शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 345, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंपंचदश पटल ] [ ३४५ सर्वादि स्त्रीपदं पश्चाद्दहृदयाकर्षणं ततः । आगच्छागच्छ मन्त्रोऽयं ताराद्यो नमसान्वितः । २२ अनेन मनुना कृत्वा व्यापकं न्यस्य बाहुषु । अष्टायुधानि मुद्राभिर्मन्त्रैः सार्द्धं विचिन्तयेत् ।२३ क्षीराम्भोनिधिमध्यस्थं निरन्तरसुरद्रुमम् । उद्यदकेंन्दुकिरणदूरीकृततमोभरम् ।२४ कालमेघसमालोकनृत्यद्बर्हिकदम्बकम् । उत्फुल्लकुसुमामोदप्रहृष्यद्भृङ्गसङ्कुलम् ।२५ कूजत्कोकिलसंघेनः वाचालितदिगन्तरम् । नानाकुसुम सौगन्धवाहिगन्धवहान्वितम् ।२६ कल्पवल्ली निकुञ्जेषु क्रीडत्सिद्धकदम्बकम् । देवगन्धर्वकन्या (नारो) भिर्यान्तोग्भिरलङ् कृतम् । २७ अनेनदीर्घिकायुक्तमुद्यानं महदधुभतम् । तस्य मध्ये मणिमये मण्डपे तोरणान्विते ।२८ त्रैलोक्य मोहन वर्णों के अन्त में हृषीकेश पद को कहे । पीछे अप्रति रूपादि और इसके अनन्तर मन्मथ बीजे ।२१। पीछे सर्वादि पद वाला स्त्री पद कहे । फिर हृदयाकर्षण कहे । पीछे आगच्छ-आगच्छ कहे। इसके आदि में प्रणव और अन्त में 'नमः यह पद है यह मंत्र है ।२२। इस मंत्र के द्वारा बाहुओं में व्यापक न्यास करे । मुद्राओं के सहित आठ आयुधों का मन्त्रों के साथ चिन्तन करना चाहिए ।२३। क्षीर सागर के मध्य में स्थित निरन्तर सुर द्रुम है-उदीय मान सूर्य और चन्द्र की किरणों से तम के भार को जहाँ पर दूर भगा दिया है-काल मेघों के समलोक में जहाँ पर नृत्य करते हुए मयूरों का समुदाय है--खिले हुए पुष्पों के गन्ध से प्रसन्न होते हैं भ्रमरों से समावृद्ध है--कूजन करती हुई कोकिलों के समूह के द्वारा दिशाओं का अन्तर शब्दायमान हो रहा है—अनेक प्रकार के कुसुमों को सुगन्ध की वहन करने वाली वायु से समन्वित कल्प वल्ली के निकुंजों में क्रीड़ा करते हुए सिद्धों के समुदाय