शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 347, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंपंचदश पटल ] [ ३४७ का चार लाख जप करें । वशी आधे चन्द्रमा के समान कुण्ड की रचना करके वैष्णव वह्नि में पद्मों के द्वारा जाती के पुष्पों से और यवों से क्रम से होम करे और ब्राह्मणों को भी भोजन करावे ।३२-३३। अर्चयिष् न् जगन्नाथं गायत्र्या परिशोधयेत् । आत्मानं यागवस्तूनि यागभूमिं च देशिकः ।।३४ त्रैलोक्यमोहनायै विद्महे पदमीरयेत् । स्मराय धीमहि पश्चात्तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ।।३५ गायत्र्यैषा समाख्याता वैष्णवा सर्वसिद्धिदा । प्राक्प्रोक्ते वैष्णवे पीठे कल्पयेदामन ततः ।।३६ पक्षिराजाय ठद्वन्द्वमस्य मन्त्रः प्रकीर्त्तितः । सङ्कल्पितायां मूलेन मूर्त्तौ देवमनन्यधीः ।।३७ आवाह्य मनुना विद्वान्ब्यापकेन समर्चयेत् । भृगुर्लान्तियुतः सेन्दु बीज देव्याः प्रकीर्तितम् ।।३८ जगन्नाथ प्रभु का अर्चन करते हुए देशिक को चाहिये कि गायत्री के द्वारा अपनी आत्मा का, याग की वस्तुओं का और याग की भूमि का शोधन करे ।३४। 'त्रैलोक्य मोहनाय विद्महे' - यह पद कहे । फिर 'स्मराय धीमहि' -यह कहे-इसके पश्चात् 'प्रचोदयात्' यह बोले । वह सर्व सिद्धियों के देने वाली वैष्णवी गायत्री कही है । पूर्व में कथिते वैष्णव पीठ पर आसन की कल्पना करनी चाहिए । ३५-३६। इसके बाद 'पक्षिराशाया' कहकर दो ठकार कहे-यह इसका मन्त्र कहा गया है । मूल मन्त्र के द्वारा कल्पित की हुई मूर्त्ति में आनन्य बुद्धि वाला होकर देव का आवाहन करे । विद्वान पुरुष व्यापक मन्त्र के द्वारा समर्चन करे । लान्त से युक्त बिन्दु के सहित भृगु देवी का बीज कीर्तित किया गया है ।३७-३८। कर्णिकायां यजेदादौ विधानेनाङ्गदेवताः । दलेषु पूजयेत्पश्चाल्लक्ष्म्याद्या घृतचामराः ।३६