शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 329, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्दश पटल ] [ ३२६ भी मन्त्र नहीं है ।६६। अब सुदर्शन मन्त्र कहा जाता है-तार-प्रणव, भृगु-सः विद्युत-घः, उससे आढ्य स', वह्नि-रेफ, दीर्घ से युक्त हो अर्थात् साः पावक रेफ, कवच हुम्, अस्त्र फट् यह मन्त्र सात अक्षरों वाला होता है ।७०। इसकाऋषि अहिर्बुध्न्य है और इसका छन्द अनुष्टुप कहा गया है । इसका देवता मुनियों के द्वारा स्वयं चक्र रूप वाले हरि बताये गयेहैं ।७१। अचक्राय-यह हृदय कहागया है और विच- क्राय इसका शिर है। सुचक्राय वह इस की शिखा कही गई है और श्री चक्राय इसका तगुच्छद होता है ।७२। सञ्चकाय-यह नेत्र है उसके आगे ज्वाला चक्राय है। प्रत्येक अङ्ग मन्त्र दो ठकार के अन्त वाले जाति संयुत है ।७ । ऐं ह्रीं चक्रेण वध्नामि नमश्चक्राय ओर दो ठकार हैं। इस मन्त्र के द्वारा पूर्व आदि दिशाओंका बन्धन करना चाहिए।७४। त्रैलोक्यान्ते रक्षयुगं हं फट् स्वाहा ध्रुवादिकः । अग्निप्राकारमन्त्रोऽयं रक्षार्थं पुनरात्मनः ।७५ प्राकारं तेन कुर्वीत मन्त्रेण मनुवित्तमः ! सियरक्ताञ्जनप्रख्यं नारं मूर्द्धनि विन्यसेत् ।७६ अन्यानग्निनिभान्वर्णांम् भ्रुवोर्मध्ये मुखे हृदि । गुह्यजानुपदद्वन्द्वसन्धिषु क्रमशो न्यसेत् ।७७ कल्पान्ताकर्कप्रकाशं त्रिभुवनमखिलं तेजसा पूरयन्त रक्ताक्षं पिङ्गकेशं रिपुकुलभयदं भीमदंष्ट्राट्टहासम् । शङ्खं चक्रं गदाब्जे पृथुतरमुशलं चापपाशाङ्कुशांस्त्वै- विभ्राणं दोर्भिराद्यं मनसि मुररिपुं भावयेच्चक्रसंज्ञम् ।७८ त्रैलोक्य-इसके अन्त में दो बार "रक्ष" यह पद होता है। आदि में प्रणव ओरफिर 'हूँ फट् स्वाहा'-यहपद है। यह अग्नि प्रकारका मंत्र है। अपनी रक्षा के लिये उससे (मन्त्र के द्वारा) मन्त्र का ज्ञाता प्राकार करे। सित-रक्त और अंजन वाले तार अर्थात् प्रणव का मूर्धा में विन्यास करना चाहिये ।७५-७६। अन्य अग्नि के तुल्य वर्णों का भ्रूओं के मध्य