भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 343, कुल 511 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 343

पंचदश पटल ] [ ३४३ है। फिर 'समस्त परम' से उपेत और सुभगन'—इससे संयुत कहे । सर्व सौभाग्य' के अन्त में कर' इस पद से संयुत करे। फिर 'सर्व काम प्रद' यह कहकर 'अमुकं, हन-हन' कहे। फिर 'चक्रेण, गदया, खङ्गेन' में पद कहे ।२-८। कट्टद्वयान्तेऽङ्कुशेन ताडयद्वितय पुनः । सर्ववाणिभिन्दयुग पाशेनेति पदं ततः ।६ त्वरशब्दद्वयमथोकिन्तिष्ठसि पदं पुनः । तावद्यावत्सदस्यान्ते समाहितमनन्तरम् ।१० ततो मे सिद्धिमाभाष्य भवत्वन्ते सवर्म फट् । नमोऽन्तोऽय मन् प्रोक्तो द्विशताक्षरसंयुतः ।११ जैमिनिर्मुनिराख्यातश्छन्दश्चामितमीरितम् । समस्तजगतामादिर्देवता पुरुषोत्तमः ।१२ फिर दो वार 'कट्ट' पद कहे और 'अंकुशेन' यहकहकर 'ताड़य' इस पद को दो वार बोले । फिर 'सर्व वाणिः' कहकर 'भिन्द' इस पद को दो बार बोले । इसके पश्चात् 'पाशेन" - यह कहकर 'त्वर'—इस पद को दो बार कहे । फिर 'कि तिष्ठसि' इस पद को कहे। 'तावद यावत्' इस पद के अनन्तर 'समाहित' यह कहे । फिर ततो में सिद्धि भवतु' यह कहकर अन्त में वर्म सहित 'फट् यह कहे। अन्त में इस मन्त्र के 'नमः' यह पद होता है। इस प्रकार से यह मन्त्र दो सौ अक्षरों वाला होता है ।६-११। इस मन्त्र का ऋषि जैमिनि कहा गया है। इस का छन्द अमित कहा गया है। इसका देवता सम्पूर्ण विश्व का आदि भगवान पुरुषोत्तम है । अब षडङ्ग मन्त्रों का उद्धार बताया जाता है ।१२। पुरुषोत्तमशब्दान्ते वदेत्त्रिभुवनं ततः (पुनः) । मदोन्मादकरान्ते हुँ हृदयं सफलं ततः ।१३ जगत् क्षोभणशब्दान्ते लक्ष्मोदयितहुँ शिरः ।१४