भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 328, कुल 511 में से

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पृष्ठ 328

३२८ ] [ श्रीशारदा तिलक दूध में अक्त अमृता (गिलोय) के खण्डोंके द्वारा दो सहस्र चार दिन तक होम करे उसके द्वारा किया हुआ होम यह ज्वर का विनाश करने वाला हुआ करता है ।६४। नृसिंह शक्ति के दो बीज और प्रणव गत शूलों को लिखे ! वहीं पर ग्रहोंसे आर्त्त व्यक्ति को स्थापित करके छं अक्षरों वाले मंत्र का जप करे। अविष्ट होकर तुरन्त ही भय से आकुल होकर रुदन करता हुआ यह उसको छोड़ दिया करता है ।६५। ६६। अग्नि पुर लिख कर उसके उदर में साध्य के सहित शक्ति का लेखन करे । छं कोणों में छ अक्षरों को लिखे मन्त्र के किंजल्को में स्थित स्वरों को और आठ पत्रों में मन्त्रराज में विहित वर्णोंकी क्रमसे लिखे । चारों ओर कादिवर्णों से त्रिपुर में कोणों में चिन्तमणि को पुनः आवृत्त करे ।६७। यह नरसिंह यन्त्र होता है। इसको भोज पत्र पर लिखे और इसको शिरपर बांधे तो यह दीर्घ रोग-भूत ज्वरोंका हरण किया करता है ।६८। बहुनात्र किमुक्तेन मन्त्रै तैरूदीरितैः । समोनास्ति मनुः कश्चिच्छायानुग्रहकारकः ६९ तारो भृगुर्वियद्भूयस्तदाढ्यं वह्निदीर्घयुक् । पावकः कवचान्तो मनुः सप्ताक्षरः स्मृतः ।७० अहिर्बुध्न्यो मुनिः प्रोक्तश्छन्दोऽनुष्टुबुदाहृतम् । देवता मुनिभिः प्रोक्तश्चक्ररूपीहरिः स्वयंम् ।७१ अचक्राय हृदाख्यातं विचक्राय शिरः स्मृतम् । सुचक्राय शिखा प्रोक्ता श्रीचक्राय तनुच्छदम् ।७२ सञ्चक्राय स्मृतं नेत्रं ज्वालाचक्राय तत्परम् । षडङ्गमन्त्राः प्रत्येकं द्विष्टान्ता जातिसंयुताः ।७३ ए ह्रीं चक्रेण बध्नामि नमश्चक्राय ठद्वयम् । मन्त्रेणानेन कुर्वीत दिशां प्रागादि बन्धनम् ।७४ यहाँ पर अत्यधिक कहने से क्या लाभ है। यही कहना पर्याप्त है कि इन उदीरित मन्त्रों के समान छायानुग्रह करने वाला अन्य कोई

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