शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३४६ ] [ श्रीशारदा तिलक से समन्वित-देवों और गन्धर्वों की गायन करती हुई कन्याओं के द्वारा समलंकृत बहुत-सी बावडियों से संयुक्त एक महान् अद्भुत उद्यान है। उस उद्यान के मध्य में तोरणों से सज्जित एक मणिमय मण्डप है ।२४-२८। ऋतुभिः षड्भिरनिशं सेवितस्य महीयसः । सुरद्रुमस्य मूलस्थे महासिंहासने शुभे ।२६ रक्तारविन्दमध्यस्थगरुडोपरि संस्थितम् । ध्यायेद्वल्लभया सार्द्धं जगन्नाथं जगन्मयम् ।३० देवं श्रीपुरुषोत्तमं कमलया स्वाङ्कस्थया पङ्कजं । बिभ्रत्या परिरब्धमम्बुजरुचा तस्यां निबद्धेक्षणम् । ध्यायेच्चेतसि शंखपाशमुशलाङ्गागारि षड्गङ्गदां हस्तैरङ्कुशमुद्वहन्तमरुण स्मेरारविन्दाननम् ।३१ एवं ध्यात्वा श्रियः कान्तं मनुं लक्षचतुष्टयम् । जपेद्धशी विधायाथ कुण्डमर्द्धेन्दुसन्निभम् ।३२ जुहुयाद्वैष्णवे वह्नौ पद्मैर्जातिसमुद्भवैः । पुष्पैर्यवैः क्रमात्पश्चाद्ब्राह्मणानपि भोजयेत् ।३३ उस मण्डप में निरन्तर छ ऋतुओं के द्वारा सेवित एक महान् कल्प वृक्ष है । उस कल्प वृक्ष के मूल मे स्थित एक परम शुभ महान् सिंहासन है। उस सिंहासन पर रक्त कमल में मध्य में विराजमान गरुड़ के ऊपर संस्थित अपनी वल्लभा के साथ में जगन्मय जगन्नाथ प्रभु का ध्यान करना चाहिए ।२६-३०। अब ध्यान करने का प्रकार बतलाया जाता है—अपनी गोद में विराजमान पंकज को धारण करती हुई कमला के द्वारा समालिङ्गित कमल की कान्ति से उसमें ही अपनी दृष्टि को बाँधे हुए—कर कमलों के द्वारा शंख, पाश, मुशल, चाप शंख, गदा और अंकुश का वहन करने वाले—अरुण और मन्दस्मित युक्त मुख कमल वाले देव श्री पुरुषोत्तम का चित्त में ध्यान करना चहिए ।२६-३१। इस रीति से श्री देवी के कान्त का ध्यान करके मन्त्र