भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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३४८ ] [ श्रीशारदा तिलक मुक्ताहारलसच्चारुपयोधरभारान्विताः । जपाकुसुमसदृक्षाशा मदविभ्रममन्थराः ।४० ह्रस्वत्रयल्कीविसर्गरहितस्वरशोभितम् । देवीबीजं क्रमदासां मन्त्रमाहुर्मनीषिणः ।४१ दलाग्रेषु यजेच्छंखं शार्ङ्गं चक्रमसिं गदाम् । अङ्कुशं मुसलं पाशमेतान्यस्त्राणि शार्ङ्गिणः ।४२ स्वमुद्राभिः स्वमनुभिः कथ्यन्ते मनवः क्रमात् । आद्योजलचरायान्ते ठद्वयं मनुरीरितः ।४३ शार्ङ्गाय सशरायान्ते स्वाहान्तोऽनन्तरो मनुः । सुदर्शनमहाचक्रराजान्ते स्याद्दहदद्वयम् ।४४ सर्वदुष्टभयं पश्चात्कुरु छिन्दद्वयं (युगं) पृथक् । विदारय पदद्वन्द्वं परमन्त्रान्ग्रसग्रस ।४५ भक्षाय त्रासयद्वन्द्वं प्रत्येकं वर्मठद्वयम् । चक्राय नम इत्येष तृतीयो मन्त्र ईरितः ।४६ आदि में कर्णिका में विधान से अङ्ग देवों का यजन करना चाहिए पीछे दलों में चमर धारण की हुई लक्ष्मी आदि का पूजन करे । ये सब मोतियों के हार से शोभित सुन्दर पयोधरों के भार समन्वित है । ये सब जपा के पुरुष के सदृक्ष हैं और मद के विभ्रमों से मन्थरगति वाली हैं ।३६-४०। ह्रस्वत्रय अर्थात् अ इ उ इनसे रहित और क्लीब और विसर्गों से रहित स्वर अर्थात् आ—ई ऊ—ए—ऐ—ओ—औ और अं से युक्त देवी का बीज इनको मनीषी गण मन्त्र कहते हैं ।४१। अपनी मुद्राओं से अपने मन्त्रों से क्रम से मन्त्र कहे जाते हैं । ‘आद्यजल चराय’ पद है और अन्त में दो डकार (उः डा) हैं यह मन्त्र कहा गया है ।४३। शार्ङ्गाय सशराय--इसके अन्त में स्वाहा है--यह अनन्तर मन्त्र है । सुदर्शन महचक्र राज के अन्त में तो डकार हैं । पीछे सर्व दुषभयं कुरु और दो बार छिन्द पृथक् पृथक् कहे । फिर ‘विदारय’ इस पद को दा वार कहे । पश्चात् ‘परमन्त्रान् ग्रस-ग्रस कहे’ । भक्षय--भक्षय, त्रासय--