भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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३१४ ] [ श्रीशारदा तिलक कष्ट नहीं हो सकता । धरणि के अन्त में धरे दो वार दो ठकार अन्त में है और आदि में ध्रुव है-यह इक्कीस-वर्णोंमें आढ्य मन्त्रहोता है । इसका हृदय धरा कहा गया है। इसका ऋषि वराहहै और निचृद छन्द होताहै। इसका देवता समस्त प्राणियोंको प्रकृति धरा मानी गयी है । १३७-१४१। हृदयं त्रिभिराख्यातं चतुर्भिः शिर ईरितम् । त्रिभिः शिखा समुद्दिष्टा कवचं पञ्चभिर्मतम् । १४२ द्वाभ्यां नेत्रं समाख्यातं द्वाभ्यामस्त्रं पुनर्भवेत् । मन्त्रवर्णैः षडङ्गानि कुर्यादेवं विधानवित् । १४३ श्यामां विचित्रांऽशुकरत्नभूषणां पद्मासनां तुङ्गपयोधरोन्नताम् । इन्दीवरे द्वे नवशालिमञ्जरीं शुकं दधानां वसुधांभजामहे । १४४ लक्षमेकं जपेन्मन्त्रं धराहृदयमादरात् । स सर्पिषा पायसेन जुहुयात्तद्दशांशतः । १४५ तां विष्णोः पूजयेत्पीठे वक्ष्यमाणविधानतः । अङ्गानि पूजयेदादौ भूवह्निजलमारुतान् । १४६ दिक्पत्रेषु गमभ्यर्च्य कोणपत्रेषु तत्कलाः । आशापालाः पुनः पूज्या वज्राद्यसमन्विताः । १४७ तीन से हृदय कहा गया है और चार से शिर होता है । तीन से शिखा समुद्दिष्ट की गयी है और कवच पाँच से बताया है । १४२। दो से नेत्र और पुनः दो से अस्त्र होता है । विधान का ज्ञान रखने वाला पुरुष इस प्रकार से मन्त्र के वर्णों के द्वारा षट् अङ्गों को करे । १४३। अब ध्यान हैं-श्याम वर्ण से युक्त-अद्‍भुत वस्त्रों और रत्नोंके आभूषणोंसे भूषित-पद्म के आसन पर विराजमान-तुङ्गपयोधरों से समुन्नत हो इन्दीवर-नवीन शाली की मंजरी और शुक को धारण करने वाली वसुधा का भजन करते हैं । १४४। बड़े आदर के साथ इस धरा हृदय मन्त्र का एक लाख जप करे । जपका दशांश घृतसे संयुत पायस से होम करना चाहिये । १४५। उस का भगवान् विष्णु के पीठ पर वक्ष्यमान (आगे कहे जाने वाले) विधान से पूजन करे । आदिमें अङ्गों का यजन