भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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चतुर्दश पटल ] [ ३३७ पञ्चगव्ये शृतं सर्पिर्मन्त्रितं मनुनाऽमुना । गर्भिणीनां ग्रहार्त्तानां सेवितं ऽच्छुभावहम् ॥१२० उच्चस्थानगते शुक्रे मनुना साधुसाधिना । त्रिलोही मुद्रिका हन्यान् क्षुद्रभूतग्रहान् ज्वरान् ॥१२१ तद्वर्णसंख्यया सूत्रे ग्रन्थीन् कृत्वा जपादिभिः । साधितं कल्पयेद्धस्ते कण्ठे वा दुःखशान्तये ॥१२२ पञ्चगव्यं जपेत्स्पृष्ट्वा मन्त्रं दशशतावधि । न्यस्तं तत्पद्मपत्रादौ पात्रे वा ब्रह्मवृक्षजे ॥१२३ फले बिल्वस्य वा मन्त्री गृहे स्वस्य परस्य च । निखनेत् सर्वरक्षास्याद्वर्द्धते सर्वसम्पदः ॥१२४ पञ्चगव्य में शृत घृत को इस मन्त्र के द्वारा अभिमन्त्रित करे । यह गर्भिणियों और ग्रहों के द्वारा आत्तों को सेवन कराया जावे तो अत्यन्त ही शुभ करने वाला होता है ॥१२०॥ शुक्र के उच्च स्थान पर स्थित होने के समय में मन्त्र के द्वारा भली भाँति साधित की हुई तीन लोहों की मुद्रिका क्षुद्रभूत ग्रहों को और ज्वरों को नष्ट कर दिया करती हैं ॥१२१॥ उसके वर्णों की संख्या से सूत्र में जप आदि के द्वारा ग्रन्थियाँ लगाकर इसकी साधित करे और इसको हाथ में अथवा कण्ठ में धारण करे तो दुःखों की शान्ति होती है ॥१२२॥ पञ्चगव्य का स्पर्श करके एक सहस्र की अवधि पर्यन्त मन्त्र का जप करे और उसको पद्म पत्र आदि में न्यस्त करे अथवा ब्रह्म वृक्ष से निर्मित पात्र में रखे या विल्व के फल में रखे । उसको मन्त्रधारी अपने या दूसरे के गृह में गाढ़ देवे । इसका यह प्रभाव होता है कि उसकी सभी प्रकार से रक्षा होती है और सभी सम्पदा बढ़ती है ॥१२३-१२४॥ पलाशक्षीरवृक्षाणा त्वचोमलयजं पुरुम् । कुङ् कुमं यामिनीकुष्ठबिल्वायामार्गसर्षपान् ॥१२५ तिलदूर्वायवान् देवी तुलसी युगलं कुशम् । लक्ष्मी गोरोचना पद्मं वचां गोमयसंयुताम् ॥१२६