भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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पृष्ठ 340

३४० ] [ श्रीशारदा तिलक मध्ये तारं ससाध्यं मनुमथ विलिखेत् षट्पु कोणेषु सन्धि ष्वङ्गान्यन्ते कलानां युगयुगविलसत्केशराष्टाणपत्रम् । किञ्जल्काद्विवसुदललसत्षोडशार्णस्वनाम्ना हक्षाभ्यां त्रिः परीतं लिखतु परिवृतंतत्त्रिपाशांड कुशाभ्याम् ।१३६ तारन्नमो भगवते महासुदर्शनाय च । वर्मास्त्रान्तश्चक्रमन्त्रः षोडशाक्षर ईरितः ।१४० अब अन्य यन्त्र बताया जाता है टकार के अन्तर्गत प्रणव को लिखे जो साध्य के सहित होवे शिष्ट कोणों में मन्त्र के छै वर्णों का लेखन करना चाहिये । सन्धियों में अङ्गों को लिखें । षोडश वर्णों के सहित षोडशाद लिखे और उसे भूपुर में स्थित करे ।१३७-१३८। जप करके सम्पात किया हुआ गर्भिणी नारियों के हित के प्रदान करने वाला होता है। यह यन्त्र अभिचार—ग्रहोन्माद का विनाश कर दिया करता है ।१३६। अब अन्य यन्त्र को बतलाते है—मध्य में राज्य के सहित प्रणव को तथा मन्त्र को लिखे । मन्त्र यहां पर प्रणव से अतिरिक्त कवच मन्त्र ग्रहण किया जाता है। इसके अनन्तर षट्कोणों में और सन्धियों में अङ्गों का लेखन करे। अन्त में अर्थात् षोडश कोणों के बाहर स्वरों के दो-दो से शोभित केशरों के आठ वर्ण पत्र को बनावे । फिर किंजल्का के आदि वर्णों से षोड़श दलों से शोभित अपने नाम से षोड़श वर्णों को लिखना चाहिये । हकार और क्षकार तीन बार परीत करे । फिर तीन पाश और अंकुशों से उसे परिवृत करे अब षोड़शाक्षर मन्त्र का उद्धार बताया जाता है - प्रणव फिर 'नमो भगवते महासुदर्शनाय' कहे और वर्म और अस्त्र अन्त में कहे—यह षोड़श अक्षरों वाला चक्र मन्त्र कहा गया है ।१३६-१४०। चक्रयन्त्रमिदं प्रोक्तं सर्वभीति निवारणम् । क्षुद्रापमृत्युशमनं राज्ञां विजयवर्द्धनम् ।१४१ रेखा विलिख्याष्टशिरांसि तामासाध्य वाह्यं श्रुतिशः क्रमेण । स्थाने हृषीकेषमनुं विभज्य पादालिखेत्कोष्ठचतुष्टतस्थान् ।१४२