भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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त्रयोदश पटल ] [ ३१५ करना चाहिये । भू वह्नि-जल-मारुत का दिक् पत्रों में भली-भाँति अर्चन करके कोण पत्रों में उनकी कलाओं का यजन करे। फिर दिक्पालों का वज्र आदि अस्त्रों से समन्वितों का पूजन करना चाहिए ।१४६-१४७। एव सिद्धमनुमंन्त्रो साधयेत् स्वमनोरथान् । मधुरत्रयसंयुक्त' जुक्ष्यादरुणोत्पलैः ।१४८ सहस्र भूसमृद्धिः स्यात्तथा नीलोत्पलै शुभैः । प्रियङ्गपुष्पैर्मध्वक्तैर्धनधान्यमहोश्रियः ।१४६ मञ्जरीं शालिसम्भूतां मधुरत्रयलोलिताम् । जुहुयात्साधियते वह्नौ मण्डलात् स्याद्धरापतिः ।१५० शुक्रवारे दिनमुख गृहीत्वा साध्यभूमृदस् । तामम्भसि विनिः क्षिप्य शोधितेऽत्र चरुं पचेत् ।१५१ पयोगृताभ्यां सहितं जुहुयात्त हुताशने । षण्मासं शुक्रवारेषु हुत्वैवं प्राप्नुयान्महीम् ।१५२ धरामेवं पपेन्मन्त्रो पशुरत्नधनादिभिः । धरायाः वल्लभः स स्यान्नात्र कार्या विचारणा ।१५३ इस प्रकार से मन्त्र सिद्ध कर लेने वाला मन्त्रधारी अपने मनोरथों को साधित किया करता है । तीनों मधुरोंसे संयुत अरुणोत्पलों के द्वारा हवन करना चाहिए ।१४८। एक सहस्र आहुतियों के देने से भूमि की समृद्धि होती है । शुभ नीलोत्पलों-प्रियंगु-पुष्पों को मधु में अक्त करके उनसे होम करे तो धन-धान्य-भूमि और श्री की वृद्धि होती है । शाली की मञ्जरी को तीनों मधुरों में लोलित करके साधित वह्नि में होम करे तो मण्डल से धरापति हो जाया करता है ।१४६-१५०। शुक्रवार में प्रातःकाल में साध्य की भूमि की मृत्तिका को ग्रहण करके उसको शोधित जल में डालकर इसमें चरुका पाचन करना चाहिये ।१५१। उसका पय और घृत में सहित रखकर अग्नि में होम करना चाहिए । छ मास तक शुक्रवारों में इसी प्रकार से होम करके मही की