शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 339, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्दश पटल ] [ ३३६ फलत्रयं च तैः कल्कैः पञ्चगव्येषु सर्पिषाम् । प्रस्थं पचेद्यथान्यायं मन्त्रेणानेन साधितम् । १३३ कान्तिदं सुतदं स्त्रीणां भूतप्रेतभयापहम् गर्भरक्षाकरं शुद्धं पञ्चगव्यघृतं विदुः । १३४ ठान्तान्सप्त लिखेन्मध्ये षट्षु कोणेषु तेष्वथ । मन्त्रवर्णालिखेदेतच्चक्रमापन्निवारणम् । १३५ षट्कोणमध्ये विलिखेत्ससाध्यं तारं षड् ववशिष्टवर्णान् । अङ्गानि तत्सन्धिषु मन्त्रमेतत्करोति रक्षां विधिवत्प्रजप्तम् । १३६ मुस्ता, शुण्ठी, हल्दी, वह्नि (चित्रक), एला (इलायची), यष्टि (यष्टी, मधु), वच, वृष, पाठा, विडङ्ग, माञ्जिष्ठा, द्राक्षा वार्ती, रोहिणी, तीन फल (हर्र, बहेड़ा, आमला) इन सबके कल्कींको पञ्चगव्य मिश्रित घृत में डाल कर विधिपूर्वक इस मंत्र द्वारा साधित करके पकावे । १३२-१३३। इसको शुद्ध पंचगव्य घृत कहते हैं। यह कान्ति के देने वाला, स्त्रियों को पुत्र दाता, भूत प्रेतों के भय का अपहर्त्ता, गर्भ की रक्षा करने वाला होता है । १३४। अब मन्त्र बतलाया जाता है— मध्यादि षट्कोणों में सात ठकारों को मिलकर उन ठकारों में क्रम से मन्त्र के अक्षरों का लेखन करना चाहिए । साध्य साधक का कर्म भी लिखना चाहिए । यह चक्र आपदाओं का निवारण करने वाला है । १३५। अब दूसरा मन्त्र बतलाया जाता है—षट्कोणों के मध्य में साध्य के सहित प्रणव तथा ६ अस्त्रों में अवशिष्ट वर्णों को लिखे । उनकी सन्धियों में अङ्गों को लिखे । फिर विधि के साथ अभि- मन्त्रित किया हुआ यह मन्त्र रक्षा किया करता है । १२६। तारं लिखेट्टान्तगतं ससाध्यं कोणेषू शिष्टे मनुवर्णषट्कम् अङ्गानि सन्धिष्वथ षोडशार्णं सषोडशार्णं वसुधानुरस्थम् । १३७ जपित्वा कृतसम्पातं गर्भिणीनां हितं परम् । अभिचारग्रहोन्मादान्यन्त्रमेतद्विनाशयेत् । १३८