भारतकोश
संग्रह पर लौटें

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

त्रयोदश पटल ] [ ३१५ करना चाहिये । भू वह्नि-जल-मारुत का दिक् पत्रों में भली-भाँति अर्चन करके कोण पत्रों में उनकी कलाओं का यजन करे। फिर दिक्पालों का वज्र आदि अस्त्रों से समन्वितों का पूजन करना चाहिए ।१४६-१४७। एव सिद्धमनुमंन्त्रो साधयेत् स्वमनोरथान् । मधुरत्रयसंयुक्त' जुक्ष्यादरुणोत्पलैः ।१४८ सहस्र भूसमृद्धिः स्यात्तथा नीलोत्पलै शुभैः । प्रियङ्गपुष्पैर्मध्वक्तैर्धनधान्यमहोश्रियः ।१४६ मञ्जरीं शालिसम्भूतां मधुरत्रयलोलिताम् । जुहुयात्साधियते वह्नौ मण्डलात् स्याद्धरापतिः ।१५० शुक्रवारे दिनमुख गृहीत्वा साध्यभूमृदस् । तामम्भसि विनिः क्षिप्य शोधितेऽत्र चरुं पचेत् ।१५१ पयोगृताभ्यां सहितं जुहुयात्त हुताशने । षण्मासं शुक्रवारेषु हुत्वैवं प्राप्नुयान्महीम् ।१५२ धरामेवं पपेन्मन्त्रो पशुरत्नधनादिभिः । धरायाः वल्लभः स स्यान्नात्र कार्या विचारणा ।१५३ इस प्रकार से मन्त्र सिद्ध कर लेने वाला मन्त्रधारी अपने मनोरथों को साधित किया करता है । तीनों मधुरोंसे संयुत अरुणोत्पलों के द्वारा हवन करना चाहिए ।१४८। एक सहस्र आहुतियों के देने से भूमि की समृद्धि होती है । शुभ नीलोत्पलों-प्रियंगु-पुष्पों को मधु में अक्त करके उनसे होम करे तो धन-धान्य-भूमि और श्री की वृद्धि होती है । शाली की मञ्जरी को तीनों मधुरों में लोलित करके साधित वह्नि में होम करे तो मण्डल से धरापति हो जाया करता है ।१४६-१५०। शुक्रवार में प्रातःकाल में साध्य की भूमि की मृत्तिका को ग्रहण करके उसको शोधित जल में डालकर इसमें चरुका पाचन करना चाहिये ।१५१। उसका पय और घृत में सहित रखकर अग्नि में होम करना चाहिए । छ मास तक शुक्रवारों में इसी प्रकार से होम करके मही की

३१६ ] [ श्रीशारदा तिलक प्राप्त किया करता है। ५२। मंत्रधारी इस प्रकार से धरा का जप करे तो पशु-रत्न-धन आदि के साथ वह धरा का स्वामी होता है इसमें कुछ भी विचारणा नहीं करनी चाहिए। ५३। ―― चतुर्दश पटल ॥ नारसिंह प्रकरण ॥ अथाभिधास्ये विधिवन्नारसिंहं महामनुम् । उग्रं वीरं वदेत्पूर्वं महाविष्णुमनन्तरम् । १। ज्वलन्तं पदमाभाष्य सर्वतोमुखमीरयेत् । नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं वदेत्ततः ।२ नमाम्यहमयं प्रोक्तो मन्त्रराजः सुरद्रुमः । ऋषिर्ब्रह्मा समुद्दिष्टश्छन्दोऽनुष्टुबुदाहृतम् । देवता नरसिंहः स्यात्सुरासुरनमस्कृतः । ३ चतुर्भिर्हृदयं वर्णैः शिरस्तावद्भिरेरितम् । शिखाऽष्टाभिः समुद्दिष्टा षड्भिः कवचमीरितम् ।४ तावद्भिर्नयनं प्रोक्तमस्त्रं स्यात्करणाक्षरैः । शिरोललाटनेत्रेषु मुखबाह्वङ्घ्रिसन्धिषु । ५ साग्रेषु कुक्षौ हृदये गले पार्श्वद्वये पुनः । अपरांगे ककुदि च न्यसेद्वर्णान्यथाक्रमात् । ६ इसके अनन्तर विधि के साथ नृसिंह के महान् मंत्र राज के विषय में बतलाऊँगा-पूर्व में-उग्र वीर-इन पदों को कहे। इसके अनन्तर 'महाविष्णु' इसको बोले । फिर 'ज्वलन्त'-इस पद को कहकर 'सर्वतो मुख' यह कहना चाहिये । इसके उपरान्त नृसिंह भीषण भद्र मृत्युमृत्यु' इन पदों को कहे। फिर 'नमाम्यहम्" यह कहे—यह मंत्रराज कह।

चतुर्दश पटल ] [ ३१७ गया है जो कल्प वृक्ष के समान होता है । इसका ऋषि ब्रह्मा, अनुष्टुप् छन्द कहा गया है । इसके देवता नृसिंह हैं जो सभी सुरों और असुरों के द्वारा वन्दित होते हैं ।१-३। चार वर्णों से हृदय और चार से ही शिर कहा गया है । आठ से शिखा और छै से कवच बताया गया है ।४। उतने ही से नमन कहा है और अस्त्र करणाक्षरों से होता है । वर्णों को क्रम के अनुसार शिर, ललाट, नेत्रों, मुख, बाहु, चरण, सन्धियों, साग्रों, कुक्षि, हृदय, कण्ड और दोनों पार्श्वों में, अपराङ्ग में और ककुद में न्यास करना चाहिये ।५-६। माणिक्याद्रिसमप्रभं निजरुचा संत्रस्तरक्षोगणम् । जानुन्यस्तकराम्बुजं त्रिनयनं रक्तोल्लसद्भूषणम् ॥ बाहुभ्यां धृतचक्रशंखमनिशं दंष्ट्राग्रवकोल्लस । ज्वालाजिह्वमुदग्रकेशनिचय ं वन्दे नृसिंहं विभुम् ।७ वर्णलक्षं जपेन्मन्त्रं तत्सहस्रं घृतप्लुतैः । पायसन्नैः प्रजहुयाद्विधिवत्पूजितेऽनले ।८ एवं कृते भवेन्मन्त्री सिद्धमन्त्रः प्रतापवान् । पूजा प्रागोरिते पीठे मूर्त्ति मूलेन कल्पयेत् ।६ पूजयेद्विधिवत्तस्यां दैत्यशत्रु मनन्यधीः । अङ्गान्यादौ समाराध्य दिग्दलेषु यजेत्पुनः ।१० पक्षीन्द्र शंकर ं मेषमव्रजयोनि यथाक्रमम् । श्रियं ह्रियं धृतिं पुष्टिमङ्- घ्यादिषु यजेत्ततः ।११ लोकपालाः समभ्यर्च्यस्तद्देस्त्राणि ..तः परम् । इत्थं जपादिभिः सिद्धे मनौ काम्यानि साधयेत् ।१२ अब नृसिंह भगवान् का ध्यान बतलाया जाता है—माणिक्य के पर्वत के समान प्रभा से समवेत—अपनी रुचि से राक्षसगणों को सत्रस्त करने वाले, जानुओं पर अपने कर-कमलों को न्यस्त किये हुए, तीन नेत्रों से समन्वित, रक्त उल्लसत् भूषणों से युक्त बाहुओं में निरन्तर चक्र और शंख को धारण करने वाले, दाढ़ों के अग्रभाग से उल्लासित ज्वाला-

३१८ । [ श्रीशारदा तिलक युत जीभ वाले, ऊपरकी ओर उठे हुए केशोंके समूहों से युक्त विभु भग- वान् नृसिंह की वन्दना करता हूँ ।७। इस मंत्र के जितने वर्ण हैं उतने ही लाख इस मन्त्र का जप करना चाहिए और उतने ही सहस्र घृत से प्लत पायसान्न से विधि के साथ समर्चित अग्नि में होम करे ।८। इस प्रकार से करने पर मन्त्रधारी सिद्ध मन्त्र वाला हो जाया करता है और प्रताप वाला होता है । पूर्व मे वर्णित पीठपर पूजा करनी चाहिए और मूल मन्त्र के द्वारा मूर्ति की कल्पना करनी चाहिये ।६। उसी मूर्ति में अनन्य धी वाला पुरुष दैत्यों के शत्रु नृसिंह भगवान् का विधि के साथ अर्चन करे । आदि में अङ्गों की समाराधना करके पुनः दिन्दलों में यजन करना चाहिये ।१०। फिर पक्षीन्द्र शंकर-शेष अन्य योनि का क्रमानुसार यजन करे । श्री-ह्री धृति-पुष्टि का अन्धू आदि में यजन करना चाहिये ।११। लोकपालों का भली भाँति अर्चन करे और इनके उपरान्त आगे उनके अस्त्रों का यजन करना चाहिये । इस प्रकार से जप आदि के द्वारा मन्त्र के सिद्ध हो जाने पर काम्य कर्मों का साधन करना चाहिए ।१२। उद्यत्कोटिरविप्रभं नरहरिं कोटीरहारोज्ज्वलम् । दंष्ट्राभीममुखं लसन्नखमुखैर्दीर्घैरनेकभुजैः । निर्भिन्नासुरनाथमग्निशशभृत्यूर्यात्मनेत्रत्रयम् । विद्युत्पुञ्जजटाकलापभयदं वह्निं वमन्तं भजे ।१३ सौम्ये सौम्यं स्मरेत्कार्ये क्रूरे क्रूरमिमं भजेत् । श्रीपुष्पैर्जुहुयान्मन्त्री बिल्वकाष्ठैंधितेनले ।१४ सहस्रं श्रियमाप्नोति पत्रैर्वा बिल्वसम्भवैः । प्रसूनैर्वा फलैस्तद्वद्दुर्वाहोतादरोगताम् ।१५ मन्त्रजप्तं वचां श्वेतां भक्षयेत्प्रातरन्वहम् । वाक्सिद्धिं लभते मन्त्री वाचस्पतिरिवापरः ।१६ सलिले देवमभ्यर्च्य गन्धपुष्पादिभिः शुभैः । दूर्वाभिस्तत्र जुहुयान्नित्यमष्टोत्तरं शतम् ।१७

चतुर्दश पटल ] [ ३१६ अब ध्यान कहा जाता है-उदीयमान करोड़ों सूर्यों के समान प्रभा से अन्वित-किरीट और हार से समुज्ज्वल दाढ़ों के द्वारा भीषण मुख से युक्त, कान्तियुक्त नखों और मुखों से जो दीर्घ, अनेक भुजाओंसे युक्त है-समन्वित असुरों के स्वामी हिरण्यकशिपु को विदीर्ण करने हुए-अग्नि और शश को धारण करने वाले सूर्य के स्वरूप वाले तीन नेत्रों से समन्वित विद्युत से पुंज के समान जटाओं के समुदाय से भय प्रदाता-वह्निका यजन करते हुए नृसिंह भगवान् का भजन करता हूँ ।१३। सौम्य कार्य में इनके सौम्य स्वरूप का तथा क्रूर कर्म में इन के क्रूर स्वरूपका सेवन करनाचाहिए। विल्व वृक्षके काष्ठोंकी समेधित अग्नि में अथवा पत्रों से श्री पुष्पोंके द्वारा मन्त्रधारी होम करे । एक सहस्र आहुतियों से श्रीको प्राप्ति किया करता है। प्रसूनों से अथवा फलों से उसी भाँति दूर्वा के होम से निरोगिता को प्राप्त किया करता है ।१४-१५। मन्त्र के द्वारा जप की हुई श्वेत वच का प्रति दिन प्रातः काल में भक्षण करे तो मन्त्रधारी वाक् सिद्धि को प्राप्त कर लेता है और दूसरे वाचस्पति के ही समान हो जाया करता है ।१६। जल में परम शुभ गन्ध पुष्पादि के द्वारा देव का अभ्यर्चन करके वहाँ पर नित्य ही अष्टोत्तर शत का होम करे ।१७। उपसर्गा विनश्यन्ति क्षुद्रभूतज्वरादिभिः । दुःस्वप्ने निशि संजाते स्नात्वा मन्त्रममुं जपेत् ।१८ अनिद्रो मन्त्रवित्पश्चात्सुस्वप्नस्तस्य जायते । व्याघ्रचौरमृगादिभ्यो महारण्ये भयाकुले ।१९ रक्षोन्मनु रयं जप्तो भयेष्वन्येषु मन्त्रिणम् । अनेन मन्त्रितं भस्म विषग्रहमहाभयान् ।२० नाशयेदचिरादेव मन्त्रस्यास्य प्रभावतः । घोरेऽभिचारे सोन्मादे महोत्पाते महाभये ।२१ पपेन्मंत्रं स्मरेद्देवं दुःखान्मुक्तो भवेन्नरः । सिंहरूपं महाभीमं नखदंष्ट्रातिभीषणम् ।२२

३२० ] [ श्रीशारदा तिलक स्मृत्वाऽऽत्मानं रिपुं पश्चाद्ध्यायेन्मृगशिशुं पुरः । गृहीत्वा गलदेशे तं पुनर्दिक्षु क्षिपेद्द्रुतम् ।२३ इसके करने पर क्षुद्र भूत ज्वर आदि के द्वारा होने वाले उपसर्ग विनष्ट हो जाया करते हैं। रवि में दुःस्वप्न केहो जाने पर स्नान करके इस मन्त्र का जप करना चाहिए। २८। इसके पीछे मन्त्र का ज्ञाता निद्रा रहित रहेतो उसको सुन्दर स्वप्नहुआ करता है। भयसे समाकुल महान् अरण्य में व्याघ्र चोर और मृगादि से यह जपा हुआ मंत्र रक्षा किया करता है तथा अन्य प्रकार के मंत्रों में भी यह मंत्रधारी की रक्षा करता है। इसके द्वारा अभिमंत्रित भस्म विष ग्रह के महान् भयों का तुरन्त ही विनाश कर दिया करता है। इस मन्त्र का यह प्रभाव होता है। घोर अभिचार मे उन्माद में महान् उत्पात में और महान् भय में इस महान् मंत्र का जप करे और देव का स्मरण करना चाहिए। इससे मनुष्य दुःख से विमुक्त हो जाया करता है। अपने आपको सिंह के स्वरूप वाला महान् भीषण नखों और दंष्ट्रा से अत्यन्त भयानक स्मरण करके इसके पश्चात् शत्रु को अपने आगे मृग के शिशु के रूप में ध्यान करना चाहिये। उसके कण्ठ को पकड़कर उसको शीघ्रही दिशाओं में क्षिप्त कर देवे ।१६-२३। पुत्रमित्रकलत्राद्यं रुच्चाटोजायते रिपोः । पूर्वमृत्युपदे साध्यनामकृत्वा स्वयं हरिः २४ निशितैखदंष्ट्राग्रैः खाद्यमानं रिपुं स्मरेत् । नित्यमष्टोत्तरशतं जपेन्मन्त्रमतन्द्रितः ।२५ जायते मण्डलादर्वाक् शत्रु वैवस्वतप्रियः । कुर्वीत यत्नं विधिवच्छत्रुसेनानिवारणे ।२६ बिभीतकाष्ठे ज्वलिते पावके रिपुमर्द्दनम् । विचित्य देवं नृहरिं सम्पूज्य कुसुमादिभिः ।२७ समूलतू (तूलम्) लैर्जुहुयाच्छरैर्दशशतं पृथक् । रिपुं खादन्निव जपेतिभेदन्निव च तान् जपे (क्षिपे) त ।२८

चतुर्दश पटल ] [ ३२१ हुत्वा सप्तदिनं मन्त्री सेनामिष्टा महीपतेः । प्रस्थापयेच्छुभेलग्ने परराज्यजयेच्छया ।२६ तस्याः पुरस्तान्नृहरिं निघ्नन्तं रिपुमण्डलम् । स्मृत्वा प्रयोगं कुर्वीत यावदायाति सा पुनः ।३० विजित्य निखिलाञ्छत्रून् सहवीरश्रिया सुखम् । आगत्य विजयी राजा ग्रामक्षेत्रधनादिभिः ।३१ प्रीणयेन्मन्त्रिणं सम्यग्विभवैः प्रीतमानसः । मन्त्री यदि न सन्तुष्टोह्यनर्थः स्यान्महीपतेः ।३२ बीजं साध्यसमन्वितं प्रविलिखेन्मध्येऽष्टपत्रेष्वथो । मन्त्रार्णान् श्रुतिशो विभज्य विलिखेत् लिप्या बहिर्वेष्टयेत् । यन्त्रं क्षुद्रविषग्रहाभयरिपुप्रध्वसनं श्रीप्रदम् ।३३ रिपु को पुत्र-मित्र-कलत्र आदि से उच्चाटन हो जाता है । पूर्व मृत्यु पद में ( मन्त्र में तो दो मृत्यपद है उनमें पिछले मृत्यु पद में ) साध्य का नाम करके हरि स्वयं पैने नखों के अग्र भागों के द्वारा खद्य- अर्थात् खाये जाने वाले अपने शत्रु का स्मरण करना चाहिए । तन्द्रा रहित होकर नित्य ही मन्त्र को एक सौ आठ बार जपे तो मण्डल से पहिले ही शत्रु यमराज का प्रिय अर्थात् मृत हो जाया करता है । विधि के साथ शत्रु के निवारण करने में यत्न करना चाहिए । २४- २६। बिभीत वृक्ष के काष्ठ से ज्वलित अग्नि में रिपु के मर्दन का ध्यान करके कुसुम आदि उपचारों से नृसिंह देव का पूजन करे । २७ मूल के सहित तूल शरों से पृथक् एक सहस्र का होम करे । रिपु को खाते हुये के समान तथा उसका भेदन करते हुये के समान जप करे ।२१। मन्त्रधारी सात दिन होम करके राजा को अभीष्ट सेना को शुभ लग्न में प्रस्थान करावे और दूसरे की राज्य की इच्छा से करावे ।२६। उस सेना के आगे रिपु मण्डल का निहनन करते हुये नृसिंह भगवान् का स्मरण करके जब तक फिर न आवे प्रयोग करे ।३०।

३२२ ] । श्रीशारदा तिलक इसका यह प्रभाव होता है कि विजय श्री के साथ सुख पूर्वक समस्त शत्रुओं को जीतकर राजा विजयी होता हुआ आकर ग्राम क्षेत्र धन आदि से भली भाँति प्रसन्न होकर विभवों से मन्त्रधारी को प्रीणित करे । यदि मन्त्रधारी सन्तुष्ट न होवे तो राजा का अनर्थ होता है । ।३१-३२। अब यन्त्र बतलाया जाता है—साध्य से समन्वित बीज को लिखे और आठ पत्रों में मध्य से श्रुतिशः विभाग करके मन्त्र के वर्षों को लिखना चाहिए । बाहर लिपि से वेष्टित कर देवे । बाह्य कोणों में गत बीज से बद्ध वसुधा गेह (भूपूर) दो से समावृत्त मन्त्र होता है। वह यन्त्र क्षुद्र, विष—ग्रह रोग—रिपुओं के नाश करने वाला तथा श्री का प्रदाता है । ३३। कृत्वा नवपदात्मानं मण्डलं यन्त्रसयुतम् । अस्मिन् संस्थापयेन्मन्त्री कलशान्नव शोभनान् ३४ कषायतयोसम्पूर्णान् वस्त्ररत्नादिसंयुतान् । मध्ये सम्पूजयेद्दे तृसिंह शान्तविग्रहम् । ३५ तार्क्ष्यादीन्तूजयेन्मन्त्रो पूर्वादिषु यथाक्रमम् । इति संसाधितैस्तौयैरभिषिञ्चेत्प्रियं नरम् । ३६ अभिचारग्रहोन्मादा विनश्यन्त्यरिभिः सह । अभिषिक्तस्तदा विप्रान् पूजयेद्देवता धिया ३७ यथावत्पूजयेत्पश्चाद्भक्त्या गुरुमवञ्चयत् । राजा विजयामाप्नोति युद्धेषुः विधिनाऽमुना । ३८ नौ पदों के स्वरूप वाले मण्डल की रचना करके जो मन्त्र से संयुत होवे । इसमें मन्त्रधारी पुरुष नौ परम शोभन कलशों की स्थापना करे । जो कषाय जल से परिपूर्ण और नौ रत्नादि से समन्वित होवे । मध्य में परम शान्त शरीर वाले नृसिंह देव का इस प्रकार से पूजन करना चाहिए ।३४-३५। मन्त्रधारी पूर्व आदि दिशाओं में क्रम के अनुसार तार्क्ष्य आदि का अर्चन करे । इस रीति से संसाधित जलों से प्रिय मनुष्य का अभिषिंचन करना चाहिए । ३६। अभिचार—यह— उन्माद शत्रुओं के साथ विनष्ट हो जाया करते हैं । उस समय में

चतुर्दश पटल ] [ ३२३ अभिषिक्त होकर विप्रों को देवता की बुद्धि से पूजा करनी चाहिये । ३७। इसके पीछे वंचना न करते हुए भक्ति की भावना से यथा रीति से गुरुदेव का अर्चन करे । इस विधि से राजा, युद्धों में विजय को प्राप्त किया करता है । ३८। वीजाङ्क गणपञ्चकं प्रविलिखेच्छेषस्य भोगे पुनः द्वात्रिंशत्पदसंयुते परिलिखेन्मन्त्राक्षराणि क्रमात् । पुच्छेनाम जपादिसाधितमिदं होमेन सम्पातितम् । भूतापस्मृतिदुःखरोगशमनं मन्त्रं रिपुध्वसनम् । ३६ क्षकारी वह्निमारूढो मनुस्वरसमन्वि : । बिन्दुनादलसन्नूर्द्धा बीजं नरहरेर्मतम् । ४० बीजं नमोभगवते नरसिंहाय तत्परम् । स्याज्जवालामालिने पश्चाद्दीप्तदंष्ट्रीय तत्परम् । ४१ अग्निनेत्राय सर्वादि दक्षोधनाय पदं वदेत् । सर्वभूतविनाशान्तं नकारो दीर्घवान् मेरुत् । ४२ सर्वज्वरविनाशान्ते नायाणौर्दहयुग्मकम् । पचद्वयं रक्षयुग्मं हुं फट् स्वाहा ध्रुवादिकाः । ४३ सप्तषष्ट्यक्षरैः प्रोक्तो ज्वालामाली महामुनिः । हृत्तयोदशिभिः प्रोक्तं शिरोदशभिरीरितम् । ४४ शिखैकादशभिः प्रोक्ता वर्माष्टादशभिर्मतम् । वर्णैर्द्वादशभिर्न्नैत्रमस्त्रं स्यात्करणाक्षरैः । ४५ फिर शेष के भोग में बीजों के गण पंचक को लिखे और क्रम से बत्तीस पद संयुक्त में मन्त्र के अक्षरोंको लिखना चाहिए । पुच्छ में नाम लिखे । इसको जपादि से साधित करे और होम से सम्पादित करे । यह मन्त्र भूत, अपस्मृति, दुःख, रोग का शमन करने वाला तथा शत्रुओं के ध्वंस करने वाला होता है । ३६। क्षकार वह्नि (रेफ) से संयुत होवे और मन्त्र के स्वरों से समन्वित होवे और विन्दु तथा नादसे उल्लसित मूर्द्धा वाला नृसिंह का बीज माना गया है । ४०। अब ज्वाला

३२४ ] [ श्रीशारदा तिलक नृसिंह मन्त्र को बताया जाता है-आदि में बीज फिर 'नमोभगवते'- यह पद, इसके बाद 'नरसिंहाय'-यह पद, पश्चात् 'ज्वाला मालिने'- यह पद, पीछे 'दीप्तदंष्ट्रा'-यह पद, फिर, 'अग्नि नेत्राय' यह पद, और सर्वादि में 'रक्षोघ्नाय'-यह पद बोलना चाहिए । 'सर्व भूत विनाशांत' के अन्त में दीर्घ नकार होता है। दो बार 'पच' शब्द और दो बार 'रक्ष' शब्द होता हैं, ध्रुव आदि में और 'हूँ फट् स्वाहा' यह पद होना चाहिये । यह सड़सठ अक्षरों वाला ज्वालामाली महा मन्त्र कहा गया है। इसका हृदय तेरह से बताया गया है और शिर दश से कहा है। द्वादश वर्णों से नेत्र तथा अस्त्र करणाक्षरों से कहा है । शिखा ग्यारह से और वर्म अठारह से बताया गया है ॥ ४१-४५। एवमङ्गानि विन्यस्य चिन्तयेन्मन्त्रदेवताम् ॥ ४६ उज्ज्वलप्रलयानालाभमयुग्मनेत्रमनारतम् । भासुरं शिखिनः शिखाभिरुदग्रदंष्ट्रिमुखाम्बुजम् ! रक्षासां भयदं विकीर्णजटाकलापविभीषणम् । शंशचक्रकृपाणखेटकधारिणं नृहरिं भजे ॥४७ लक्षमेकं जपेन्मन्त्रं तद्दशांशं समाहितः । कपिलाज्येन जुहुयात् समिद्धे हव्यवाहने ॥४८ प्रागुक्ते पूजयेत्पीठे देवं संप्रोक्तवर्त्मना । कुर्वीय मन्त्रराजोक्तान् प्रयोगान्मन्तुनाऽधुना ॥४६ विशेषात् क्षुद्रभूतारिनाशनोऽयं मनुः स्मृतः । पाशशक्तिर्नरहरिरंकुशो वर्म फट् मनुः ।५० षडक्षरो नरहरिः कथितः सर्वकामदः । ऋषिर्ब्रह्मा समुद्दिष्टः पंक्तिश्छन्द उदाहृतम् । देवता नरसिंहोऽस्य षड्बीजैरङ्गकल्पना ॥५१ इस रीति से अङ्गों का विन्यास करके मन्त्र के देवता का चिंतन करना चाहिए । अब ध्यान बतलाया जाता है-उज्ज्वल प्रणय की अग्नि की आभा के समान आभा वाले-निरन्तर अयुग्म नेत्र से युक्त,

चतुर्दश पटल ] [ ३२५ भासुर-शिखोंकी शिखाओंके समान उपदंष्ट्राओंसे युक्त मुख कमल वाले- राक्षसों को भय कर देने वाले-फैले हुये जटाओं के समुदाय से भीषण- शंख, चक्र, कृपाण और खेटक को धारण करने वाले भगवान् नरसिंह का भजन करता हूँ ।४६-४७। इस मन्त्र का एक लाख जप करना चाहिये । जप का दशांश कपिलाओंके घृतसे समद्धि अग्निमें परम समाहित होकर होम करे ।४८। पहिले बताये हुए पीठ पर कहे हुए मार्ग के द्वारा देवका पूजन करना चाहिये । इस मन्त्र के द्वारा मन्त्र में कहे हुए प्रयोगों को करना चाहिए ।४६। विशेष रूप से यह मन्त्र क्षुद्र, भूत-और शत्रुओं का विनाश करने वाला होता है ऐसा कहा गया है । पाश शक्ति है, नरहरि अंकुश है-और वर्म फट् होता है । यह नरहरि का मन्त्र छै अक्षरों वाला है और सब कामनाओं का प्रदाता कहा गया है । इसका ऋषि कहा गया है और पंक्ति छन्द बताया गया है । इसका देवता नरसिंह है । छै बीजों से अङ्गों को कल्पना करे ।५०-५१। कोपादालोलजिह्वं विवृतनिजमुखं सोमसूर्याग्निनेत्रं पादादनाभिरक्तप्रभमुपरि सितं भिन्नदैत्येन्द्रगात्रम् । चक्रं शंखं सपाशांकुशकुलिशगदादारुणान्युद्वहन्तम् । भीमं तीक्ष्णोग्रदंष्ट्रं मणिमयविविधाऽऽकल्पमीडे नृसिंहम् ।५२ तुलक्षं जपेदेतं घृतेन जुहुयात्ततः । तत्सहस्रं समिद्धेऽग्नौ तोषयेद्द्रविणैर्गुरुम् ।५३ अर्चा प्रागीरिते पीठेमूर्त्तिं भूलेन कल्पयेत् । अङ्गवृत्तैर्बहिष्चक्रं शंखं पाशाङ्कशौ पुनः ।५४ वज्रं कौमोदकीं खड्गखेटौ पत्रेषु पूजयेत् । इन्द्राद्यानेतदस्त्राणि पूजयेद्बाह्यतः सुधीः ।५५ अब ध्यान बताया जाता है-कोप से आलोल अर्थात् चंचल जिह्वा वाले-अपने मुख को खोले हुये-सोम, सूर्य और अग्नि के नेत्रों से युक्त करणों से नाभि पर्यन्त रक्त प्रभा संयुत ऊपर के भाग में सित-दैत्येन्द्र हिरण्यकशिपु के गात्र को विदीर्ण करने वाले-शंख, चक्र, पाश,

३२६ ] [ श्रीशारदा तिलक अंकुश, कुलिश गदा आदि दारुण आयुधों को धारण करते हुए-परम भीषण-तीक्ष्ण और उग्र दंष्ट्राओं से समन्वित, मणियों से परिपूर्ण अनेक भूषणों से भूषित भगवान् नृसिंह देव का मैं स्तवन करता हूँ ।५२। इस मन्त्र का छ लाख जप करे और उतने ही सहस्र घृत के द्वारा समिद्ध अग्नि में होम करना चाहिए । अपने गुरु को द्रव्य के दान द्वारा सन्तुष्ट करे ।५३। पहिले कथित पीठ पर पूजा करे और मूल मन्त्र से मूर्त्ति की कल्पना करनी चाहिए । अङ्ग वृत्त से बाहर चक्र-शंख-पाश- अंकुश-वज्र-कौमोदकी खड्ग-खेटक पत्रों में अर्चन करना चाहिये । उपासक को इन्द्र आदि का और इनके आयुधों की बाहर पूजा करनी चाहिये ।५४-५५। एवं कृत्वा पुरश्चयी मन्त्रेणानेन मन्त्रवित् । प्रयोगान् कल्पनिर्दिष्टान् कुर्यात् स्वस्यापरस्यवा ।५६ रक्तोत्पलस्त्रिमध्वक्तैः सहस्रं जुहुयान्नवैः । नित्यं मासाद्भवेदिष्टं वत्सराद्धनधान्यवान् ।५७ रक्तैस्त्रिमधुरोपेतैः पद्मैर्भानुसहस्रकम् । जुहुयान्महतीं लक्ष्मीमायुर्वश्यमवाप्नुयात् ।५८ लाजांस्त्रिमधुरोपेतान्प्रातः कालेषु जुह्वतः । कन्यासिद्धिर्भवेत्पश्चात्कन्यायाः सद्गरोभवेत् ।५६ दूर्वाः पयोघृताभ्यक्ता दशोत्तरशतं सुधीः । अन्वहं जुहुयात्सम्यग्दीर्घमायुरवाप्नुयात् ।६० तस्य रोगाः प्रणश्यन्ति कृत्याद्रोहादिभिः सह । सपञ्चगव्यं जुहुयादपामार्गस्य मञ्जरीः ।६१ नित्यं सहस्रमानेन सप्ताहं विजितेन्द्रियः । होमोऽयं सर्वथा भतकृत्यारोगान् प्रणाशयेत् ।६२ सतिलैराष्यपामार्गहविराज्यैर्यथाक्रमम् । द्विसहस्रं प्रजुहुयात् क्षुद्ररोगग्रहान् जयेत् ।६३

चतुर्दश पटल ] । ३२७ इस तरह से पुरश्चरण करने वाला मन्त्र का ज्ञाता इस मंत्र के द्वारा कल्प में निर्दिष्ट अपने अथवा दूसरे के प्रयोगों को करे ।५६। नवीन सहस्र उत्पलों को तीन मधुरों में अक्त करके नित्य होम करे तो एक ही मास में अभीष्ट की प्राप्ति होती है और एक वर्षमें धन धान्य- वान् हो जाया करता है ।५७। तीन मधुरों से उपेत रक्त पद्द्मों के द्व रा बारह सहस्र आहुतियां देवे तो लक्ष्मी आयु तथा वशीकरण की प्राप्ति होती है ।५८। तीन मधुरों से समुपेत लाजाओं का प्रातःकाल में हवन करने वाले पुरुष को कन्या की सिद्धि हो जाती है और कन्या को श्रेष्ठ वर की प्राप्तिहो जाया करती है ।५६। सपुरुष पय और घृतमें अव्यक्त दूर्वा का एक सौ दश वार प्रतिदिन होम करे तो भली भाँति दीर्घ आयु प्राप्त करता है ।६०। उस पुरुष के कृत्याद्रोह आदि के सहित सभी रोग नष्ट हो जाया करते हैं । अपामार्ग की मजरी से एक सप्ताह तक जिते- न्द्रिय रहकर होम करे तो यह होम सर्वदा भूत, कृत्या रोगों का विनाश कर दिया करता है ।६१-६२। क्रम के अनुसार ति-राजी-अपामार्ग- हवि-आज्य से दो सहस्र आहुतियां देवे तो क्षुद्र रोग और ग्रहों पर विजय प्राप्त कर लिया करता है ।६३। पयोक्तै रमृताखण्डैस्त्रिसहस्रं चतुर्दिनम् । अनेन विहितो हमो ग्रहज्वरविनाशनः ।६४ नृसिंहशक्तिबीजे द्वे शूले तारगते लिखेत् । तत्र ग्रहास्तं संस्थाप्य जपेन्मन्त्रं षडक्षरम् ।६५ अविश्य सद्यस्तं मुञ्चेद्ग्रहः क्रन्दन्भयाकुलः ।६६ आलिख्याग्निपुरद्वयं तदुदरे शक्तिं ससाध्यां लिखेत् । षट्कोणेषु षडक्षराण्यथमनोः किञ्जल्कसंस्थान् स्वरान् । पत्रेष्वष्टसु मन्त्रराजविहितान्वर्णान् क्रमाद्द्वादशः । काद्यर्णैः पुनरावृतं त्रितिपुरे कोणेषु चिन्तामणिम् ।६७ नारसिंहमिदद्यन्त्रं लिखितं भूर्जपत्रके । विधृतं शिरसा शीर्षरोगभूतज्वरान् हरेत् ।६८

३२८ ] [ श्रीशारदा तिलक दूध में अक्त अमृता (गिलोय) के खण्डोंके द्वारा दो सहस्र चार दिन तक होम करे उसके द्वारा किया हुआ होम यह ज्वर का विनाश करने वाला हुआ करता है ।६४। नृसिंह शक्ति के दो बीज और प्रणव गत शूलों को लिखे ! वहीं पर ग्रहोंसे आर्त्त व्यक्ति को स्थापित करके छं अक्षरों वाले मंत्र का जप करे। अविष्ट होकर तुरन्त ही भय से आकुल होकर रुदन करता हुआ यह उसको छोड़ दिया करता है ।६५। ६६। अग्नि पुर लिख कर उसके उदर में साध्य के सहित शक्ति का लेखन करे । छं कोणों में छ अक्षरों को लिखे मन्त्र के किंजल्को में स्थित स्वरों को और आठ पत्रों में मन्त्रराज में विहित वर्णोंकी क्रमसे लिखे । चारों ओर कादिवर्णों से त्रिपुर में कोणों में चिन्तमणि को पुनः आवृत्त करे ।६७। यह नरसिंह यन्त्र होता है। इसको भोज पत्र पर लिखे और इसको शिरपर बांधे तो यह दीर्घ रोग-भूत ज्वरोंका हरण किया करता है ।६८। बहुनात्र किमुक्तेन मन्त्रै तैरूदीरितैः । समोनास्ति मनुः कश्चिच्छायानुग्रहकारकः ६९ तारो भृगुर्वियद्भूयस्तदाढ्यं वह्निदीर्घयुक् । पावकः कवचान्तो मनुः सप्ताक्षरः स्मृतः ।७० अहिर्बुध्न्यो मुनिः प्रोक्तश्छन्दोऽनुष्टुबुदाहृतम् । देवता मुनिभिः प्रोक्तश्चक्ररूपीहरिः स्वयंम् ।७१ अचक्राय हृदाख्यातं विचक्राय शिरः स्मृतम् । सुचक्राय शिखा प्रोक्ता श्रीचक्राय तनुच्छदम् ।७२ सञ्चक्राय स्मृतं नेत्रं ज्वालाचक्राय तत्परम् । षडङ्गमन्त्राः प्रत्येकं द्विष्टान्ता जातिसंयुताः ।७३ ए ह्रीं चक्रेण बध्नामि नमश्चक्राय ठद्वयम् । मन्त्रेणानेन कुर्वीत दिशां प्रागादि बन्धनम् ।७४ यहाँ पर अत्यधिक कहने से क्या लाभ है। यही कहना पर्याप्त है कि इन उदीरित मन्त्रों के समान छायानुग्रह करने वाला अन्य कोई

चतुर्दश पटल ] [ ३२६ भी मन्त्र नहीं है ।६६। अब सुदर्शन मन्त्र कहा जाता है-तार-प्रणव, भृगु-सः विद्युत-घः, उससे आढ्य स', वह्नि-रेफ, दीर्घ से युक्त हो अर्थात् साः पावक रेफ, कवच हुम्, अस्त्र फट् यह मन्त्र सात अक्षरों वाला होता है ।७०। इसकाऋषि अहिर्बुध्न्य है और इसका छन्द अनुष्टुप कहा गया है । इसका देवता मुनियों के द्वारा स्वयं चक्र रूप वाले हरि बताये गयेहैं ।७१। अचक्राय-यह हृदय कहागया है और विच- क्राय इसका शिर है। सुचक्राय वह इस की शिखा कही गई है और श्री चक्राय इसका तगुच्छद होता है ।७२। सञ्चकाय-यह नेत्र है उसके आगे ज्वाला चक्राय है। प्रत्येक अङ्ग मन्त्र दो ठकार के अन्त वाले जाति संयुत है ।७ । ऐं ह्रीं चक्रेण वध्नामि नमश्चक्राय ओर दो ठकार हैं। इस मन्त्र के द्वारा पूर्व आदि दिशाओंका बन्धन करना चाहिए।७४। त्रैलोक्यान्ते रक्षयुगं हं फट् स्वाहा ध्रुवादिकः । अग्निप्राकारमन्त्रोऽयं रक्षार्थं पुनरात्मनः ।७५ प्राकारं तेन कुर्वीत मन्त्रेण मनुवित्तमः ! सियरक्ताञ्जनप्रख्यं नारं मूर्द्धनि विन्यसेत् ।७६ अन्यानग्निनिभान्वर्णांम् भ्रुवोर्मध्ये मुखे हृदि । गुह्यजानुपदद्वन्द्वसन्धिषु क्रमशो न्यसेत् ।७७ कल्पान्ताकर्कप्रकाशं त्रिभुवनमखिलं तेजसा पूरयन्त रक्ताक्षं पिङ्गकेशं रिपुकुलभयदं भीमदंष्ट्राट्टहासम् । शङ्खं चक्रं गदाब्जे पृथुतरमुशलं चापपाशाङ्कुशांस्त्वै- विभ्राणं दोर्भिराद्यं मनसि मुररिपुं भावयेच्चक्रसंज्ञम् ।७८ त्रैलोक्य-इसके अन्त में दो बार "रक्ष" यह पद होता है। आदि में प्रणव ओरफिर 'हूँ फट् स्वाहा'-यहपद है। यह अग्नि प्रकारका मंत्र है। अपनी रक्षा के लिये उससे (मन्त्र के द्वारा) मन्त्र का ज्ञाता प्राकार करे। सित-रक्त और अंजन वाले तार अर्थात् प्रणव का मूर्धा में विन्यास करना चाहिये ।७५-७६। अन्य अग्नि के तुल्य वर्णों का भ्रूओं के मध्य

३३० ] [ श्रीशारदा तिलक में-मुख-हृदय-गुह्य-दोनों चरण और सन्धियों में क्रम से विन्यास करना चाहिये ।७७। अब ध्यान का क्रम बतलाया जाता है-कल्प के अन्त में रहने वाले सूर्य के समान प्रकाश से समन्वित-तेज के द्वारा सम्पूर्ण त्रैलोक्य को पूरित करते हुए-रक्त नेत्रों से संयुत-पिङ्गल वर्ण के केशों से युक्त-शत्रुओं के समुदाय को भयदाता-भीषण दंष्ट्राओं के प्रदर्शन करके अट्‍टहास हुए-अपनी बाहुनों के द्वारा शंख-चक्र- गदा, पद्म, पृथुतर मुसल, चाप, पाश, आकुश को धारण करने वाला- आद्य, मुरके शत्रु चक्र संज्ञा वालेकी मनमें भावना करनी चाहिए ।७८। अर्कलक्षं जपेन्मन्त्रं जुहुयात्तत्सहस्रकम् । तिलैः ससर्षपैः रक्तैर्बिल्वैर्दुग्धौदनैः क्रमात् ।७६ विष्णोः सम्पूजयेत्पीठे मूर्तिं मूलेन कल्पयेत् । अङ्गानि पूर्वमभ्यर्च्य चक्राद्यस्त्राणि तद्वहिः ।८० चक्रं शंख गदां पद्म मुसलं सशरन्धनुः । पाशाङ्कुशौ दलाग्रेषु लक्ष्म्याद्याः पूजयेत्ततः ।८१ लक्ष्मीं सरस्वती पश्चाद्रतिं प्रीतिं ततः परम् । कीर्तिकान्ती तुष्टिपुष्टी सर्वा एताः स्मृता द्विधः ।८२ पीतरक्तसितश्यामा, इन्द्राद्यस्त्राणि तद्वहिः । इति सिद्धेर्मनौ प्रोक्तप्रयोगांक्तु महति ।८३ इस मन्त्रमें जितने वर्ण है उतने ही लाख इस मन्त्रका जप करे और उतने ही सहस्र सर्षप के सहित तिलों के द्वारा-पद्मों से, बिल्व से और दुग्धओदन से क्रम से होम करे ।७६। भगवान् विष्णु के पीठ पर पूजन करे तथा मूल मन्त्र के द्वारा मूर्ति की कल्पना करनी चाहिए। पूर्व में अङ्गों का अर्चन करके उनके बाहर चक्रादि अस्त्रों का यजन करे ।८०। दलों के अग्रभागों में पाश और अंकुश का पूजन करे फिर लक्ष्मी आदि का अर्चन करना चाहिये ।८१। लक्ष्मी-सरस्वती-रति-प्रीति कीर्ति कान्ति-तुष्टि-पुष्टि-ये सभी दो बार समचित करे ।८२। इसके वर्ण

चतुर्दश पटल ] [ ३३ पीत-रक्त-सित और श्याम हैं। फिर इन्द्रादि का तथा उसके बाहर उनके आयुधों का पूजन करे। रीति से अर्चन करने पर मन्त्र सिद्ध हो जाता है और सिद्ध हो जाने पर कहे हुए प्रयोगों को करने के योग्य हो जाता है ।८३। आत्मनो वा परार्थं वा दृष्टादृष्टफलप्रदान् । दूर्वाहोमो विधातव्यो दीर्घमायुरभीप्सता ।८४ श्रीकामो जुहुयात्पद्मैः फुल्लै राज्यपरिप्लुतैः । मेधाकामे । होतव्यं प्रसूनै र्ब्रह्मवृक्षजैः ।८५ दिनत्रयं यो जुहोति गुलिकाः पुरुनिर्मिताः । अष्टोत्तरसपस्रेण स जियेन्निखिलापदः ।८६ राव्येनाज्येन गोसिद्धयै जुहुयाद्दिवसत्रयम् । उदुम्बरसमिद्धोमः पुत्रदायी भवेन्नृणाम् ।८७ प्रलयाग्निसमं चक्रं यस्य मूर्द्धनि चिन्तयेत् । सप्ताहाज्ज्वरमूर्च्छार्ती मण्डलान्मृतिमेति सः ।८८ अपने लिये अथवा दूसरों के लिए इन दृष्ट तथा अदृष्ट फलके प्रदान करने वाले प्रयोगों को करना चाहिए। दीर्घ आयुकी इच्छा रखने वाले व्यक्ति को दूर्वा का होम करना चाहिए ।८४। जो श्रीकी कामना वाला हो उसे विकसित तथा आज्य में परिप्लुत पद्मों के द्वारा हवन करना चाहिए। जो मेधा की कामना रखने वाला हो उसे ब्रह्म वृक्ष के पुष्पों के द्वारा होम करना चाहिए ।८५। जो पुरुष तीन दिन तक पुरुनिर्मित गुलिकाओं का हनन किया करता है और एक सहस्र आठवार आहुतियाँ देता है वह समस्त आपदाओं पर विजय प्राप्तकर लिया करता है ।८६। गो सिद्धि के लिये गाय घृत से तीन दिन तक होम करे । गूलर की समिधाओं से किया हुआ होम मानवों कों पुत्र के प्रदान करने वाला हुआ करता है ।८७। प्रलय काल की अग्नि के समान चक्र का जिसके मस्तक में चिन्तन करे वह एक सप्ताह में ज्वर की मूर्च्छा से पीड़ित हो जाता है और मण्डल से वह मृत्यु को प्राप्त हो जाया करता है ।८८।

३३२ ] [ श्रीशारदा तिलक अकारादिस्वरावीतं याहियाहिपदावृतम् । सकारं चिन्तयेच्छत्रो मूर्द्ध्न्युच्चाटमावहेत् । ८० अनेन विधिनां शत्रु र्मण्डलामृत्युभाग्भवेत् । शरच्चन्द्रनिभं सार्णं सुधाधाराभिवर्षिणम् ।६० स्मरेन्मूर्द्धनि यस्यासौ स जीवेद्विगतमयः । आत्मानं चक्रनाभिस्थं ध्यात्वा मन्त्रममुं जपेत् ।६१ एकोऽपि रणभूमिस्थो जयत्प्रत्यर्थिनो बहून् । अपामार्गस्य समिधो जुहुयादृतत्वधि ।६२ रक्षो भूतपिशाचारिपीडा तस्त न जायते । निर्गुण्डी सर्ज्जकनकश्वेताकिंशुकसम्भवैः ।६३ समिद्धरैः कृतो होमः क्षुद्ररोगग्रहापहः । अपामार्गस्य समिधाः सर्पिर्मध्ये शृतश्चरुः ।६४ आज्यमेतानि जुहुयादष्टोत्तरशतं पृथक् । साधकाय पुनर्दद्याच्चरुं सम्पातसाधितम् ।६५ अभिचारकृता द्रोहास्तस्य नश्यन्ति सर्वथा । अपामार्गस्य समिधः पञ्चगव्यपरिप्लुताः ।६६ जुहुयादयुतं मंत्री दिशासु बलिमाहरेत् । दध्योदनेन मनुना क्षुद्ररोगदिशान्तये ।६७ अकार आदि स्वरों से आवीत और 'याहि-याहि'-इस पद से आवृत्त सकार को शत्रु के मूर्धा में चिन्तन करे तो वह उच्चाटन का आवाहन किया करता है ।८६। इसी विधि से करने पर शत्रु मण्डल में मृत्यु भजने वाला हो जाता है । शरत् काल के स्वच्छ चन्द्र के सदृश सकार वर्ण को जो सुधा धारा का अभिवर्णन करने वाला है, ऐसे का जिस पुरुष के मस्तक में स्मरण करे वह पुरुष विगत रोग वाला होकर जीवित रहा करता है । अपने आपको चक्र की नाभि में स्थित हुआ ध्यान करके इस मन्त्र का जप करे तो अकेला ही रण भूमि में स्थित होकर बहुत से शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर लेता है । अपमार्ग की

चतुर्दश पटल ] [ ३३३ समिधाओं से दश सहस्र की अवधि पर्यन्त आहुतियां देवे ।६०-६२। तो इसका यहप्रभाव होता है कि उस पुरुषको राक्षस-भूत-पिशाच और शत्रु की पीड़ा कभी नहींहुआ करती है। निर्गुण्डी-सर्ज्‍जकनक (धतूरा) श्वेत पलाश की श्रेष्ठ समिधाओं के द्वारा किया हुआ होम क्षुद्र रोग-ग्रहों की आपदाओं का अपहरण करने वाला होता है। अपमार्ग की समिधा और घृत में श्रुत चरु तथा आज्य इनकी पृथक् एक सौ आठ बार आहुतियां देवे । फिर साधक के लिये सम्पात से साधित चरु को देवे ।६३-६५। इसका यह प्रभाव है कि उसके अभिचार कृत द्रोह सर्वथा नष्ट हो जाया करते हैं । अपमार्ग की समिधाओं को पञ्च गव्य में परिप्लुत करके मन्त्रधारी दश हजार आहुतियां देवे और दिशाओं से बलि का समाहरण करे । दध्योदन मन्त्र से करे तो क्षुद्र रोग आदिकी शान्ति होती है ।६६। ।६७। क्षीरवृक्षसमित्क्षीरहविराज्यैः पृथक् पृथक् । चतुःसहस्रं होतव्यं शान्तिः स्यात्सर्वतोमुखी ।६८ दक्षिणोत्तरङ्गं मंत्री चक्रयुग्मं समालिखेत् । वेदादि विलिखेन्मध्ये मंत्रवर्णानृषडस्रिषु ।६६ मध्ये पीतं कोणषट्कं रक्तं श्यामलमांतरम् । नेमिं श्वेतां लसद्वह्निशिखाभिरुपशोभितम् ।१०० पार्थिव मण्डल बाह्ये कुर्यादेवं यथाविधि । रक्ततोयेन सम्पूर्ण कुम्भं सौम्ये प्रविन्‍यसेत् ।१०१ आवाह्य पूजयेत्तस्मिंश्चक्रात्मान जनार्दनम् । दक्षिणे मण्डले कुर्याद्धोमकर्म विधानवित् ।१०२ दूध वाले वृक्षों की समिधा-क्षीर-हवि-और आज्य से पृथक्- पृथक चार सहस्र बार होम कर तो उस हवन करने वाले पुरुष को सर्वतोमुखी शान्ति हो जाती है ।६८। मन्त्र को धारण करने वाला दक्षिण और उत्तर में गत चक्र के युग्म को लिखे । मध्य में वेदादि का लेखन करे और षड्स्रियों में मन्त्र के वर्णों को लिखे । मध्य में

३३४ ] [ श्रीशारदा तिलक पीत छै कोणोंमें रक्त-आन्तर श्यामला-श्वेतनेमि कान्ति युक्त वह्नि शिखाओं से उप शोभित बाहर में पार्थिव मण्डल को विधि के अनुसार बनावे। सौम्य दिशा में रक्त जल से परिपूर्ण कुम्भ का निन्यास करे। ।६६-१०१। वहाँ पर उसे आवाहन करके चक्र के स्वरूप वाले जनार्दन प्रभु का यजन करे। दक्षिण मण्डल में विधान का ज्ञाता होम कर्म करे।१०२। क्रमात् सर्पिरपामार्गैस्तण्डुलैः सर्षपैस्तिलैः । पायसैर्गव्यसर्पिभ्यां षड्ििवशत्यधिकं शतम् ।१०३ जुहुयादेधिते वह्नौ प्रतिद्रव्य विधानवित् । सम्पातयेत्कुम्भतोये पूजिते सौम्यमण्डले ।१०४ प्रस्थार्द्धं चरुणा पिण्डकृत्वा तस्मिन्विनिःक्षिपेत् । बाह्ये बलिप्रदानार्थ तदर्द्धमवशेषयेत् ।१०५ स्नातं विशुद्धवस्त्राद्यैः साध्यमानीय तं पुनः । दक्षिणे स्थापयेन्मन्त्री कुम्भाग्निभ्यामनन्तरम् ।१०६ नीराज्य तौ नयेद्बाह्यं ग्रातादष्टमराशिके । नीराज्य तौ नयेद्बाह्यं ग्रामादष्टमराशिके । स्थापयेत्तौ यथापूर्वं सपस्तरणौ क्रमात् ।१०७ फिर क्रम से घृत-अपामार्ग-तण्डूल-सर्षपतिल-पायस-गौ का घृतसे एकसौ छब्बीस आहुतियां देने और एधित वह्नि में होम करे विधान का ज्ञाता पुरुष प्रति द्रव्य को पूजित कुम्भ के जल में सौम्य मण्डलमें सम्पातन करे।१०३-१०४। आधेप्रस्थ आधे प्रस्थ चरुसे पिण्डका निर्माण करके उसमें विनिःक्षिप्त कर देवे। बाहर में बलि के प्रदान करनेके लिए उसके आधे भागको अवशिष्ट रखे ।१०५। स्नान कियेहुए विशुद्ध वस्त्रादिके द्वारा समन्वित उस साध्यको वहाँलावे और मंत्रधारी दक्षिण में कुम्भ और अग्नि के अनन्तर स्थापित करे । उन दोनों का नीराजन करके बाहिर लावे और ग्राम से अष्टम राशि में स्थापित करे। उन दोनों को परिस्तरण के सहित क्रम के रखना चाहिये ।१०६-१०७।