शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 326, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें३२६ ] [ श्रीशारदा तिलक अंकुश, कुलिश गदा आदि दारुण आयुधों को धारण करते हुए-परम भीषण-तीक्ष्ण और उग्र दंष्ट्राओं से समन्वित, मणियों से परिपूर्ण अनेक भूषणों से भूषित भगवान् नृसिंह देव का मैं स्तवन करता हूँ ।५२। इस मन्त्र का छ लाख जप करे और उतने ही सहस्र घृत के द्वारा समिद्ध अग्नि में होम करना चाहिए । अपने गुरु को द्रव्य के दान द्वारा सन्तुष्ट करे ।५३। पहिले कथित पीठ पर पूजा करे और मूल मन्त्र से मूर्त्ति की कल्पना करनी चाहिए । अङ्ग वृत्त से बाहर चक्र-शंख-पाश- अंकुश-वज्र-कौमोदकी खड्ग-खेटक पत्रों में अर्चन करना चाहिये । उपासक को इन्द्र आदि का और इनके आयुधों की बाहर पूजा करनी चाहिये ।५४-५५। एवं कृत्वा पुरश्चयी मन्त्रेणानेन मन्त्रवित् । प्रयोगान् कल्पनिर्दिष्टान् कुर्यात् स्वस्यापरस्यवा ।५६ रक्तोत्पलस्त्रिमध्वक्तैः सहस्रं जुहुयान्नवैः । नित्यं मासाद्भवेदिष्टं वत्सराद्धनधान्यवान् ।५७ रक्तैस्त्रिमधुरोपेतैः पद्मैर्भानुसहस्रकम् । जुहुयान्महतीं लक्ष्मीमायुर्वश्यमवाप्नुयात् ।५८ लाजांस्त्रिमधुरोपेतान्प्रातः कालेषु जुह्वतः । कन्यासिद्धिर्भवेत्पश्चात्कन्यायाः सद्गरोभवेत् ।५६ दूर्वाः पयोघृताभ्यक्ता दशोत्तरशतं सुधीः । अन्वहं जुहुयात्सम्यग्दीर्घमायुरवाप्नुयात् ।६० तस्य रोगाः प्रणश्यन्ति कृत्याद्रोहादिभिः सह । सपञ्चगव्यं जुहुयादपामार्गस्य मञ्जरीः ।६१ नित्यं सहस्रमानेन सप्ताहं विजितेन्द्रियः । होमोऽयं सर्वथा भतकृत्यारोगान् प्रणाशयेत् ।६२ सतिलैराष्यपामार्गहविराज्यैर्यथाक्रमम् । द्विसहस्रं प्रजुहुयात् क्षुद्ररोगग्रहान् जयेत् ।६३