शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 342, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें३४२ ] [ श्रीशारदा तिलक तारमाररमाबीजं नत्यन्ते पुरुषोत्तमम् । पुनरप्रतिरूपान्ते ततो लक्ष्मीनिवासच ।२ सकलान्ते जगत्पूर्वं क्षोभणेति पद पुनः । सर्वस्त्रीहृदयोपेत विदारणपदं पुनः । ३ ततः परं त्रिभुवनमदोन्मादकरं ततः सुरासुरान्ते मनुजसुन्दरीजनशब्द (वर्ण) तः ।४ मनांसि तापयद्वन्द्वं दीपयद्वितयं पुनः । शोषयद्वियं भूयो मारयद्वितयं पुनः । ५ स्तम्भयद्वितयं पश्चान्मोहयद्वितये पुनः । द्रावयद्वितयं पश्चादाकर्षययुगं ततः ।६ समस्तपरमोपेतं सुभगेन च संयुतम् । सर्वसौभाग्यशब्दान्ते करेति पदसंयुतम् ।७ सर्वकामप्रदममुकं हनयुग्मकम् । चक्रेण गदया पश्चात् खड्गेन तदनन्तरम् ।८ इसके अनन्तर जगत् के मूल स्वरूप श्री पुरुषोत्तम मन्त्र को बतलाऊँगा जो वैष्णव तन्त्र में गोपित है और सांसारिक सुखों के उपभोग और सांसारिक बन्धन से मोक्ष दोनों ही के फल का प्रदान करने वाला है ।१। तार (प्रणव), मार, काम बीज, रमा बीज, फिर ‘नमः’—यह पद, इसके अन्त में ‘पुरुषोत्तम’—यह पद, फिर ‘अप्रतिरूप’ और इसके अन्त में लक्ष्मी निवास’ यह पद, सबके अन्त में ‘जगत्पूर्व—वह पद, फिर ‘क्षोभण’ पद, फिर ‘सर्व स्त्री हृदयोपेत विदारण’—यह पद, इसके आगे ‘त्रिभुवन मदोन्मादकर’ यह पद, फिर ‘सुरासुर’ इसके अन्त में ‘मनुजसुन्दरीजन’—यह पद, फिर इसके अन्त में ‘मनासि’ यह पद होना चाहिए । फिर ‘मारय’—यह दोवार फिर ‘दीपय’—यह पद दो बार, इसके पश्चात् ‘शोषय’ और ‘मारय ये दोनों पद दो-दो बार कहे । फिर ‘स्तम्भय’ और ‘मोहय’ ये दोनों पद दो- दो बार कहे । फिर ‘द्रावय’ और आकर्षय’—ये दो पद दो-दो बार