शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 338, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें३३८ ] [ श्रीशारदा तिलक विष्णुक्रान्तामर्कयुतां जपेन्मन्त्रं विनिःक्षिपेत् । पञ्चगव्येन सम्पूर्गे पात्रे तत्संस्कृतेऽनले । १२७ संस्थाप्य क्वाथयेत् सम्यग्यांव्रत्भस्म भविष्यति । तदादाय जपेद्भूयः प्रयुतं देवता धिया । १२८ लिम्पेत्सर्वाङ्गमेतेन किञ्चिच्छिरसि निः क्षिपेत् । कृत्याद्रोहाग्रहोन्मादव्याधिदुःखानिवारणम् । १२६ सर्वशत्रु प्रशमनं सर्वपापहरम्परम् । शुभदं वश्यदं पुंसां समस्तापर्त्तिनिवारणम् । १३० गर्भिणीबालरुग्णानां विशेषेण प्रशस्यते । अस्मात्परतरा रक्षा नास्ति लोके प्रकीर्त्तित । १३१ पलाश वृक्ष तथा क्षीर वाले वृक्ष की त्वचा, चंदन, गूगन, कुंकुम वामिनी, कुण्ठ, विल्ध, अपामार्ग, सर्षप (सरसों), दूर्वा, यव, देवी, तुलसी, युगलकुशा, लक्ष्मी, गोरोचन, पद्म, वच जोगोमयेसे संयुत होवे, विष्णुक्रान्ता और अर्क इनको मंत्र का जप करते हुए पञ्चगव्य से पूर्ण पात्र में डालना चाहिए । फिर सुसंस्कृत अग्नि पर उस पात्र को रखकर भली भांति क्वाथ करे और तब तक करे जब तक भस्म हो जावे । उसको लेकर फिर देवताकी बुद्धिसे प्रयुत जप करे । १२५-१२८। इसे सर्वाङ्ग में लेपन करे और कुछ शिर पर विनिःक्षिप्त करनी चाहिए । यह कृत्या के द्रोह, ग्रहोन्माद व्याधि और दुःखों का निवारण करने वाला होता है । १२६। इसके समस्त शत्रुओं का शमन होता है और यह सब पापों का हरण करने वाला है। यह शुभों के देने वाला वश्य करने वाला और पुरुषों की सब आपदाओं का निवारक है । १३०। गर्भिणी बालक और रुग्णों को तो यह विशेष रूप से प्रशस्त माना जाता है । लोक में इससे बड़ी रक्षा कोई भी नही कही गयी है । १३१। मुस्ता शुष्ठी निशावन्हिरेलायष्टिव्रंचा वृषम् । पाठा विडङ्ग मञ्जिष्टा द्राक्षा दार्वी सरोहिणी ।१३२