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शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

३२८ ] [ श्रीशारदा तिलक दूध में अक्त अमृता (गिलोय) के खण्डोंके द्वारा दो सहस्र चार दिन तक होम करे उसके द्वारा किया हुआ होम यह ज्वर का विनाश करने वाला हुआ करता है ।६४। नृसिंह शक्ति के दो बीज और प्रणव गत शूलों को लिखे ! वहीं पर ग्रहोंसे आर्त्त व्यक्ति को स्थापित करके छं अक्षरों वाले मंत्र का जप करे। अविष्ट होकर तुरन्त ही भय से आकुल होकर रुदन करता हुआ यह उसको छोड़ दिया करता है ।६५। ६६। अग्नि पुर लिख कर उसके उदर में साध्य के सहित शक्ति का लेखन करे । छं कोणों में छ अक्षरों को लिखे मन्त्र के किंजल्को में स्थित स्वरों को और आठ पत्रों में मन्त्रराज में विहित वर्णोंकी क्रमसे लिखे । चारों ओर कादिवर्णों से त्रिपुर में कोणों में चिन्तमणि को पुनः आवृत्त करे ।६७। यह नरसिंह यन्त्र होता है। इसको भोज पत्र पर लिखे और इसको शिरपर बांधे तो यह दीर्घ रोग-भूत ज्वरोंका हरण किया करता है ।६८। बहुनात्र किमुक्तेन मन्त्रै तैरूदीरितैः । समोनास्ति मनुः कश्चिच्छायानुग्रहकारकः ६९ तारो भृगुर्वियद्भूयस्तदाढ्यं वह्निदीर्घयुक् । पावकः कवचान्तो मनुः सप्ताक्षरः स्मृतः ।७० अहिर्बुध्न्यो मुनिः प्रोक्तश्छन्दोऽनुष्टुबुदाहृतम् । देवता मुनिभिः प्रोक्तश्चक्ररूपीहरिः स्वयंम् ।७१ अचक्राय हृदाख्यातं विचक्राय शिरः स्मृतम् । सुचक्राय शिखा प्रोक्ता श्रीचक्राय तनुच्छदम् ।७२ सञ्चक्राय स्मृतं नेत्रं ज्वालाचक्राय तत्परम् । षडङ्गमन्त्राः प्रत्येकं द्विष्टान्ता जातिसंयुताः ।७३ ए ह्रीं चक्रेण बध्नामि नमश्चक्राय ठद्वयम् । मन्त्रेणानेन कुर्वीत दिशां प्रागादि बन्धनम् ।७४ यहाँ पर अत्यधिक कहने से क्या लाभ है। यही कहना पर्याप्त है कि इन उदीरित मन्त्रों के समान छायानुग्रह करने वाला अन्य कोई

चतुर्दश पटल ] [ ३२६ भी मन्त्र नहीं है ।६६। अब सुदर्शन मन्त्र कहा जाता है-तार-प्रणव, भृगु-सः विद्युत-घः, उससे आढ्य स', वह्नि-रेफ, दीर्घ से युक्त हो अर्थात् साः पावक रेफ, कवच हुम्, अस्त्र फट् यह मन्त्र सात अक्षरों वाला होता है ।७०। इसकाऋषि अहिर्बुध्न्य है और इसका छन्द अनुष्टुप कहा गया है । इसका देवता मुनियों के द्वारा स्वयं चक्र रूप वाले हरि बताये गयेहैं ।७१। अचक्राय-यह हृदय कहागया है और विच- क्राय इसका शिर है। सुचक्राय वह इस की शिखा कही गई है और श्री चक्राय इसका तगुच्छद होता है ।७२। सञ्चकाय-यह नेत्र है उसके आगे ज्वाला चक्राय है। प्रत्येक अङ्ग मन्त्र दो ठकार के अन्त वाले जाति संयुत है ।७ । ऐं ह्रीं चक्रेण वध्नामि नमश्चक्राय ओर दो ठकार हैं। इस मन्त्र के द्वारा पूर्व आदि दिशाओंका बन्धन करना चाहिए।७४। त्रैलोक्यान्ते रक्षयुगं हं फट् स्वाहा ध्रुवादिकः । अग्निप्राकारमन्त्रोऽयं रक्षार्थं पुनरात्मनः ।७५ प्राकारं तेन कुर्वीत मन्त्रेण मनुवित्तमः ! सियरक्ताञ्जनप्रख्यं नारं मूर्द्धनि विन्यसेत् ।७६ अन्यानग्निनिभान्वर्णांम् भ्रुवोर्मध्ये मुखे हृदि । गुह्यजानुपदद्वन्द्वसन्धिषु क्रमशो न्यसेत् ।७७ कल्पान्ताकर्कप्रकाशं त्रिभुवनमखिलं तेजसा पूरयन्त रक्ताक्षं पिङ्गकेशं रिपुकुलभयदं भीमदंष्ट्राट्टहासम् । शङ्खं चक्रं गदाब्जे पृथुतरमुशलं चापपाशाङ्कुशांस्त्वै- विभ्राणं दोर्भिराद्यं मनसि मुररिपुं भावयेच्चक्रसंज्ञम् ।७८ त्रैलोक्य-इसके अन्त में दो बार "रक्ष" यह पद होता है। आदि में प्रणव ओरफिर 'हूँ फट् स्वाहा'-यहपद है। यह अग्नि प्रकारका मंत्र है। अपनी रक्षा के लिये उससे (मन्त्र के द्वारा) मन्त्र का ज्ञाता प्राकार करे। सित-रक्त और अंजन वाले तार अर्थात् प्रणव का मूर्धा में विन्यास करना चाहिये ।७५-७६। अन्य अग्नि के तुल्य वर्णों का भ्रूओं के मध्य

३३० ] [ श्रीशारदा तिलक में-मुख-हृदय-गुह्य-दोनों चरण और सन्धियों में क्रम से विन्यास करना चाहिये ।७७। अब ध्यान का क्रम बतलाया जाता है-कल्प के अन्त में रहने वाले सूर्य के समान प्रकाश से समन्वित-तेज के द्वारा सम्पूर्ण त्रैलोक्य को पूरित करते हुए-रक्त नेत्रों से संयुत-पिङ्गल वर्ण के केशों से युक्त-शत्रुओं के समुदाय को भयदाता-भीषण दंष्ट्राओं के प्रदर्शन करके अट्‍टहास हुए-अपनी बाहुनों के द्वारा शंख-चक्र- गदा, पद्म, पृथुतर मुसल, चाप, पाश, आकुश को धारण करने वाला- आद्य, मुरके शत्रु चक्र संज्ञा वालेकी मनमें भावना करनी चाहिए ।७८। अर्कलक्षं जपेन्मन्त्रं जुहुयात्तत्सहस्रकम् । तिलैः ससर्षपैः रक्तैर्बिल्वैर्दुग्धौदनैः क्रमात् ।७६ विष्णोः सम्पूजयेत्पीठे मूर्तिं मूलेन कल्पयेत् । अङ्गानि पूर्वमभ्यर्च्य चक्राद्यस्त्राणि तद्वहिः ।८० चक्रं शंख गदां पद्म मुसलं सशरन्धनुः । पाशाङ्कुशौ दलाग्रेषु लक्ष्म्याद्याः पूजयेत्ततः ।८१ लक्ष्मीं सरस्वती पश्चाद्रतिं प्रीतिं ततः परम् । कीर्तिकान्ती तुष्टिपुष्टी सर्वा एताः स्मृता द्विधः ।८२ पीतरक्तसितश्यामा, इन्द्राद्यस्त्राणि तद्वहिः । इति सिद्धेर्मनौ प्रोक्तप्रयोगांक्तु महति ।८३ इस मन्त्रमें जितने वर्ण है उतने ही लाख इस मन्त्रका जप करे और उतने ही सहस्र सर्षप के सहित तिलों के द्वारा-पद्मों से, बिल्व से और दुग्धओदन से क्रम से होम करे ।७६। भगवान् विष्णु के पीठ पर पूजन करे तथा मूल मन्त्र के द्वारा मूर्ति की कल्पना करनी चाहिए। पूर्व में अङ्गों का अर्चन करके उनके बाहर चक्रादि अस्त्रों का यजन करे ।८०। दलों के अग्रभागों में पाश और अंकुश का पूजन करे फिर लक्ष्मी आदि का अर्चन करना चाहिये ।८१। लक्ष्मी-सरस्वती-रति-प्रीति कीर्ति कान्ति-तुष्टि-पुष्टि-ये सभी दो बार समचित करे ।८२। इसके वर्ण

चतुर्दश पटल ] [ ३३ पीत-रक्त-सित और श्याम हैं। फिर इन्द्रादि का तथा उसके बाहर उनके आयुधों का पूजन करे। रीति से अर्चन करने पर मन्त्र सिद्ध हो जाता है और सिद्ध हो जाने पर कहे हुए प्रयोगों को करने के योग्य हो जाता है ।८३। आत्मनो वा परार्थं वा दृष्टादृष्टफलप्रदान् । दूर्वाहोमो विधातव्यो दीर्घमायुरभीप्सता ।८४ श्रीकामो जुहुयात्पद्मैः फुल्लै राज्यपरिप्लुतैः । मेधाकामे । होतव्यं प्रसूनै र्ब्रह्मवृक्षजैः ।८५ दिनत्रयं यो जुहोति गुलिकाः पुरुनिर्मिताः । अष्टोत्तरसपस्रेण स जियेन्निखिलापदः ।८६ राव्येनाज्येन गोसिद्धयै जुहुयाद्दिवसत्रयम् । उदुम्बरसमिद्धोमः पुत्रदायी भवेन्नृणाम् ।८७ प्रलयाग्निसमं चक्रं यस्य मूर्द्धनि चिन्तयेत् । सप्ताहाज्ज्वरमूर्च्छार्ती मण्डलान्मृतिमेति सः ।८८ अपने लिये अथवा दूसरों के लिए इन दृष्ट तथा अदृष्ट फलके प्रदान करने वाले प्रयोगों को करना चाहिए। दीर्घ आयुकी इच्छा रखने वाले व्यक्ति को दूर्वा का होम करना चाहिए ।८४। जो श्रीकी कामना वाला हो उसे विकसित तथा आज्य में परिप्लुत पद्मों के द्वारा हवन करना चाहिए। जो मेधा की कामना रखने वाला हो उसे ब्रह्म वृक्ष के पुष्पों के द्वारा होम करना चाहिए ।८५। जो पुरुष तीन दिन तक पुरुनिर्मित गुलिकाओं का हनन किया करता है और एक सहस्र आठवार आहुतियाँ देता है वह समस्त आपदाओं पर विजय प्राप्तकर लिया करता है ।८६। गो सिद्धि के लिये गाय घृत से तीन दिन तक होम करे । गूलर की समिधाओं से किया हुआ होम मानवों कों पुत्र के प्रदान करने वाला हुआ करता है ।८७। प्रलय काल की अग्नि के समान चक्र का जिसके मस्तक में चिन्तन करे वह एक सप्ताह में ज्वर की मूर्च्छा से पीड़ित हो जाता है और मण्डल से वह मृत्यु को प्राप्त हो जाया करता है ।८८।

३३२ ] [ श्रीशारदा तिलक अकारादिस्वरावीतं याहियाहिपदावृतम् । सकारं चिन्तयेच्छत्रो मूर्द्ध्न्युच्चाटमावहेत् । ८० अनेन विधिनां शत्रु र्मण्डलामृत्युभाग्भवेत् । शरच्चन्द्रनिभं सार्णं सुधाधाराभिवर्षिणम् ।६० स्मरेन्मूर्द्धनि यस्यासौ स जीवेद्विगतमयः । आत्मानं चक्रनाभिस्थं ध्यात्वा मन्त्रममुं जपेत् ।६१ एकोऽपि रणभूमिस्थो जयत्प्रत्यर्थिनो बहून् । अपामार्गस्य समिधो जुहुयादृतत्वधि ।६२ रक्षो भूतपिशाचारिपीडा तस्त न जायते । निर्गुण्डी सर्ज्जकनकश्वेताकिंशुकसम्भवैः ।६३ समिद्धरैः कृतो होमः क्षुद्ररोगग्रहापहः । अपामार्गस्य समिधाः सर्पिर्मध्ये शृतश्चरुः ।६४ आज्यमेतानि जुहुयादष्टोत्तरशतं पृथक् । साधकाय पुनर्दद्याच्चरुं सम्पातसाधितम् ।६५ अभिचारकृता द्रोहास्तस्य नश्यन्ति सर्वथा । अपामार्गस्य समिधः पञ्चगव्यपरिप्लुताः ।६६ जुहुयादयुतं मंत्री दिशासु बलिमाहरेत् । दध्योदनेन मनुना क्षुद्ररोगदिशान्तये ।६७ अकार आदि स्वरों से आवीत और 'याहि-याहि'-इस पद से आवृत्त सकार को शत्रु के मूर्धा में चिन्तन करे तो वह उच्चाटन का आवाहन किया करता है ।८६। इसी विधि से करने पर शत्रु मण्डल में मृत्यु भजने वाला हो जाता है । शरत् काल के स्वच्छ चन्द्र के सदृश सकार वर्ण को जो सुधा धारा का अभिवर्णन करने वाला है, ऐसे का जिस पुरुष के मस्तक में स्मरण करे वह पुरुष विगत रोग वाला होकर जीवित रहा करता है । अपने आपको चक्र की नाभि में स्थित हुआ ध्यान करके इस मन्त्र का जप करे तो अकेला ही रण भूमि में स्थित होकर बहुत से शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर लेता है । अपमार्ग की

चतुर्दश पटल ] [ ३३३ समिधाओं से दश सहस्र की अवधि पर्यन्त आहुतियां देवे ।६०-६२। तो इसका यहप्रभाव होता है कि उस पुरुषको राक्षस-भूत-पिशाच और शत्रु की पीड़ा कभी नहींहुआ करती है। निर्गुण्डी-सर्ज्‍जकनक (धतूरा) श्वेत पलाश की श्रेष्ठ समिधाओं के द्वारा किया हुआ होम क्षुद्र रोग-ग्रहों की आपदाओं का अपहरण करने वाला होता है। अपमार्ग की समिधा और घृत में श्रुत चरु तथा आज्य इनकी पृथक् एक सौ आठ बार आहुतियां देवे । फिर साधक के लिये सम्पात से साधित चरु को देवे ।६३-६५। इसका यह प्रभाव है कि उसके अभिचार कृत द्रोह सर्वथा नष्ट हो जाया करते हैं । अपमार्ग की समिधाओं को पञ्च गव्य में परिप्लुत करके मन्त्रधारी दश हजार आहुतियां देवे और दिशाओं से बलि का समाहरण करे । दध्योदन मन्त्र से करे तो क्षुद्र रोग आदिकी शान्ति होती है ।६६। ।६७। क्षीरवृक्षसमित्क्षीरहविराज्यैः पृथक् पृथक् । चतुःसहस्रं होतव्यं शान्तिः स्यात्सर्वतोमुखी ।६८ दक्षिणोत्तरङ्गं मंत्री चक्रयुग्मं समालिखेत् । वेदादि विलिखेन्मध्ये मंत्रवर्णानृषडस्रिषु ।६६ मध्ये पीतं कोणषट्कं रक्तं श्यामलमांतरम् । नेमिं श्वेतां लसद्वह्निशिखाभिरुपशोभितम् ।१०० पार्थिव मण्डल बाह्ये कुर्यादेवं यथाविधि । रक्ततोयेन सम्पूर्ण कुम्भं सौम्ये प्रविन्‍यसेत् ।१०१ आवाह्य पूजयेत्तस्मिंश्चक्रात्मान जनार्दनम् । दक्षिणे मण्डले कुर्याद्धोमकर्म विधानवित् ।१०२ दूध वाले वृक्षों की समिधा-क्षीर-हवि-और आज्य से पृथक्- पृथक चार सहस्र बार होम कर तो उस हवन करने वाले पुरुष को सर्वतोमुखी शान्ति हो जाती है ।६८। मन्त्र को धारण करने वाला दक्षिण और उत्तर में गत चक्र के युग्म को लिखे । मध्य में वेदादि का लेखन करे और षड्स्रियों में मन्त्र के वर्णों को लिखे । मध्य में

३३४ ] [ श्रीशारदा तिलक पीत छै कोणोंमें रक्त-आन्तर श्यामला-श्वेतनेमि कान्ति युक्त वह्नि शिखाओं से उप शोभित बाहर में पार्थिव मण्डल को विधि के अनुसार बनावे। सौम्य दिशा में रक्त जल से परिपूर्ण कुम्भ का निन्यास करे। ।६६-१०१। वहाँ पर उसे आवाहन करके चक्र के स्वरूप वाले जनार्दन प्रभु का यजन करे। दक्षिण मण्डल में विधान का ज्ञाता होम कर्म करे।१०२। क्रमात् सर्पिरपामार्गैस्तण्डुलैः सर्षपैस्तिलैः । पायसैर्गव्यसर्पिभ्यां षड्ििवशत्यधिकं शतम् ।१०३ जुहुयादेधिते वह्नौ प्रतिद्रव्य विधानवित् । सम्पातयेत्कुम्भतोये पूजिते सौम्यमण्डले ।१०४ प्रस्थार्द्धं चरुणा पिण्डकृत्वा तस्मिन्विनिःक्षिपेत् । बाह्ये बलिप्रदानार्थ तदर्द्धमवशेषयेत् ।१०५ स्नातं विशुद्धवस्त्राद्यैः साध्यमानीय तं पुनः । दक्षिणे स्थापयेन्मन्त्री कुम्भाग्निभ्यामनन्तरम् ।१०६ नीराज्य तौ नयेद्बाह्यं ग्रातादष्टमराशिके । नीराज्य तौ नयेद्बाह्यं ग्रामादष्टमराशिके । स्थापयेत्तौ यथापूर्वं सपस्तरणौ क्रमात् ।१०७ फिर क्रम से घृत-अपामार्ग-तण्डूल-सर्षपतिल-पायस-गौ का घृतसे एकसौ छब्बीस आहुतियां देने और एधित वह्नि में होम करे विधान का ज्ञाता पुरुष प्रति द्रव्य को पूजित कुम्भ के जल में सौम्य मण्डलमें सम्पातन करे।१०३-१०४। आधेप्रस्थ आधे प्रस्थ चरुसे पिण्डका निर्माण करके उसमें विनिःक्षिप्त कर देवे। बाहर में बलि के प्रदान करनेके लिए उसके आधे भागको अवशिष्ट रखे ।१०५। स्नान कियेहुए विशुद्ध वस्त्रादिके द्वारा समन्वित उस साध्यको वहाँलावे और मंत्रधारी दक्षिण में कुम्भ और अग्नि के अनन्तर स्थापित करे । उन दोनों का नीराजन करके बाहिर लावे और ग्राम से अष्टम राशि में स्थापित करे। उन दोनों को परिस्तरण के सहित क्रम के रखना चाहिये ।१०६-१०७।

चतुर्दश पटल ] [ ३३५ हुत्वा वह्नौ यथापूर्वं शिष्टान्नेन बलिं हरेत् । मनुना वक्ष्यमाणेन दशदिक्षु यथाविधि ॥१०८ सहद्विष्णुगणेष्योऽन्ते सर्वशान्ति पुनः । तेभ्यो बलि प्रगृह्णन्तु शान्तये हृदय ततः ॥१०६ ब्राह्मणान् भोजयेत् सभ्यंमधूरोत्तरमादरात् ! गुरवे दक्षिणां दद्याद्वस्त्रं भूषणसंयुतम् ॥ ११० हन्यादयं विधिः पुंसां कृत्यारोगग्रहज्वरान् । रक्षःपिशाच नर्यादि क्लेशान् शीघ्रं न संशयः ॥१११ विधाय पञ्जरं मन्त्री फलकैः क्षीरशाखिनाम् । पञ्चगव्येन सम्पूर्य तस्मिन् साध्यं निवेशयेत् ॥११२ पूर्व की ही भाँति अग्नि में हवन करके शिष्ट अर्थात् बचे हुए अन्न के द्वारा बलि का अपहरण करना चाहिये । आगे बताये जाने वाले मंत्र द्वारा विधि के सहित दश दिशाओं में 'नमः पट् ट के साथ विष्णु और गणेश के लिए तथा अन्त में सर्वशान्ति वह कर उनके लिये 'शान्ति के लिये बलिको ग्रहण करों उनको बलि देवे और अन्त में नमः' कहे ।१०८-१०६। फिर बड़े आदर भाव से ब्राह्मणों के लिए मधुर पदार्थोंका भोजन करावे । अपने गुरुदेव को वस्त्र और भूषण से युत दक्षिणा देनी चाहिए ।११०। यह विधान पुरुषों के कृत्या रोग-ग्रह और ज्वर हनन किया करता है । राक्षस-पिशाच और आर्वादि के क्लेशों का विनाश करता है-इसमें कुछ भी संशय नहीं है ।१११। मन्त्र धारण करने वाला पुरुष दूध वाले वृक्षों के तख्तों के द्वारा एक पंजरका निर्माण करे । उस पंजर को पंच गव्य से सम्पूरित करके उसमें साध्य का निवेश कर देवे ।११२। धौतवस्त्रं विशुद्धाङ्ग स्पृष्ट्वा सम्यग्जपेन्मनुम् पूर्वादिदिक्षु संस्थाप्य वर्त्ति ब्राह्मणसत्तमैः १३ कारयेत्पूर्व्वसन्द्रिष्टैर्द्रव्यौर्होमं विधानविद् । तोषयेद्दक्षिणाभिस्तान् यजमानः स्वशक्तितः ॥११४

३३६ ] [ श्रीशारदा तिलक गुरुं च धनधान्याद्यैर्नत्वा सम्प्रीणयेत्तदा । सर्वरोगहरः प्रोक्तः कृत्याद्रोहादिनाशनः ।११५ अपमृत्युहरः पुंसां विधिरेष प्रकीर्तितः । पञ्चगव्यैः कषायैर्वा क्षीरभूरुहसम्भवैः ।११६ पूरितैः कलशैर्जप्तैः कृतसम्पातसंयुतैः । अभिषिञ्चेदग्रहाविष्टमभिचारातुरन्ततः ।११७ स्वस्थो भवति शीघ्रेण विधानेनामुना नरः । भानुवारेऽभिषेकस्य विधानेन सुसाधितैः ।११८ सलिलैःस्नापयेन्नारीं सुखप्रसवकाङ्क्षिणीम् । सप्तवाराभिषेकेण सर्वे नश्यन्त्युपद्रवाः ।११९ धुले हुये वस्त्रों से संयुत तथा विशुद्ध अङ्गों वाले का स्पर्श करके भली रीति से मन्त्रका जप करे । पूर्व आदि दिशाओंमें अग्नि को संस्था- पना करके विधान के ज्ञाता को चाहिये कि वह परम श्रेष्ठ ब्राह्मणों से सन्दिष्ट द्रव्यों के द्वारा होम करावे । यजमान अपनी शक्ति से दक्षिणाके द्वारा उन ब्राह्मणों को सन्तुष्ट करे।११४। उस अवसर पर गुरुदेव को प्रणाम करके धन धान्यादि से प्रसन्न करे । यह विधान समस्त रोगों के हरण करने वाला तथा कृत्यादि के देह का विनाश करने वाला है ।११५। यह विधि पुरुषों का अपमृत्यु के हवन करने वाली कीर्तित की गयी है । पञ्चगव्य से अथवा कषायों से जो क्षीर वाले वृक्षों से किये गये हों इन कलशों को पूरित जप के साथ करे और सम्पात से सम- न्वित करे । फिर इनके द्वारा जो ग्रहों से आविष्ट हो तथा अभिचार से आतुर हो उसका अभिषिंचन करना चाहिये ।११६-११७। मनुष्य इस विधान के करने पर शीघ्र ही स्वस्थ हो जाया करता है । रविवार में अभिषेक के विधान के द्वारा सुसाधित जल से नारी का स्मरण करावे इससे सुख पूर्वक प्रसव सम्पन्न हो जाता है। सातवारों में यह अभिषेक करने से सभी उपद्रव नष्ट हो जाया करते हैं ।११८-११९।

चतुर्दश पटल ] [ ३३७ पञ्चगव्ये शृतं सर्पिर्मन्त्रितं मनुनाऽमुना । गर्भिणीनां ग्रहार्त्तानां सेवितं ऽच्छुभावहम् ॥१२० उच्चस्थानगते शुक्रे मनुना साधुसाधिना । त्रिलोही मुद्रिका हन्यान् क्षुद्रभूतग्रहान् ज्वरान् ॥१२१ तद्वर्णसंख्यया सूत्रे ग्रन्थीन् कृत्वा जपादिभिः । साधितं कल्पयेद्धस्ते कण्ठे वा दुःखशान्तये ॥१२२ पञ्चगव्यं जपेत्स्पृष्ट्वा मन्त्रं दशशतावधि । न्यस्तं तत्पद्मपत्रादौ पात्रे वा ब्रह्मवृक्षजे ॥१२३ फले बिल्वस्य वा मन्त्री गृहे स्वस्य परस्य च । निखनेत् सर्वरक्षास्याद्वर्द्धते सर्वसम्पदः ॥१२४ पञ्चगव्य में शृत घृत को इस मन्त्र के द्वारा अभिमन्त्रित करे । यह गर्भिणियों और ग्रहों के द्वारा आत्तों को सेवन कराया जावे तो अत्यन्त ही शुभ करने वाला होता है ॥१२०॥ शुक्र के उच्च स्थान पर स्थित होने के समय में मन्त्र के द्वारा भली भाँति साधित की हुई तीन लोहों की मुद्रिका क्षुद्रभूत ग्रहों को और ज्वरों को नष्ट कर दिया करती हैं ॥१२१॥ उसके वर्णों की संख्या से सूत्र में जप आदि के द्वारा ग्रन्थियाँ लगाकर इसकी साधित करे और इसको हाथ में अथवा कण्ठ में धारण करे तो दुःखों की शान्ति होती है ॥१२२॥ पञ्चगव्य का स्पर्श करके एक सहस्र की अवधि पर्यन्त मन्त्र का जप करे और उसको पद्म पत्र आदि में न्यस्त करे अथवा ब्रह्म वृक्ष से निर्मित पात्र में रखे या विल्व के फल में रखे । उसको मन्त्रधारी अपने या दूसरे के गृह में गाढ़ देवे । इसका यह प्रभाव होता है कि उसकी सभी प्रकार से रक्षा होती है और सभी सम्पदा बढ़ती है ॥१२३-१२४॥ पलाशक्षीरवृक्षाणा त्वचोमलयजं पुरुम् । कुङ् कुमं यामिनीकुष्ठबिल्वायामार्गसर्षपान् ॥१२५ तिलदूर्वायवान् देवी तुलसी युगलं कुशम् । लक्ष्मी गोरोचना पद्मं वचां गोमयसंयुताम् ॥१२६

३३८ ] [ श्रीशारदा तिलक विष्णुक्रान्तामर्कयुतां जपेन्मन्त्रं विनिःक्षिपेत् । पञ्चगव्येन सम्पूर्गे पात्रे तत्संस्कृतेऽनले । १२७ संस्थाप्य क्वाथयेत् सम्यग्यांव्रत्भस्म भविष्यति । तदादाय जपेद्भूयः प्रयुतं देवता धिया । १२८ लिम्पेत्सर्वाङ्गमेतेन किञ्चिच्छिरसि निः क्षिपेत् । कृत्याद्रोहाग्रहोन्मादव्याधिदुःखानिवारणम् । १२६ सर्वशत्रु प्रशमनं सर्वपापहरम्परम् । शुभदं वश्यदं पुंसां समस्तापर्त्तिनिवारणम् । १३० गर्भिणीबालरुग्णानां विशेषेण प्रशस्यते । अस्मात्परतरा रक्षा नास्ति लोके प्रकीर्त्तित । १३१ पलाश वृक्ष तथा क्षीर वाले वृक्ष की त्वचा, चंदन, गूगन, कुंकुम वामिनी, कुण्ठ, विल्ध, अपामार्ग, सर्षप (सरसों), दूर्वा, यव, देवी, तुलसी, युगलकुशा, लक्ष्मी, गोरोचन, पद्म, वच जोगोमयेसे संयुत होवे, विष्णुक्रान्ता और अर्क इनको मंत्र का जप करते हुए पञ्चगव्य से पूर्ण पात्र में डालना चाहिए । फिर सुसंस्कृत अग्नि पर उस पात्र को रखकर भली भांति क्वाथ करे और तब तक करे जब तक भस्म हो जावे । उसको लेकर फिर देवताकी बुद्धिसे प्रयुत जप करे । १२५-१२८। इसे सर्वाङ्ग में लेपन करे और कुछ शिर पर विनिःक्षिप्त करनी चाहिए । यह कृत्या के द्रोह, ग्रहोन्माद व्याधि और दुःखों का निवारण करने वाला होता है । १२६। इसके समस्त शत्रुओं का शमन होता है और यह सब पापों का हरण करने वाला है। यह शुभों के देने वाला वश्य करने वाला और पुरुषों की सब आपदाओं का निवारक है । १३०। गर्भिणी बालक और रुग्णों को तो यह विशेष रूप से प्रशस्त माना जाता है । लोक में इससे बड़ी रक्षा कोई भी नही कही गयी है । १३१। मुस्ता शुष्ठी निशावन्हिरेलायष्टिव्रंचा वृषम् । पाठा विडङ्ग मञ्जिष्टा द्राक्षा दार्वी सरोहिणी ।१३२

चतुर्दश पटल ] [ ३३६ फलत्रयं च तैः कल्कैः पञ्चगव्येषु सर्पिषाम् । प्रस्थं पचेद्यथान्यायं मन्त्रेणानेन साधितम् । १३३ कान्तिदं सुतदं स्त्रीणां भूतप्रेतभयापहम् गर्भरक्षाकरं शुद्धं पञ्चगव्यघृतं विदुः । १३४ ठान्तान्सप्त लिखेन्मध्ये षट्षु कोणेषु तेष्वथ । मन्त्रवर्णालिखेदेतच्चक्रमापन्निवारणम् । १३५ षट्कोणमध्ये विलिखेत्ससाध्यं तारं षड् ववशिष्टवर्णान् । अङ्गानि तत्सन्धिषु मन्त्रमेतत्करोति रक्षां विधिवत्प्रजप्तम् । १३६ मुस्ता, शुण्ठी, हल्दी, वह्नि (चित्रक), एला (इलायची), यष्टि (यष्टी, मधु), वच, वृष, पाठा, विडङ्ग, माञ्जिष्ठा, द्राक्षा वार्ती, रोहिणी, तीन फल (हर्र, बहेड़ा, आमला) इन सबके कल्कींको पञ्चगव्य मिश्रित घृत में डाल कर विधिपूर्वक इस मंत्र द्वारा साधित करके पकावे । १३२-१३३। इसको शुद्ध पंचगव्य घृत कहते हैं। यह कान्ति के देने वाला, स्त्रियों को पुत्र दाता, भूत प्रेतों के भय का अपहर्त्ता, गर्भ की रक्षा करने वाला होता है । १३४। अब मन्त्र बतलाया जाता है— मध्यादि षट्कोणों में सात ठकारों को मिलकर उन ठकारों में क्रम से मन्त्र के अक्षरों का लेखन करना चाहिए । साध्य साधक का कर्म भी लिखना चाहिए । यह चक्र आपदाओं का निवारण करने वाला है । १३५। अब दूसरा मन्त्र बतलाया जाता है—षट्कोणों के मध्य में साध्य के सहित प्रणव तथा ६ अस्त्रों में अवशिष्ट वर्णों को लिखे । उनकी सन्धियों में अङ्गों को लिखे । फिर विधि के साथ अभि- मन्त्रित किया हुआ यह मन्त्र रक्षा किया करता है । १२६। तारं लिखेट्टान्तगतं ससाध्यं कोणेषू शिष्टे मनुवर्णषट्कम् अङ्गानि सन्धिष्वथ षोडशार्णं सषोडशार्णं वसुधानुरस्थम् । १३७ जपित्वा कृतसम्पातं गर्भिणीनां हितं परम् । अभिचारग्रहोन्मादान्यन्त्रमेतद्विनाशयेत् । १३८

३४० ] [ श्रीशारदा तिलक मध्ये तारं ससाध्यं मनुमथ विलिखेत् षट्पु कोणेषु सन्धि ष्वङ्गान्यन्ते कलानां युगयुगविलसत्केशराष्टाणपत्रम् । किञ्जल्काद्विवसुदललसत्षोडशार्णस्वनाम्ना हक्षाभ्यां त्रिः परीतं लिखतु परिवृतंतत्त्रिपाशांड कुशाभ्याम् ।१३६ तारन्नमो भगवते महासुदर्शनाय च । वर्मास्त्रान्तश्चक्रमन्त्रः षोडशाक्षर ईरितः ।१४० अब अन्य यन्त्र बताया जाता है टकार के अन्तर्गत प्रणव को लिखे जो साध्य के सहित होवे शिष्ट कोणों में मन्त्र के छै वर्णों का लेखन करना चाहिये । सन्धियों में अङ्गों को लिखें । षोडश वर्णों के सहित षोडशाद लिखे और उसे भूपुर में स्थित करे ।१३७-१३८। जप करके सम्पात किया हुआ गर्भिणी नारियों के हित के प्रदान करने वाला होता है। यह यन्त्र अभिचार—ग्रहोन्माद का विनाश कर दिया करता है ।१३६। अब अन्य यन्त्र को बतलाते है—मध्य में राज्य के सहित प्रणव को तथा मन्त्र को लिखे । मन्त्र यहां पर प्रणव से अतिरिक्त कवच मन्त्र ग्रहण किया जाता है। इसके अनन्तर षट्कोणों में और सन्धियों में अङ्गों का लेखन करे। अन्त में अर्थात् षोडश कोणों के बाहर स्वरों के दो-दो से शोभित केशरों के आठ वर्ण पत्र को बनावे । फिर किंजल्का के आदि वर्णों से षोड़श दलों से शोभित अपने नाम से षोड़श वर्णों को लिखना चाहिये । हकार और क्षकार तीन बार परीत करे । फिर तीन पाश और अंकुशों से उसे परिवृत करे अब षोड़शाक्षर मन्त्र का उद्धार बताया जाता है - प्रणव फिर 'नमो भगवते महासुदर्शनाय' कहे और वर्म और अस्त्र अन्त में कहे—यह षोड़श अक्षरों वाला चक्र मन्त्र कहा गया है ।१३६-१४०। चक्रयन्त्रमिदं प्रोक्तं सर्वभीति निवारणम् । क्षुद्रापमृत्युशमनं राज्ञां विजयवर्द्धनम् ।१४१ रेखा विलिख्याष्टशिरांसि तामासाध्य वाह्यं श्रुतिशः क्रमेण । स्थाने हृषीकेषमनुं विभज्य पादालिखेत्कोष्ठचतुष्टतस्थान् ।१४२

पंचदश पटल ] [ ३४१ अष्टाक्षरार्णैः प्रतिदर्भितास्तान्कोष्ठद्वये चक्रमनुं यथावत् । मध्यस्थकोष्ठे विलिखेत्साध्यं स्यात्सप्तकोष्ठाद्वयन्त्रमेतत् ॥१४३ स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च । रक्षांसि भीतानि दिशोद्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसंघा ॥१४४ धारितं सप्तकोष्ठं तत्त्रायते महतो भयात् । दुःस्वप्नदुर्निमित्तादिशमनङ्कीर्तितं बुधैः ॥१४५ यह चक्र यन्त्र कहा गया है जो सभी प्रकार के भयों का निवारण करने वाला होता है । यह क्षुद्र अपमृत्यु के शमन करने वाला तथा नृपों के विजय के बढ़ाने वाला होता है ॥१४१॥ अब सप्तकोष्ठ यन्त्र को बतलाते हैं-आठ शिरों वाली रेखायें को लिखकर बाहिर चारों के क्रम से उनको आबद्ध करे । स्थान में हृषीकेश मन्त्र को विभक्त करके चारों ओष्ठों मेरे स्थिते पादोंका लेखन करे । उनको अष्टाक्षर के वर्णों से प्रतिदर्भित करे और यथा रीति से दो कोष्ठों में चक्र मन्त्र को लिखे । मध्य में स्थित कोष्ठ में साध्य के सहित लिखे तो यह सप्तकोष्ठ नामक यन्त्र होता है ॥ १४२-१४२॥ हे हृषीकेश ! यह ठीक ही है आपकी कीर्त्ति से यह जगत् प्रहृष्ठ और अनुरंजित होता है । इससे सब राक्षस भीत होते हैं, दिशायें द्रवित होती है और सब सिद्धों के सङ्घ नमस्कार किया करते हैं । इस सप्त कोष्ठ को धारण करे तो यह महान् भय से रक्षा करता है । मनीषियों के मतानुसार यह दुःस्वप्न और दुर्निमित्त आदि का यजन करने वाला कीर्त्तित किया है ॥१४५॥

पंचदश पटल

॥ पुरुषोत्तम प्रकरण ॥

अथ वक्ष्ये जगन्मूलं मन्त्रं श्रीपुरुषोत्तमम् । रोपितं वैष्णवे तन्त्रे भुक्तिमुक्तिफलप्रदम् ॥१

३४२ ] [ श्रीशारदा तिलक तारमाररमाबीजं नत्यन्ते पुरुषोत्तमम् । पुनरप्रतिरूपान्ते ततो लक्ष्मीनिवासच ।२ सकलान्ते जगत्पूर्वं क्षोभणेति पद पुनः । सर्वस्त्रीहृदयोपेत विदारणपदं पुनः । ३ ततः परं त्रिभुवनमदोन्मादकरं ततः सुरासुरान्ते मनुजसुन्दरीजनशब्द (वर्ण) तः ।४ मनांसि तापयद्वन्द्वं दीपयद्वितयं पुनः । शोषयद्वियं भूयो मारयद्वितयं पुनः । ५ स्तम्भयद्वितयं पश्चान्मोहयद्वितये पुनः । द्रावयद्वितयं पश्चादाकर्षययुगं ततः ।६ समस्तपरमोपेतं सुभगेन च संयुतम् । सर्वसौभाग्यशब्दान्ते करेति पदसंयुतम् ।७ सर्वकामप्रदममुकं हनयुग्मकम् । चक्रेण गदया पश्चात् खड्गेन तदनन्तरम् ।८ इसके अनन्तर जगत् के मूल स्वरूप श्री पुरुषोत्तम मन्त्र को बतलाऊँगा जो वैष्णव तन्त्र में गोपित है और सांसारिक सुखों के उपभोग और सांसारिक बन्धन से मोक्ष दोनों ही के फल का प्रदान करने वाला है ।१। तार (प्रणव), मार, काम बीज, रमा बीज, फिर ‘नमः’—यह पद, इसके अन्त में ‘पुरुषोत्तम’—यह पद, फिर ‘अप्रतिरूप’ और इसके अन्त में लक्ष्मी निवास’ यह पद, सबके अन्त में ‘जगत्पूर्व—वह पद, फिर ‘क्षोभण’ पद, फिर ‘सर्व स्त्री हृदयोपेत विदारण’—यह पद, इसके आगे ‘त्रिभुवन मदोन्मादकर’ यह पद, फिर ‘सुरासुर’ इसके अन्त में ‘मनुजसुन्दरीजन’—यह पद, फिर इसके अन्त में ‘मनासि’ यह पद होना चाहिए । फिर ‘मारय’—यह दोवार फिर ‘दीपय’—यह पद दो बार, इसके पश्चात् ‘शोषय’ और ‘मारय ये दोनों पद दो-दो बार कहे । फिर ‘स्तम्भय’ और ‘मोहय’ ये दोनों पद दो- दो बार कहे । फिर ‘द्रावय’ और आकर्षय’—ये दो पद दो-दो बार

पंचदश पटल ] [ ३४३ है। फिर 'समस्त परम' से उपेत और सुभगन'—इससे संयुत कहे । सर्व सौभाग्य' के अन्त में कर' इस पद से संयुत करे। फिर 'सर्व काम प्रद' यह कहकर 'अमुकं, हन-हन' कहे। फिर 'चक्रेण, गदया, खङ्गेन' में पद कहे ।२-८। कट्टद्वयान्तेऽङ्कुशेन ताडयद्वितय पुनः । सर्ववाणिभिन्दयुग पाशेनेति पदं ततः ।६ त्वरशब्दद्वयमथोकिन्तिष्ठसि पदं पुनः । तावद्यावत्सदस्यान्ते समाहितमनन्तरम् ।१० ततो मे सिद्धिमाभाष्य भवत्वन्ते सवर्म फट् । नमोऽन्तोऽय मन् प्रोक्तो द्विशताक्षरसंयुतः ।११ जैमिनिर्मुनिराख्यातश्छन्दश्चामितमीरितम् । समस्तजगतामादिर्देवता पुरुषोत्तमः ।१२ फिर दो वार 'कट्ट' पद कहे और 'अंकुशेन' यहकहकर 'ताड़य' इस पद को दो वार बोले । फिर 'सर्व वाणिः' कहकर 'भिन्द' इस पद को दो बार बोले । इसके पश्चात् 'पाशेन" - यह कहकर 'त्वर'—इस पद को दो बार कहे । फिर 'कि तिष्ठसि' इस पद को कहे। 'तावद यावत्' इस पद के अनन्तर 'समाहित' यह कहे । फिर ततो में सिद्धि भवतु' यह कहकर अन्त में वर्म सहित 'फट् यह कहे। अन्त में इस मन्त्र के 'नमः' यह पद होता है। इस प्रकार से यह मन्त्र दो सौ अक्षरों वाला होता है ।६-११। इस मन्त्र का ऋषि जैमिनि कहा गया है। इस का छन्द अमित कहा गया है। इसका देवता सम्पूर्ण विश्व का आदि भगवान पुरुषोत्तम है । अब षडङ्ग मन्त्रों का उद्धार बताया जाता है ।१२। पुरुषोत्तमशब्दान्ते वदेत्त्रिभुवनं ततः (पुनः) । मदोन्मादकरान्ते हुँ हृदयं सफलं ततः ।१३ जगत् क्षोभणशब्दान्ते लक्ष्मोदयितहुँ शिरः ।१४

३४४ ] [ श्री शारदा तिलक मन्थोत्तंमसंयुक्तमङ्गजैं कामदायिनि । हुँ शिखापरमोपेतसुभगाक्षरसंयुतम् । १५ सर्वसौभाग्यकरहुँ कवच परिकीर्त्तितम् । उक्त्वा सुरासुरोपेतमनुजान्वितसुन्दरीम् । १६ ततः परस्ताद्धृदयविदारणपद वदेत् । सर्वप्रहरणधरसर्वकामिकतत्परम् । १७ हनद्वयं च हृदयं बन्धनानि ततः परम् । आकर्षयपदद्वन्द्वं महाबलहुमस्त्रकम् । १८ त्रिभुवनेश्वरपदन्ततः सर्वजनन्ततः । मनासि हनयुग्मान्ते दारय द्वितयं च मे । १६ वशमानय हुँ नेत्रं ताराद्याः फट् नमोन्तकाः । षडङ्गमन्त्राः सन्दिष्टा नेत्रान्तास्तन्त्रवेदिभिः । २० पुरुषोत्तम शब्द के अन्त में त्रिभुवन बोलना चाहिये । मदोन्माद कह कर अन्त में 'हुं', हृदयं सकलं कहे 'जगत्' क्षोभण के अन्त में लक्ष्मी दयित हुँ शिर है । मन्मथोत्तमसे सयुक्त अङ्ग के कामदायिनि हुँ शिखा है परमोपेत सुभगाक्षर से संयुत सर्व सौभाग्य करहु कवच कीर्त्तित किया गया है । सुरासुर से युक्त मनुज सुन्दरीम् यह कह कर इसके आगे हृदय विदारण पद बोलना चाहिये । उसके आगे सर्व प्रहरण धर कामिक कहे । दो हन पद हृदय है और इसके आगे बन्धनानि पद कहे । दो बार 'आकर्षय कहे । महाबल हुँ—यह प्रमव होता है । इससे आगे 'त्रिभुवनेश्वर' और फिर 'सर्वजन' कहे । फिर मनांसि कहकर दो बार हन पद और दो बार दारय पद कहे । 'वशमानयहु' नेत्र है । इनके आदि में प्रणव और अन्त में फ्ट्तथा, नमः- यह पद है । ये षडङ्ग मन्त्र सन्दिष्ट किये हैं जो तन्त्र के ज्ञाताओं के द्वारा नेत्रान्त कहे गये हैं ।१२-२०। त्रैलोक्यमोहनाणान्ते हृषीकेशपदं पुनः । पश्चादप्रतिरूपादि मन्मथानन्तरं वदेत् । २१

पंचदश पटल ] [ ३४५ सर्वादि स्त्रीपदं पश्चाद्दहृदयाकर्षणं ततः । आगच्छागच्छ मन्त्रोऽयं ताराद्यो नमसान्वितः । २२ अनेन मनुना कृत्वा व्यापकं न्यस्य बाहुषु । अष्टायुधानि मुद्राभिर्मन्त्रैः सार्द्धं विचिन्तयेत् ।२३ क्षीराम्भोनिधिमध्यस्थं निरन्तरसुरद्रुमम् । उद्यदकेंन्दुकिरणदूरीकृततमोभरम् ।२४ कालमेघसमालोकनृत्यद्बर्हिकदम्बकम् । उत्फुल्लकुसुमामोदप्रहृष्यद्भृङ्गसङ्कुलम् ।२५ कूजत्कोकिलसंघेनः वाचालितदिगन्तरम् । नानाकुसुम सौगन्धवाहिगन्धवहान्वितम् ।२६ कल्पवल्ली निकुञ्जेषु क्रीडत्सिद्धकदम्बकम् । देवगन्धर्वकन्या (नारो) भिर्यान्तोग्भिरलङ् कृतम् । २७ अनेनदीर्घिकायुक्तमुद्यानं महदधुभतम् । तस्य मध्ये मणिमये मण्डपे तोरणान्विते ।२८ त्रैलोक्य मोहन वर्णों के अन्त में हृषीकेश पद को कहे । पीछे अप्रति रूपादि और इसके अनन्तर मन्मथ बीजे ।२१। पीछे सर्वादि पद वाला स्त्री पद कहे । फिर हृदयाकर्षण कहे । पीछे आगच्छ-आगच्छ कहे। इसके आदि में प्रणव और अन्त में 'नमः यह पद है यह मंत्र है ।२२। इस मंत्र के द्वारा बाहुओं में व्यापक न्यास करे । मुद्राओं के सहित आठ आयुधों का मन्त्रों के साथ चिन्तन करना चाहिए ।२३। क्षीर सागर के मध्य में स्थित निरन्तर सुर द्रुम है-उदीय मान सूर्य और चन्द्र की किरणों से तम के भार को जहाँ पर दूर भगा दिया है-काल मेघों के समलोक में जहाँ पर नृत्य करते हुए मयूरों का समुदाय है--खिले हुए पुष्पों के गन्ध से प्रसन्न होते हैं भ्रमरों से समावृद्ध है--कूजन करती हुई कोकिलों के समूह के द्वारा दिशाओं का अन्तर शब्दायमान हो रहा है—अनेक प्रकार के कुसुमों को सुगन्ध की वहन करने वाली वायु से समन्वित कल्प वल्ली के निकुंजों में क्रीड़ा करते हुए सिद्धों के समुदाय

३४६ ] [ श्रीशारदा तिलक से समन्वित-देवों और गन्धर्वों की गायन करती हुई कन्याओं के द्वारा समलंकृत बहुत-सी बावडियों से संयुक्त एक महान् अद्भुत उद्यान है। उस उद्यान के मध्य में तोरणों से सज्जित एक मणिमय मण्डप है ।२४-२८। ऋतुभिः षड्भिरनिशं सेवितस्य महीयसः । सुरद्रुमस्य मूलस्थे महासिंहासने शुभे ।२६ रक्तारविन्दमध्यस्थगरुडोपरि संस्थितम् । ध्यायेद्वल्लभया सार्द्धं जगन्नाथं जगन्मयम् ।३० देवं श्रीपुरुषोत्तमं कमलया स्वाङ्कस्थया पङ्कजं । बिभ्रत्या परिरब्धमम्बुजरुचा तस्यां निबद्धेक्षणम् । ध्यायेच्चेतसि शंखपाशमुशलाङ्गागारि षड्गङ्गदां हस्तैरङ्कुशमुद्वहन्तमरुण स्मेरारविन्दाननम् ।३१ एवं ध्यात्वा श्रियः कान्तं मनुं लक्षचतुष्टयम् । जपेद्धशी विधायाथ कुण्डमर्द्धेन्दुसन्निभम् ।३२ जुहुयाद्वैष्णवे वह्नौ पद्मैर्जातिसमुद्भवैः । पुष्पैर्यवैः क्रमात्पश्चाद्ब्राह्मणानपि भोजयेत् ।३३ उस मण्डप में निरन्तर छ ऋतुओं के द्वारा सेवित एक महान् कल्प वृक्ष है । उस कल्प वृक्ष के मूल मे स्थित एक परम शुभ महान् सिंहासन है। उस सिंहासन पर रक्त कमल में मध्य में विराजमान गरुड़ के ऊपर संस्थित अपनी वल्लभा के साथ में जगन्मय जगन्नाथ प्रभु का ध्यान करना चाहिए ।२६-३०। अब ध्यान करने का प्रकार बतलाया जाता है—अपनी गोद में विराजमान पंकज को धारण करती हुई कमला के द्वारा समालिङ्गित कमल की कान्ति से उसमें ही अपनी दृष्टि को बाँधे हुए—कर कमलों के द्वारा शंख, पाश, मुशल, चाप शंख, गदा और अंकुश का वहन करने वाले—अरुण और मन्दस्मित युक्त मुख कमल वाले देव श्री पुरुषोत्तम का चित्त में ध्यान करना चहिए ।२६-३१। इस रीति से श्री देवी के कान्त का ध्यान करके मन्त्र

पंचदश पटल ] [ ३४७ का चार लाख जप करें । वशी आधे चन्द्रमा के समान कुण्ड की रचना करके वैष्णव वह्नि में पद्मों के द्वारा जाती के पुष्पों से और यवों से क्रम से होम करे और ब्राह्मणों को भी भोजन करावे ।३२-३३। अर्चयिष् न् जगन्नाथं गायत्र्या परिशोधयेत् । आत्मानं यागवस्तूनि यागभूमिं च देशिकः ।।३४ त्रैलोक्यमोहनायै विद्महे पदमीरयेत् । स्मराय धीमहि पश्चात्तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ।।३५ गायत्र्यैषा समाख्याता वैष्णवा सर्वसिद्धिदा । प्राक्प्रोक्ते वैष्णवे पीठे कल्पयेदामन ततः ।।३६ पक्षिराजाय ठद्वन्द्वमस्य मन्त्रः प्रकीर्त्तितः । सङ्कल्पितायां मूलेन मूर्त्तौ देवमनन्यधीः ।।३७ आवाह्य मनुना विद्वान्ब्यापकेन समर्चयेत् । भृगुर्लान्तियुतः सेन्दु बीज देव्याः प्रकीर्तितम् ।।३८ जगन्नाथ प्रभु का अर्चन करते हुए देशिक को चाहिये कि गायत्री के द्वारा अपनी आत्मा का, याग की वस्तुओं का और याग की भूमि का शोधन करे ।३४। 'त्रैलोक्य मोहनाय विद्महे' - यह पद कहे । फिर 'स्मराय धीमहि' -यह कहे-इसके पश्चात् 'प्रचोदयात्' यह बोले । वह सर्व सिद्धियों के देने वाली वैष्णवी गायत्री कही है । पूर्व में कथिते वैष्णव पीठ पर आसन की कल्पना करनी चाहिए । ३५-३६। इसके बाद 'पक्षिराशाया' कहकर दो ठकार कहे-यह इसका मन्त्र कहा गया है । मूल मन्त्र के द्वारा कल्पित की हुई मूर्त्ति में आनन्य बुद्धि वाला होकर देव का आवाहन करे । विद्वान पुरुष व्यापक मन्त्र के द्वारा समर्चन करे । लान्त से युक्त बिन्दु के सहित भृगु देवी का बीज कीर्तित किया गया है ।३७-३८। कर्णिकायां यजेदादौ विधानेनाङ्गदेवताः । दलेषु पूजयेत्पश्चाल्लक्ष्म्याद्या घृतचामराः ।३६