत्येन्द्रगात्रम् । चक्रं शंखं सपाशांकुशकुलिशगदादारुणान्युद्वहन्तम् । भीमं तीक्ष्णोग्रदंष्ट्रं मणिमयविविधाऽऽकल्पमीडे नृसिंहम् ।५२ तुलक्षं जपेदेतं घृतेन जुहुयात्ततः । तत्सहस्रं समिद्धेऽग्नौ तोषयेद्द्रविणैर्गुरुम् ।५३ अर्चा प्रागीरिते पीठेमूर्त्तिं भूलेन कल्पयेत् । अङ्गवृत्तैर्बहिष्चक्रं शंखं पाशाङ्कशौ पुनः ।५४ वज्रं कौमोदकीं खड्गखेटौ पत्रेषु पूजयेत् । इन्द्राद्यानेतदस्त्राणि पूजयेद्बाह्यतः सुधीः ।५५ अब ध्यान बताया जाता है-कोप से आलोल अर्थात् चंचल जिह्वा वाले-अपने मुख को खोले हुये-सोम, सूर्य और अग्नि के नेत्रों से युक्त करणों से नाभि पर्यन्त रक्त प्रभा संयुत ऊपर के भाग में सित-दैत्येन्द्र हिरण्यकशिपु के गात्र को विदीर्ण करने वाले-शंख, चक्र, पाश,