शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ
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पंचदश पटल ] [ ३४१ अष्टाक्षरार्णैः प्रतिदर्भितास्तान्कोष्ठद्वये चक्रमनुं यथावत् । मध्यस्थकोष्ठे विलिखेत्साध्यं स्यात्सप्तकोष्ठाद्वयन्त्रमेतत् ॥१४३ स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च । रक्षांसि भीतानि दिशोद्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसंघा ॥१४४ धारितं सप्तकोष्ठं तत्त्रायते महतो भयात् । दुःस्वप्नदुर्निमित्तादिशमनङ्कीर्तितं बुधैः ॥१४५ यह चक्र यन्त्र कहा गया है जो सभी प्रकार के भयों का निवारण करने वाला होता है । यह क्षुद्र अपमृत्यु के शमन करने वाला तथा नृपों के विजय के बढ़ाने वाला होता है ॥१४१॥ अब सप्तकोष्ठ यन्त्र को बतलाते हैं-आठ शिरों वाली रेखायें को लिखकर बाहिर चारों के क्रम से उनको आबद्ध करे । स्थान में हृषीकेश मन्त्र को विभक्त करके चारों ओष्ठों मेरे स्थिते पादोंका लेखन करे । उनको अष्टाक्षर के वर्णों से प्रतिदर्भित करे और यथा रीति से दो कोष्ठों में चक्र मन्त्र को लिखे । मध्य में स्थित कोष्ठ में साध्य के सहित लिखे तो यह सप्तकोष्ठ नामक यन्त्र होता है ॥ १४२-१४२॥ हे हृषीकेश ! यह ठीक ही है आपकी कीर्त्ति से यह जगत् प्रहृष्ठ और अनुरंजित होता है । इससे सब राक्षस भीत होते हैं, दिशायें द्रवित होती है और सब सिद्धों के सङ्घ नमस्कार किया करते हैं । इस सप्त कोष्ठ को धारण करे तो यह महान् भय से रक्षा करता है । मनीषियों के मतानुसार यह दुःस्वप्न और दुर्निमित्त आदि का यजन करने वाला कीर्त्तित किया है ॥१४५॥
पंचदश पटल
॥ पुरुषोत्तम प्रकरण ॥
अथ वक्ष्ये जगन्मूलं मन्त्रं श्रीपुरुषोत्तमम् । रोपितं वैष्णवे तन्त्रे भुक्तिमुक्तिफलप्रदम् ॥१