शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
चतुर्दश पटल ] [ ३३६ फलत्रयं च तैः कल्कैः पञ्चगव्येषु सर्पिषाम् । प्रस्थं पचेद्यथान्यायं मन्त्रेणानेन साधितम् । १३३ कान्तिदं सुतदं स्त्रीणां भूतप्रेतभयापहम् गर्भरक्षाकरं शुद्धं पञ्चगव्यघृतं विदुः । १३४ ठान्तान्सप्त लिखेन्मध्ये षट्षु कोणेषु तेष्वथ । मन्त्रवर्णालिखेदेतच्चक्रमापन्निवारणम् । १३५ षट्कोणमध्ये विलिखेत्ससाध्यं तारं षड् ववशिष्टवर्णान् । अङ्गानि तत्सन्धिषु मन्त्रमेतत्करोति रक्षां विधिवत्प्रजप्तम् । १३६ मुस्ता, शुण्ठी, हल्दी, वह्नि (चित्रक), एला (इलायची), यष्टि (यष्टी, मधु), वच, वृष, पाठा, विडङ्ग, माञ्जिष्ठा, द्राक्षा वार्ती, रोहिणी, तीन फल (हर्र, बहेड़ा, आमला) इन सबके कल्कींको पञ्चगव्य मिश्रित घृत में डाल कर विधिपूर्वक इस मंत्र द्वारा साधित करके पकावे । १३२-१३३। इसको शुद्ध पंचगव्य घृत कहते हैं। यह कान्ति के देने वाला, स्त्रियों को पुत्र दाता, भूत प्रेतों के भय का अपहर्त्ता, गर्भ की रक्षा करने वाला होता है । १३४। अब मन्त्र बतलाया जाता है— मध्यादि षट्कोणों में सात ठकारों को मिलकर उन ठकारों में क्रम से मन्त्र के अक्षरों का लेखन करना चाहिए । साध्य साधक का कर्म भी लिखना चाहिए । यह चक्र आपदाओं का निवारण करने वाला है । १३५। अब दूसरा मन्त्र बतलाया जाता है—षट्कोणों के मध्य में साध्य के सहित प्रणव तथा ६ अस्त्रों में अवशिष्ट वर्णों को लिखे । उनकी सन्धियों में अङ्गों को लिखे । फिर विधि के साथ अभि- मन्त्रित किया हुआ यह मन्त्र रक्षा किया करता है । १२६। तारं लिखेट्टान्तगतं ससाध्यं कोणेषू शिष्टे मनुवर्णषट्कम् अङ्गानि सन्धिष्वथ षोडशार्णं सषोडशार्णं वसुधानुरस्थम् । १३७ जपित्वा कृतसम्पातं गर्भिणीनां हितं परम् । अभिचारग्रहोन्मादान्यन्त्रमेतद्विनाशयेत् । १३८
३४० ] [ श्रीशारदा तिलक मध्ये तारं ससाध्यं मनुमथ विलिखेत् षट्पु कोणेषु सन्धि ष्वङ्गान्यन्ते कलानां युगयुगविलसत्केशराष्टाणपत्रम् । किञ्जल्काद्विवसुदललसत्षोडशार्णस्वनाम्ना हक्षाभ्यां त्रिः परीतं लिखतु परिवृतंतत्त्रिपाशांड कुशाभ्याम् ।१३६ तारन्नमो भगवते महासुदर्शनाय च । वर्मास्त्रान्तश्चक्रमन्त्रः षोडशाक्षर ईरितः ।१४० अब अन्य यन्त्र बताया जाता है टकार के अन्तर्गत प्रणव को लिखे जो साध्य के सहित होवे शिष्ट कोणों में मन्त्र के छै वर्णों का लेखन करना चाहिये । सन्धियों में अङ्गों को लिखें । षोडश वर्णों के सहित षोडशाद लिखे और उसे भूपुर में स्थित करे ।१३७-१३८। जप करके सम्पात किया हुआ गर्भिणी नारियों के हित के प्रदान करने वाला होता है। यह यन्त्र अभिचार—ग्रहोन्माद का विनाश कर दिया करता है ।१३६। अब अन्य यन्त्र को बतलाते है—मध्य में राज्य के सहित प्रणव को तथा मन्त्र को लिखे । मन्त्र यहां पर प्रणव से अतिरिक्त कवच मन्त्र ग्रहण किया जाता है। इसके अनन्तर षट्कोणों में और सन्धियों में अङ्गों का लेखन करे। अन्त में अर्थात् षोडश कोणों के बाहर स्वरों के दो-दो से शोभित केशरों के आठ वर्ण पत्र को बनावे । फिर किंजल्का के आदि वर्णों से षोड़श दलों से शोभित अपने नाम से षोड़श वर्णों को लिखना चाहिये । हकार और क्षकार तीन बार परीत करे । फिर तीन पाश और अंकुशों से उसे परिवृत करे अब षोड़शाक्षर मन्त्र का उद्धार बताया जाता है - प्रणव फिर 'नमो भगवते महासुदर्शनाय' कहे और वर्म और अस्त्र अन्त में कहे—यह षोड़श अक्षरों वाला चक्र मन्त्र कहा गया है ।१३६-१४०। चक्रयन्त्रमिदं प्रोक्तं सर्वभीति निवारणम् । क्षुद्रापमृत्युशमनं राज्ञां विजयवर्द्धनम् ।१४१ रेखा विलिख्याष्टशिरांसि तामासाध्य वाह्यं श्रुतिशः क्रमेण । स्थाने हृषीकेषमनुं विभज्य पादालिखेत्कोष्ठचतुष्टतस्थान् ।१४२
पंचदश पटल ] [ ३४१ अष्टाक्षरार्णैः प्रतिदर्भितास्तान्कोष्ठद्वये चक्रमनुं यथावत् । मध्यस्थकोष्ठे विलिखेत्साध्यं स्यात्सप्तकोष्ठाद्वयन्त्रमेतत् ॥१४३ स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च । रक्षांसि भीतानि दिशोद्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसंघा ॥१४४ धारितं सप्तकोष्ठं तत्त्रायते महतो भयात् । दुःस्वप्नदुर्निमित्तादिशमनङ्कीर्तितं बुधैः ॥१४५ यह चक्र यन्त्र कहा गया है जो सभी प्रकार के भयों का निवारण करने वाला होता है । यह क्षुद्र अपमृत्यु के शमन करने वाला तथा नृपों के विजय के बढ़ाने वाला होता है ॥१४१॥ अब सप्तकोष्ठ यन्त्र को बतलाते हैं-आठ शिरों वाली रेखायें को लिखकर बाहिर चारों के क्रम से उनको आबद्ध करे । स्थान में हृषीकेश मन्त्र को विभक्त करके चारों ओष्ठों मेरे स्थिते पादोंका लेखन करे । उनको अष्टाक्षर के वर्णों से प्रतिदर्भित करे और यथा रीति से दो कोष्ठों में चक्र मन्त्र को लिखे । मध्य में स्थित कोष्ठ में साध्य के सहित लिखे तो यह सप्तकोष्ठ नामक यन्त्र होता है ॥ १४२-१४२॥ हे हृषीकेश ! यह ठीक ही है आपकी कीर्त्ति से यह जगत् प्रहृष्ठ और अनुरंजित होता है । इससे सब राक्षस भीत होते हैं, दिशायें द्रवित होती है और सब सिद्धों के सङ्घ नमस्कार किया करते हैं । इस सप्त कोष्ठ को धारण करे तो यह महान् भय से रक्षा करता है । मनीषियों के मतानुसार यह दुःस्वप्न और दुर्निमित्त आदि का यजन करने वाला कीर्त्तित किया है ॥१४५॥
पंचदश पटल
॥ पुरुषोत्तम प्रकरण ॥
अथ वक्ष्ये जगन्मूलं मन्त्रं श्रीपुरुषोत्तमम् । रोपितं वैष्णवे तन्त्रे भुक्तिमुक्तिफलप्रदम् ॥१
३४२ ] [ श्रीशारदा तिलक तारमाररमाबीजं नत्यन्ते पुरुषोत्तमम् । पुनरप्रतिरूपान्ते ततो लक्ष्मीनिवासच ।२ सकलान्ते जगत्पूर्वं क्षोभणेति पद पुनः । सर्वस्त्रीहृदयोपेत विदारणपदं पुनः । ३ ततः परं त्रिभुवनमदोन्मादकरं ततः सुरासुरान्ते मनुजसुन्दरीजनशब्द (वर्ण) तः ।४ मनांसि तापयद्वन्द्वं दीपयद्वितयं पुनः । शोषयद्वियं भूयो मारयद्वितयं पुनः । ५ स्तम्भयद्वितयं पश्चान्मोहयद्वितये पुनः । द्रावयद्वितयं पश्चादाकर्षययुगं ततः ।६ समस्तपरमोपेतं सुभगेन च संयुतम् । सर्वसौभाग्यशब्दान्ते करेति पदसंयुतम् ।७ सर्वकामप्रदममुकं हनयुग्मकम् । चक्रेण गदया पश्चात् खड्गेन तदनन्तरम् ।८ इसके अनन्तर जगत् के मूल स्वरूप श्री पुरुषोत्तम मन्त्र को बतलाऊँगा जो वैष्णव तन्त्र में गोपित है और सांसारिक सुखों के उपभोग और सांसारिक बन्धन से मोक्ष दोनों ही के फल का प्रदान करने वाला है ।१। तार (प्रणव), मार, काम बीज, रमा बीज, फिर ‘नमः’—यह पद, इसके अन्त में ‘पुरुषोत्तम’—यह पद, फिर ‘अप्रतिरूप’ और इसके अन्त में लक्ष्मी निवास’ यह पद, सबके अन्त में ‘जगत्पूर्व—वह पद, फिर ‘क्षोभण’ पद, फिर ‘सर्व स्त्री हृदयोपेत विदारण’—यह पद, इसके आगे ‘त्रिभुवन मदोन्मादकर’ यह पद, फिर ‘सुरासुर’ इसके अन्त में ‘मनुजसुन्दरीजन’—यह पद, फिर इसके अन्त में ‘मनासि’ यह पद होना चाहिए । फिर ‘मारय’—यह दोवार फिर ‘दीपय’—यह पद दो बार, इसके पश्चात् ‘शोषय’ और ‘मारय ये दोनों पद दो-दो बार कहे । फिर ‘स्तम्भय’ और ‘मोहय’ ये दोनों पद दो- दो बार कहे । फिर ‘द्रावय’ और आकर्षय’—ये दो पद दो-दो बार
पंचदश पटल ] [ ३४३ है। फिर 'समस्त परम' से उपेत और सुभगन'—इससे संयुत कहे । सर्व सौभाग्य' के अन्त में कर' इस पद से संयुत करे। फिर 'सर्व काम प्रद' यह कहकर 'अमुकं, हन-हन' कहे। फिर 'चक्रेण, गदया, खङ्गेन' में पद कहे ।२-८। कट्टद्वयान्तेऽङ्कुशेन ताडयद्वितय पुनः । सर्ववाणिभिन्दयुग पाशेनेति पदं ततः ।६ त्वरशब्दद्वयमथोकिन्तिष्ठसि पदं पुनः । तावद्यावत्सदस्यान्ते समाहितमनन्तरम् ।१० ततो मे सिद्धिमाभाष्य भवत्वन्ते सवर्म फट् । नमोऽन्तोऽय मन् प्रोक्तो द्विशताक्षरसंयुतः ।११ जैमिनिर्मुनिराख्यातश्छन्दश्चामितमीरितम् । समस्तजगतामादिर्देवता पुरुषोत्तमः ।१२ फिर दो वार 'कट्ट' पद कहे और 'अंकुशेन' यहकहकर 'ताड़य' इस पद को दो वार बोले । फिर 'सर्व वाणिः' कहकर 'भिन्द' इस पद को दो बार बोले । इसके पश्चात् 'पाशेन" - यह कहकर 'त्वर'—इस पद को दो बार कहे । फिर 'कि तिष्ठसि' इस पद को कहे। 'तावद यावत्' इस पद के अनन्तर 'समाहित' यह कहे । फिर ततो में सिद्धि भवतु' यह कहकर अन्त में वर्म सहित 'फट् यह कहे। अन्त में इस मन्त्र के 'नमः' यह पद होता है। इस प्रकार से यह मन्त्र दो सौ अक्षरों वाला होता है ।६-११। इस मन्त्र का ऋषि जैमिनि कहा गया है। इस का छन्द अमित कहा गया है। इसका देवता सम्पूर्ण विश्व का आदि भगवान पुरुषोत्तम है । अब षडङ्ग मन्त्रों का उद्धार बताया जाता है ।१२। पुरुषोत्तमशब्दान्ते वदेत्त्रिभुवनं ततः (पुनः) । मदोन्मादकरान्ते हुँ हृदयं सफलं ततः ।१३ जगत् क्षोभणशब्दान्ते लक्ष्मोदयितहुँ शिरः ।१४
३४४ ] [ श्री शारदा तिलक मन्थोत्तंमसंयुक्तमङ्गजैं कामदायिनि । हुँ शिखापरमोपेतसुभगाक्षरसंयुतम् । १५ सर्वसौभाग्यकरहुँ कवच परिकीर्त्तितम् । उक्त्वा सुरासुरोपेतमनुजान्वितसुन्दरीम् । १६ ततः परस्ताद्धृदयविदारणपद वदेत् । सर्वप्रहरणधरसर्वकामिकतत्परम् । १७ हनद्वयं च हृदयं बन्धनानि ततः परम् । आकर्षयपदद्वन्द्वं महाबलहुमस्त्रकम् । १८ त्रिभुवनेश्वरपदन्ततः सर्वजनन्ततः । मनासि हनयुग्मान्ते दारय द्वितयं च मे । १६ वशमानय हुँ नेत्रं ताराद्याः फट् नमोन्तकाः । षडङ्गमन्त्राः सन्दिष्टा नेत्रान्तास्तन्त्रवेदिभिः । २० पुरुषोत्तम शब्द के अन्त में त्रिभुवन बोलना चाहिये । मदोन्माद कह कर अन्त में 'हुं', हृदयं सकलं कहे 'जगत्' क्षोभण के अन्त में लक्ष्मी दयित हुँ शिर है । मन्मथोत्तमसे सयुक्त अङ्ग के कामदायिनि हुँ शिखा है परमोपेत सुभगाक्षर से संयुत सर्व सौभाग्य करहु कवच कीर्त्तित किया गया है । सुरासुर से युक्त मनुज सुन्दरीम् यह कह कर इसके आगे हृदय विदारण पद बोलना चाहिये । उसके आगे सर्व प्रहरण धर कामिक कहे । दो हन पद हृदय है और इसके आगे बन्धनानि पद कहे । दो बार 'आकर्षय कहे । महाबल हुँ—यह प्रमव होता है । इससे आगे 'त्रिभुवनेश्वर' और फिर 'सर्वजन' कहे । फिर मनांसि कहकर दो बार हन पद और दो बार दारय पद कहे । 'वशमानयहु' नेत्र है । इनके आदि में प्रणव और अन्त में फ्ट्तथा, नमः- यह पद है । ये षडङ्ग मन्त्र सन्दिष्ट किये हैं जो तन्त्र के ज्ञाताओं के द्वारा नेत्रान्त कहे गये हैं ।१२-२०। त्रैलोक्यमोहनाणान्ते हृषीकेशपदं पुनः । पश्चादप्रतिरूपादि मन्मथानन्तरं वदेत् । २१
पंचदश पटल ] [ ३४५ सर्वादि स्त्रीपदं पश्चाद्दहृदयाकर्षणं ततः । आगच्छागच्छ मन्त्रोऽयं ताराद्यो नमसान्वितः । २२ अनेन मनुना कृत्वा व्यापकं न्यस्य बाहुषु । अष्टायुधानि मुद्राभिर्मन्त्रैः सार्द्धं विचिन्तयेत् ।२३ क्षीराम्भोनिधिमध्यस्थं निरन्तरसुरद्रुमम् । उद्यदकेंन्दुकिरणदूरीकृततमोभरम् ।२४ कालमेघसमालोकनृत्यद्बर्हिकदम्बकम् । उत्फुल्लकुसुमामोदप्रहृष्यद्भृङ्गसङ्कुलम् ।२५ कूजत्कोकिलसंघेनः वाचालितदिगन्तरम् । नानाकुसुम सौगन्धवाहिगन्धवहान्वितम् ।२६ कल्पवल्ली निकुञ्जेषु क्रीडत्सिद्धकदम्बकम् । देवगन्धर्वकन्या (नारो) भिर्यान्तोग्भिरलङ् कृतम् । २७ अनेनदीर्घिकायुक्तमुद्यानं महदधुभतम् । तस्य मध्ये मणिमये मण्डपे तोरणान्विते ।२८ त्रैलोक्य मोहन वर्णों के अन्त में हृषीकेश पद को कहे । पीछे अप्रति रूपादि और इसके अनन्तर मन्मथ बीजे ।२१। पीछे सर्वादि पद वाला स्त्री पद कहे । फिर हृदयाकर्षण कहे । पीछे आगच्छ-आगच्छ कहे। इसके आदि में प्रणव और अन्त में 'नमः यह पद है यह मंत्र है ।२२। इस मंत्र के द्वारा बाहुओं में व्यापक न्यास करे । मुद्राओं के सहित आठ आयुधों का मन्त्रों के साथ चिन्तन करना चाहिए ।२३। क्षीर सागर के मध्य में स्थित निरन्तर सुर द्रुम है-उदीय मान सूर्य और चन्द्र की किरणों से तम के भार को जहाँ पर दूर भगा दिया है-काल मेघों के समलोक में जहाँ पर नृत्य करते हुए मयूरों का समुदाय है--खिले हुए पुष्पों के गन्ध से प्रसन्न होते हैं भ्रमरों से समावृद्ध है--कूजन करती हुई कोकिलों के समूह के द्वारा दिशाओं का अन्तर शब्दायमान हो रहा है—अनेक प्रकार के कुसुमों को सुगन्ध की वहन करने वाली वायु से समन्वित कल्प वल्ली के निकुंजों में क्रीड़ा करते हुए सिद्धों के समुदाय
३४६ ] [ श्रीशारदा तिलक से समन्वित-देवों और गन्धर्वों की गायन करती हुई कन्याओं के द्वारा समलंकृत बहुत-सी बावडियों से संयुक्त एक महान् अद्भुत उद्यान है। उस उद्यान के मध्य में तोरणों से सज्जित एक मणिमय मण्डप है ।२४-२८। ऋतुभिः षड्भिरनिशं सेवितस्य महीयसः । सुरद्रुमस्य मूलस्थे महासिंहासने शुभे ।२६ रक्तारविन्दमध्यस्थगरुडोपरि संस्थितम् । ध्यायेद्वल्लभया सार्द्धं जगन्नाथं जगन्मयम् ।३० देवं श्रीपुरुषोत्तमं कमलया स्वाङ्कस्थया पङ्कजं । बिभ्रत्या परिरब्धमम्बुजरुचा तस्यां निबद्धेक्षणम् । ध्यायेच्चेतसि शंखपाशमुशलाङ्गागारि षड्गङ्गदां हस्तैरङ्कुशमुद्वहन्तमरुण स्मेरारविन्दाननम् ।३१ एवं ध्यात्वा श्रियः कान्तं मनुं लक्षचतुष्टयम् । जपेद्धशी विधायाथ कुण्डमर्द्धेन्दुसन्निभम् ।३२ जुहुयाद्वैष्णवे वह्नौ पद्मैर्जातिसमुद्भवैः । पुष्पैर्यवैः क्रमात्पश्चाद्ब्राह्मणानपि भोजयेत् ।३३ उस मण्डप में निरन्तर छ ऋतुओं के द्वारा सेवित एक महान् कल्प वृक्ष है । उस कल्प वृक्ष के मूल मे स्थित एक परम शुभ महान् सिंहासन है। उस सिंहासन पर रक्त कमल में मध्य में विराजमान गरुड़ के ऊपर संस्थित अपनी वल्लभा के साथ में जगन्मय जगन्नाथ प्रभु का ध्यान करना चाहिए ।२६-३०। अब ध्यान करने का प्रकार बतलाया जाता है—अपनी गोद में विराजमान पंकज को धारण करती हुई कमला के द्वारा समालिङ्गित कमल की कान्ति से उसमें ही अपनी दृष्टि को बाँधे हुए—कर कमलों के द्वारा शंख, पाश, मुशल, चाप शंख, गदा और अंकुश का वहन करने वाले—अरुण और मन्दस्मित युक्त मुख कमल वाले देव श्री पुरुषोत्तम का चित्त में ध्यान करना चहिए ।२६-३१। इस रीति से श्री देवी के कान्त का ध्यान करके मन्त्र
पंचदश पटल ] [ ३४७ का चार लाख जप करें । वशी आधे चन्द्रमा के समान कुण्ड की रचना करके वैष्णव वह्नि में पद्मों के द्वारा जाती के पुष्पों से और यवों से क्रम से होम करे और ब्राह्मणों को भी भोजन करावे ।३२-३३। अर्चयिष् न् जगन्नाथं गायत्र्या परिशोधयेत् । आत्मानं यागवस्तूनि यागभूमिं च देशिकः ।।३४ त्रैलोक्यमोहनायै विद्महे पदमीरयेत् । स्मराय धीमहि पश्चात्तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ।।३५ गायत्र्यैषा समाख्याता वैष्णवा सर्वसिद्धिदा । प्राक्प्रोक्ते वैष्णवे पीठे कल्पयेदामन ततः ।।३६ पक्षिराजाय ठद्वन्द्वमस्य मन्त्रः प्रकीर्त्तितः । सङ्कल्पितायां मूलेन मूर्त्तौ देवमनन्यधीः ।।३७ आवाह्य मनुना विद्वान्ब्यापकेन समर्चयेत् । भृगुर्लान्तियुतः सेन्दु बीज देव्याः प्रकीर्तितम् ।।३८ जगन्नाथ प्रभु का अर्चन करते हुए देशिक को चाहिये कि गायत्री के द्वारा अपनी आत्मा का, याग की वस्तुओं का और याग की भूमि का शोधन करे ।३४। 'त्रैलोक्य मोहनाय विद्महे' - यह पद कहे । फिर 'स्मराय धीमहि' -यह कहे-इसके पश्चात् 'प्रचोदयात्' यह बोले । वह सर्व सिद्धियों के देने वाली वैष्णवी गायत्री कही है । पूर्व में कथिते वैष्णव पीठ पर आसन की कल्पना करनी चाहिए । ३५-३६। इसके बाद 'पक्षिराशाया' कहकर दो ठकार कहे-यह इसका मन्त्र कहा गया है । मूल मन्त्र के द्वारा कल्पित की हुई मूर्त्ति में आनन्य बुद्धि वाला होकर देव का आवाहन करे । विद्वान पुरुष व्यापक मन्त्र के द्वारा समर्चन करे । लान्त से युक्त बिन्दु के सहित भृगु देवी का बीज कीर्तित किया गया है ।३७-३८। कर्णिकायां यजेदादौ विधानेनाङ्गदेवताः । दलेषु पूजयेत्पश्चाल्लक्ष्म्याद्या घृतचामराः ।३६
३४८ ] [ श्रीशारदा तिलक मुक्ताहारलसच्चारुपयोधरभारान्विताः । जपाकुसुमसदृक्षाशा मदविभ्रममन्थराः ।४० ह्रस्वत्रयल्कीविसर्गरहितस्वरशोभितम् । देवीबीजं क्रमदासां मन्त्रमाहुर्मनीषिणः ।४१ दलाग्रेषु यजेच्छंखं शार्ङ्गं चक्रमसिं गदाम् । अङ्कुशं मुसलं पाशमेतान्यस्त्राणि शार्ङ्गिणः ।४२ स्वमुद्राभिः स्वमनुभिः कथ्यन्ते मनवः क्रमात् । आद्योजलचरायान्ते ठद्वयं मनुरीरितः ।४३ शार्ङ्गाय सशरायान्ते स्वाहान्तोऽनन्तरो मनुः । सुदर्शनमहाचक्रराजान्ते स्याद्दहदद्वयम् ।४४ सर्वदुष्टभयं पश्चात्कुरु छिन्दद्वयं (युगं) पृथक् । विदारय पदद्वन्द्वं परमन्त्रान्ग्रसग्रस ।४५ भक्षाय त्रासयद्वन्द्वं प्रत्येकं वर्मठद्वयम् । चक्राय नम इत्येष तृतीयो मन्त्र ईरितः ।४६ आदि में कर्णिका में विधान से अङ्ग देवों का यजन करना चाहिए पीछे दलों में चमर धारण की हुई लक्ष्मी आदि का पूजन करे । ये सब मोतियों के हार से शोभित सुन्दर पयोधरों के भार समन्वित है । ये सब जपा के पुरुष के सदृक्ष हैं और मद के विभ्रमों से मन्थरगति वाली हैं ।३६-४०। ह्रस्वत्रय अर्थात् अ इ उ इनसे रहित और क्लीब और विसर्गों से रहित स्वर अर्थात् आ—ई ऊ—ए—ऐ—ओ—औ और अं से युक्त देवी का बीज इनको मनीषी गण मन्त्र कहते हैं ।४१। अपनी मुद्राओं से अपने मन्त्रों से क्रम से मन्त्र कहे जाते हैं । ‘आद्यजल चराय’ पद है और अन्त में दो डकार (उः डा) हैं यह मन्त्र कहा गया है ।४३। शार्ङ्गाय सशराय--इसके अन्त में स्वाहा है--यह अनन्तर मन्त्र है । सुदर्शन महचक्र राज के अन्त में तो डकार हैं । पीछे सर्व दुषभयं कुरु और दो बार छिन्द पृथक् पृथक् कहे । फिर ‘विदारय’ इस पद को दा वार कहे । पश्चात् ‘परमन्त्रान् ग्रस-ग्रस कहे’ । भक्षय--भक्षय, त्रासय--
चतुर्थोऽयं मनुः प्रोक्तः, कौमोदकि महाबले ।४७
पंचदश पटल ] [ ३४६ त्रासय' कहे । प्रत्येक में दो ठकार वर्म हैं। चक्राय नमः यह कहे-यह तीसरा मन्त्र कहा है ।४४-४६। खड्गतीक्ष्णपदान्ते स्याच्छिन्दयुग्मं हुमादि च । चतुर्थोऽयं मनुः प्रोक्तः, कौमोदकि महाबले ।४७ सर्वासुरान्तकि पदं प्रसीदयुगवर्मफट् । स्वाहान्तोऽयं मनुः प्रोक्तःसद्भिः कौमोदकी प्रिय ।४८ अङ्कुशान्ते कट्टयुगं षष्ठोऽयं मनुरीरितः । संवर्त्तका मुशलं पोथयद्वितयं पुनः ।४६ हुँ फट् द्विष्टान्तोमन्त्रोऽन सप्तमः परिकीर्तितः । पाशबन्धद्वयं पश्चादाकर्षय पदद्वयम् ।५० वह्निजायावधिः सद्भिरष्टमो मन्त्रईरितः । खड्ग तीक्ष्ण पद के अन्त में छिन्द छिन्द में ये कहे और हुम आदि यह चौथा मन्त्र कहा गया है । 'कौमोदिक-महाबले-सर्वा सुरान्तकि' ये पद कहे दो वार प्रसीद पद कहे तथा वर्म और फट् कहे यह स्वाहा अन्त वाला सत्पुरुषों ने मन्त्र कहा है । कौमोदकी प्रिय-यह पद कहकर अन्त में अंकुश पद कहे । फिर दो बार 'कट्ट' यह पद कहे । यह छठवां मन्त्र कहा गया है । सम्वर्त्तक-इन पद के अन्त में मुशलं-यह पद होता है और फिर दो बार 'पोथय' यह शब्द बोले । इसके अन्त में हुँफट् और दो ठकार कहे-यह सातवाँ मन्त्र कहा गया है । फिर दो वार पाश बन्ध-यह तथा दो बार 'आकर्षय,-यह पद बोले । अन्त में 'स्वाहा' यह कहे तो सत्पुरुषोंके द्वारा यह आठवां मन्त्र कहा गया है । इसके पीछे वज्रादि आयुधों के सहित लोकेशों का अर्चन करना चाहिए ।४७-५१। लोकेशान् पूजयेत्पश्चाद्वज्राद्यै रायधैः सह ।५१ इत्थमभ्यर्चयेन्नित्यं यथावत्पुरुषोत्तमम् । प्राप्नोति महतीं लक्ष्मीं सौभाग्यमतुलं यशः ।५२ आयुरारोग्यमैश्वर्य्यंमनोभीष्टानि विन्दति । ह्यारिकुसुमैर्देवमर्चयित्वा यथाविधि ।५३
३५० ] [ श्रीशारदा तिलक शशिप्रसूनजुहुयाद्वसुसंख्यसहस्रकम् । मासमात्रेण वशगास्तस्युः सकला नृपाः ॥५४ हुत्वा बिल्वफलैः पक्वैः श्रियं विन्देदनिन्दिताम् । प्रफुल्लैररुणाम्भोजैस्तामेव लभते पुनः ॥५५ हुत्वा ज्योतिष्मतीतैलं सहस्रं वसुसंख्यक्रम् । सुभखगा जायते सम्यक् सर्वेषां नात्र संशयः ॥५६ इस रीति से नित्य ही अर्चन करता हुआ यथा रीति से पुरुषोत्तम प्रभु की पूजा करनी चाहिए । इस के प्रभाव से मनुष्य बहुत बड़ी लक्ष्मी को तथा अतुल वैभव को प्राप्त किया करता है ॥५२॥ आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य और यम के अभीष्टों की प्राप्ति किया करता है। ऽयारि के पुष्पों से नित्य ही यथाविधि अर्चन करके शशि के पुष्पों के द्वारा एक सहस्र आठ बार होम करना चाहिये । इसके प्रभाव से एक ही मास में सम्पूर्ण नृप वश में हो जाने वाले हो जाया करते हैं ॥५३-५४॥ पके हुए बेल के फलों द्वारा होम करके अनिन्दित श्री को मानव प्राप्त कर लेता है । खिले हुए अरुण कमलों से होम करके वही फल प्राप्त कर लेता है ॥५५॥ ज्योतिष्मती के तैल से एक हज़ार आठ आहुतियाँ देकर भली भाँति सुभगा लक्ष्मी सबको प्राप्त हो जाया करती है-इसमें कुछ भी संशय नहीं है ॥५६॥ विधानेनामुवा मन्त्री महारोगात्प्रमुच्यते । अश्वत्थसमिधां होमः पराहृतधनप्रदः (नावहः) ॥५७ आज्याक्तदूर्वाहोमेन मुच्यते महतोभयात् ॥५८ यस्य नामयुतं मन्त्रं जपेदयुतसंख्यया । स भवेद्दासवत्तस्य नात्र कार्या विचारणा ॥५६ वह्नि किसिहोक्तेन मनुना साधकोत्तमः । साधयेत्सकलान्कामान् साक्षाद्विष्णुरिवापरः ॥६० उत्तिष्ठ पदमाभाष्य श्री क्रोकपोधिशहुतशानौ । वह्निजायावर्म्मिन्त्रो वस्वक्षरसमन्वितः ॥६१
पंचदश पटल ] [ ३५१ मन्त्रधारी इस विधान से महारोग से मुक्त हो जाया करता है। पीपल की समिधाओं के द्वारा किया हुआ होम दूसरों के द्वारा हरण किये हुए धन के प्रदान करने वाला होता है ।५७। घृत में अक्त की हुई दूर्वा के होम के द्वारा महान् भय से छुटकारा पा जाया करता है ।५८। जिसके नाम से युक्त मन्त्र का दश सहस्र की संख्या में जप करे तो वह मानव उसके दान की ही भाँति हो जाता है-इसमें विचारणा कभी नहीं करनी चाहिए ।५६। यहाँ पर इस विषय में बहुत अधिक कथन से क्या प्रयोजन है। इस मन्त्र के द्वारा साधक अपने सभी कामों का साधन करता है और साक्षात् दूसरे विष्णु के ही समान हो जाता है ।६०। अब श्री कर मन्त्र का उद्धार बतलाया जाता है--उत्तिष्ठ श्री कहकर ककार और रेफ कह कर स्वाहा-यह पद कहे। यह मन्त्र आठ अक्षरों वाला होता है ।६१। ऋषिरस्य भवेद्वामः पंक्तिश्छन्द उदाहृतम् । श्रीकराख्यो हरिः प्रोक्तो देवतास्य मनीषिभिः ।६२ हृदयं भीषय द्वन्द्वं त्रासयद्वितयं शिरः । शिखाप्रमर्दययुगं वर्मपध्वंसयद्वयम् ।६३ अस्त्रं रक्षयुगं सर्वे हुतन्ताः समुदीरिताः । मूर्द्धनि नेत्रद्वये कण्ठे हृदयोदरयोः पुनः ।६४ उरुजङ्घापदद्वन्द्वे मन्त्रवर्णान्प्रविन्ससेत् । मुखे न्यसेद्ब्राह्मणोस्य मुखमासीदिमं मनुम् ।६५ बाहूराजन्यः कृतोऽयं न्यैस्तत्र्यो बाहुयुग्मके । ऊरू तदस्य यद्वैश्य इममूरुद्वये न्यसेत् ।६६ पादद्वये न्यसेन्मत्रं पद्भ्यां शूद्रो अजायत । चक्रं शंखं गदां पद्मं हस्ताग्रेष्वथ विन्ययेत् ।६७ इस मन्त्र का ऋषि वाम देव है और पंक्ति इस का छन्द कहा गया मनीषियों ने इस मन्त्र का देवता श्रीकर नाम वाले हरि भगवान् को बताया है ।६२। भीषय का द्वन्द्व इसका हृदय है और त्रासय का जोड़ा
३५२ ] [ श्रीशारदा तिलक इस का शिर होता है । मर्दय का जोड़ा उग्रकी शिखा है । प्रध्वसद्- इसका युगल इसका वर्म होता है ।६३। रक्ष का युगल अस्त्रा है । ये सब हुम अन्त वाले कहे गये हैं । अर्थात् इन सबको अन्त में हुम यह होता है । मूर्धा, दोनों नेत्र, कण्ठ, हृदय, उदर, ऊरु, जंघा पद द्वन्द्व में मन्त्र के वर्णों का विन्यास करना चाहिए । ब्रह्मण इसका मुख है---इस मन्त्र का मुख में न्यास करे ।६५। बाहूराजन्यः कृत--- इसका दोनों बाहुओं में न्यास करे । 'ऊरू तदस्य यद् वैश्यः'--इसका ऊरू हृदय में न्यास करना चाहिए । 'पद्भ्याशूद्रो अजायत्--इसका दोनों पादों में विन्यास करे । हस्तौ के अग्र भागों में शंख, चक्र, गदा और पद्म का न्यास करना चाहिए ।६६।६७। इत्थं न्यासं तनौ कृत्वा देवं पूर्वोक्तमण्डपे । रक्तपद्मासनस्थस्य गरुडस्योपरि स्थितम् ।६८ काञ्चनाद्रिसमप्रभ कमलाननं कमलेक्षणम् । चक्रशंखगदासरोजधरं मनोहरदर्शनम् ।६६ कौस्तुभाङ्कितवक्षसं मुकुटाङ्गदादिविभूषणम् । तार्क्ष्यवाहनमच्युतं हृदि भावयामि जगत्पतिम् ॥७० अष्टलक्षं जपेन्मन्त्री मन्त्रमेतं दशांशतः । बिल्वक्षीरद्रुमोत्थाभिः समिद्द्भिररुणाम्बुजैः ।७१ पयोन्नैः सर्पिषा हुत्वा गुरुं सन्तोषयेद्धनैः । मृत्तौ मूलेन क्लृप्तायां पूजयेद्देवमन्वहम् ।७२ अङ्गान्यादौ समाराध्य दिक्पत्रेषु समर्चयेत । श्रियं धृतिं रतिं कान्तिं लोलापङ्कजधारिणीः ।७३ पीतारुणाः श्यामनीला विदिक्पत्रेषु पूजयेत् । वासुदेवादिका मूर्तीः पार्श्वयोर्निधियुग्मकम् ।७४ इस प्रकार से शरीर में न्यास करके पूर्व में कहे हुए मण्डप में देव का जो रक्त पद्म के आसन पर स्थित है---गरुड़के ऊपर विराजमान हैं सुवर्ण के पर्वत के समान प्रभा से संयुत---कमल जैसा जिनका मुख
पंचदश पटल } { ३५३ हैं तथा कमल के सदृश नेत्र हैं। जो शंख, चक्र, गदा और पद्म को धारण करने वाले हैं- जिनका दर्शन परम मनोहर है-जिनका वक्षःस्थल कौस्तुभ मणि से अंकित है-जो मुकुट, अङ्गद आदि भूषणों से विभूषि है जिनका गरुड़ वाहन है-जो अच्युत और जगतों के स्वामी हैं, मैं उनकी अपने हृदय में भावना करता हूँ ।६८-७०। मन्त्रधारी इस मन्त्र का आठ लाख जप करे और जप का दशांश भाग विल्व-क्षीर द्रुम की समिधाओं से-अरुण कमलों से-पयोऽन्नों से और घृत से हवन कर के अपने गुरुदेव को धनों से सन्तुष्ट करना चाहिए । मूल से कल्पित मूर्ति में देव का प्रतिदिन पूजन करना चाहिए ।७१-७२। आदिमें अङ्गों का समाराधन करके दिक्पत्रों में अर्चन करे। श्री, धृति, कान्ति का जो लीला पंकजों के धारण करने वाली है तथा पीत, अरुण, श्याम और नील है इनका विदिशाओं के पत्रों में अर्चन करना चाहिए । वासु- देव आदि मूर्तियों का पूजन करे। दोनों पाश्र्वों में दोनों विधियों का यजन करे ।७३-७४। विष्ण्ववसेनं यजेदीशे लोकपालानन्तरम् । एव सम्पूजयेद्देव ह्याधयेदिमात्मानः ।७५ दूर्वाचरुभ्या साज्यभ्यां जुहुयादयुतं बुधः । सपातितं चरु पश्चात्पाध्यो भुञ्जीत साधितम् ।७६ ब्राह्मणान् भोजयेत्सम्यङ् मधुरैर्वोमवासरे । तोषयेद्गुरुमर्थेन वस्त्रैर्धान्यैर्विभूषणैः ।७७ जित्वापमृत्युरोगादीन् दीर्घमायुः स विन्दति । आज्यसिक्तैः सरसिजैर्जुहुयादयुतत्रयम् ।७८ निवसेत्कमला तस्मिन्न त्यजेत्तत्सुवानपि । विल्ववृक्षसमिद्धोमात्साक्षाद्धनपतिर्भवेत् ।७६ पूगपुष्पसमायुक्तै स्तण्डुलैर्मधुरोक्षितैः । जुहुयादचिरादेव सम्पदं जायते निधिः ।८०
३५४ ] [ श्रीशारदा तिलक ईशदिशा में विष्वक्सेन का अर्चन करे और इसके अनन्तर लोक- पालों का अर्चन करे और इस रीति से देव का यजन करे तथा आत्मा के अभीष्ट का साधन करे ।७५। बुध को चाहिए कि घृत के सहित दूर्वा चरु से दश हजार आहुतियाँ देवे । पश्चात् सम्पतित चरु को जो साधित है साध्य खा लेवे ।७६। होम के दिन में मधुर पदार्थोंसे ब्राह्मणों को भली भाँति भोजन करावे । वस्त्रों से, धान्यों से, भूषणों से और अर्थ के द्वारा अपने गुरुदेव को सन्तुष्ट करे ।७७। वह मानव फिर अप- मृत्यु को जीत कर और रोगों पर विजय पाकर दीर्घ आयु का लाभ किया करता है आज्य से सिक्त कमलों के द्वारा तीन अयुत अर्थात् तीस हजार आहुतियां देनी चाहिए ।७८। उस पुरुष के गृह में कमला निवास किया करती है और उसके पुत्रों का भी कभी त्याग नहीं करती है । विल्व वृक्ष की समिधाओं के होम से मानव साक्षात् धनपति ही हो जाया करता है ।७९। पूग के पुष्पों समायुक्त तण्डुलों से जो मधुर में उक्षित होवें हवन करे तो शीघ्र ही वह सम्पदाओं का निधि हो जाया करता है ।८०। आज्येन जुहुयाल्लक्षं परान् जयति पार्थिवः । अब्जसूत्रं भुजेबद्धं मनुनानेन साधितम् ।८१ रोगापमृत्युदुःखानि नाशयेन्नात्र संशयः । जलाञ्जलिभिरात्मानमभिषिञ्चेद्दिनेदिने ।८२ स्नानकालेषु स भवेत् सौभाग्यश्रीसमृद्धिमान् । ऊर्ध्वबाहुर्द्वयो मन्त्री पश्यन्नादित्यमण्डले ।८३ सहस्रमानं प्रजपेन्नित्य निशिमधोर्मनुम् । सर्वे मनोरथास्तस्य सिद्ध्येयुर्नात्र संशयः ।८४ कृष्णाय पदमाभाष्य गोविन्दाय ततः परम् । गोपीजनपदस्यान्ते वल्लभाय द्वितावधिः ।८५ कामबीजादिराख्यातो मनुरष्टादशाक्षरः । नारदोऽस्य मुनिः प्रोक्तो गायत्रं छन्द उच्यते ।८६
पंचदश पटल ] [ ३५५ देवता कथितः कृष्णः सर्वकामफलप्रदः । चतुः करणवेदानेत्रसंख्याक्षरैः क्रमात् ॥ ८३ पञ्चाङ्गानि मनोः कुर्यान्मन्त्रविज्जातिसंयुतैः । स्मरेद्वृन्दावने रम्ये मोहयन्तं मनोरमम् ॥८८ गोविन्दं पुण्डरीकाक्षं गोपकन्याः सहस्रशः । आत्ममो वदनाम्नाम्भोजप्रेषिताक्षिमभ्रया ।८६ घृतसे एक लाख आहुतियां देवे तो राजा शत्रुओं पर विजय प्राप्त र् या करता है इस मन्त्र के द्वारा साधित अब्ज सूत्र को अपनी भुजा में बाँधे तो वह अपने रोग-अपमृत्यु और दुःखों का विनाश कर देता है इसमें कुछ भी संशय नहीं है । जल की अञ्जलियों के द्वारा दिनों दिन अपने अपका अभिषिञ्चन् करे और स्नान के समय में करे तो वह श्री और समृद्धिवाला होता है । दोनों बाहुओं का ऊपर की ओर करके मन्त्रधारी पुरुष आदित्य मण्डल में देखता हुआ मन्त्र को नित्य एक सहस्र जप करे तो पनी बुद्धि वाला होता है । उस मनुष्य के सब मनोरथ सिद्ध होते हैं--इसमें तनिक भी संशय नहीं है ।८१-८४। अब गोपाल मन्त्र का उद्धार करके बताया जाता - 'कृष्णाय' यह पद कह कर उसके पश्चात् 'गोविन्दाय' कहे । फिर 'गोपीजन' इस पद के अन्त में 'वल्लभाय' - यह कहे और अन्त में द्विष्ट् अर्थात् 'स्वाहा' बोले ।८५ काम वीज अर्थात 'क्लीं' यह आदि में कहा गया है। यह मन्त्रराज आठ अक्षरों वाला होता है । इसका ऋषि नारद और गायत्र छन्द बताया गया है ।८६। इसके देवता भगवान् श्री कृष्ण कहे गये हैं जो सब कामों के फल के प्रदान करने वाले हैं। चार करण-वेद (चार)-अब्धि तथा नेत्र (दो) की संख्या वा अक्षरों से क्रम से मन्त्र का वेत्ता जाति संयुतों से मन्त्र के पाँच अङ्गों को करे । रम्य वृन्दावन में मोहन करते हुए- मनोरम पुण्डरीकाक्ष गोविन्द का स्मरण करना चाहिए । सहस्रों गोप कन्याएं उनके मुख कमल में लगायी हुई आँखों के भ्रमरों वाली हैं ।८७-८६।
३५६ ] [ श्रीशारदा तिलक पीडिताः कामबाणेन चिरमाश्लेषणोत्सुकाः । मुक्ताहारलसत्पीनतुङ्गस्तनभारान्विताः ।६० स्रस्तधम्मिल्लवसना मदस्खलितभूषणाः । दन्तपङ्क्तिप्रभाद्भासिस्पन्दमानाधराञ्चिताः ।६१ विलोभयन्तीविवधैर्विभ्रमैर्भावगर्भितैः ।६२ फुल्लेन्दीवरकान्तिमिन्दुवमनं वर्हत्रियसप्रियम् । श्रीवत्माङ्कमुदारकोस्तुभधरं पीताम्बरं सुन्दरम् । गोपीनां नयनोत्पलार्चिततनुं गोपालसंचावृतम् । गोविन्दं कलवेणुवादनपरं दिव्याङ्गभूषं भजे ।६३ मन्त्रमेनं यथान्यायमयुतद्वितयं जपेत् । जुहुयादरुणाम्भोजैस्तद्दश श समाहितः ।६४ वैष्णवे पूजयेत्पीठे यथावद्देवकीसुतम् । अङ्गावरणमाराध्य पत्रेषु पूजयेत्प्रियाः ।६५ ये सभी गोप कन्ताएं कामबाण से पीड़ित है । और चिरकाल तक आश्लेषण करने के लिए समुत्सुक हो रही हैं। मोतियों के हार से शोभित स्थूल और ऊँचे स्तनों के भार से युक्त हैं—इसके धम्मिल के वस्त्र स्रस्त हो गये हैं-इनके मद से इनके भूषण स्खलित हो गये हैं ये दाँतों की पंक्ति की प्रभा से उद्भासित और स्पन्दमान अधरों से अञ्चित हैं-भावों को गर्भ में रखने वाले अनेक विभ्रमों से विलोभित करती हुई हैं। अब ध्यान बतलाया जाता है-विकसित इन्दीवर की कान्ति से संयुत चन्द्र के समान मुख वाले-मयूर पिच्छ के अवतंस से परम प्रिय, श्री वत्स के चिन्ह वाले-उदार कौस्तुभ को धारण करने वाले पीत वर्ण के वस्त्रधारी, सुन्दर, गोपियों के नेत्र कमलों से अर्चित शरीर वाले, गोपालों के समुदाय से आवृत्त-कल वेणु (वंशी) के वादन करने में तत्पर, दिव्य अङ्गों की भूषा से अन्वित श्री गोविन्द का भजन करता हूँ ।६०-६३। इस मन्त्र का विधि के अनुसार बीस हजार जप करे और जप के दशांश भाग का अरुण कमलों से परम समाहित होकर
पंचदश पटल } [ ३५७ होम करे । वैष्णव पीठ पर रीति के अनुसार देवकी सुत का अभ्यर्चन करना चाहिए। अङ्गावरण की आराधना करके पत्रोंमें प्रियाओं का पूजन करे ।६४-६५। कालिन्दीनग्नजित्याख्या मित्रविन्दा ततः परम् । चारुहासिन्यथपरा रोहिणी जाम्बवत्यथ । ६६ रुक्मिणी सत्यभामेति कथिताश्चारुभूषणाः । पोताम्बरधराः सौम्याः करास्बुजधृताम्बुजाः । ६७ ऐरावतदीनभ्यर्चेद्गजानष्टौ ततो बहिः । लोकपालान्यजेन्मन्त्री वज्राद्यस्त्राणि तद्बहिः । ६८ इति सम्पूजयेद्देवं गोविन्दं जगतां पतिम् । कुर्वीत कल्पनिर्दिष्टान्प्रयोगान्निजवाञ्छितान् । ६६ लक्ष्मीप्रसूनैर्जुहुयाच्छियमिच्छन्ननिन्दिताम् । साज्येनान्नेन जुहुयादाज्यान्नस्य समृद्धये । १०० श्री भगवत्प्रियाओं के भ नामों का परिगणन किया जात है- कालिन्दी, नग्नजिती, मित्र विन्दा, चारुहासिनी, रोहिणी, जाम्बवती, रुक्मिणी, सत्यभामा - ये उनके नाम हैं और ये सब परम चारुतम भूषणों के धारण करने वाली है । पीताम्बर धारिणी-सौम्य, अपने कर कमलों में अम्बुजों को धारण कर रही है । ६६-६७। उनके बाहिर ऐरावत प्रभृति गजों की, जो आठ हैं, अभ्यर्चन करे । मन्त्रधारी पुरुष लोकपालों का यजन करे और उनके बाहिर वज्र आदि उनके आयुधों का पूजन करना चाहिए । ६८। इसी रीति से जगतों के पति गोविन्द देव का भली भाँति यजन करे । फिर कल्प में निर्दिष्ट अपने वाञ्छित प्रयोगों का समाचरण करे । ६६। अनिन्दित श्री की इच्छा रखता हुआ लक्ष्मी के पुष्पों से होम करे । अन्न की समृद्धि के लिये घृत सहित अन्न से होम करना चाहिए ।१००। आरण्यैः कुसुमैर्विप्रान् जातिभिः पृथिवीपतीन् । प्रसूनैरसितैर्वैश्यान् शूद्रान्नीलोत्पलेर्नवैः । १०१
३१८ ] [ श्रीशारदा तिलक वशयेल्लवणैः सर्वान्पङ्कजैर्वनििताजनान् । गोशालासु कृतो होमः पायसेन ससर्पिषा ।१०२ गवां शान्तिं करोत्याशु नोविन्दगोकुलप्रियः । शिमुवेषधरं देवं किङ्किणीदामशोभितम् ।१०३ स्मत्वा प्रतर्पयेन्मन्त्रो दुग्धबुद्ध्या शुभैर्जलैः । धनधान्यांशुकादीनि प्रीतस्तस्मै ददातिसंः । १०४ पिण्डमूलेन वीतं दहनपुरयुगे कोणराजद्रसार्णं । कुर्यात्पद्मं दशार्णस्फुरितदशदलं कामबीजेन वीतम् । पद्मं किञ्जल्कसस्थं स्वरविकृतिदलप्रोल्लसत्षोडशार्णं किजल्कं व्यञ्जनाढ्यं विकृतियगदलेष्वर्पितानुष्टुवर्णम् । १०५ पाशांकुशाभ्यामावीतं क्षोणीपुरयुगास्रिषु । अष्ट्राक्षरेण लसितं यन्त्रं गोविन्ददैवतम् ।१०६ जंगली पुष्पों के द्वारा होम करने से विप्रों को, जाती के पुष्पों मे पार्थिवों को--आति पुष्पों से वैश्यों और नवीन नीलोत्सलो से शूद्रों को वश में कर लेता है तथा लवण के होम से सबको ओर पंकजो के द्वारा होम का समाचरण करने से वनिता जनों को वश में कर लिया करता है । गोशालाओं में घत के साथ पांयस से किये होम से शीघ्र ही गोओं में गोकुलप्रिय गोविन्द शान्ति किया करते हैं । किंकिणी दाम से शोभित--शिशु वेष को धारण करने वाले देव का स्मरण करके दूध कीभावना करके शुभ जलके द्वारा मन्त्रधारी तर्पण करे । वे परम प्रसन्न होकर उसके लिये धन-धान्य वस्त्र आदि दिया करते हैं । १०१-१०४। अब यन्त्र बतलाया जाता है--पिण्ड बीज को मूल से परिवीत करे । छै वर्णोसे रंजित कोण में दहन पुर युग में एक पद्मकी रचना करे । जो पद्म दस वर्णों से स्फुरित दश दलों वाला होता है। यह काम बीज से वीत होवे । किजल्क से व्यञ्जनों आढ्य होवे । बत्तीस दलों में अर्पित अनुष्टुप् वर्ण वाला करे । पाश और अंकुश से आवीत करे । तीनों में