शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 350, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें३५० ] [ श्रीशारदा तिलक शशिप्रसूनजुहुयाद्वसुसंख्यसहस्रकम् । मासमात्रेण वशगास्तस्युः सकला नृपाः ॥५४ हुत्वा बिल्वफलैः पक्वैः श्रियं विन्देदनिन्दिताम् । प्रफुल्लैररुणाम्भोजैस्तामेव लभते पुनः ॥५५ हुत्वा ज्योतिष्मतीतैलं सहस्रं वसुसंख्यक्रम् । सुभखगा जायते सम्यक् सर्वेषां नात्र संशयः ॥५६ इस रीति से नित्य ही अर्चन करता हुआ यथा रीति से पुरुषोत्तम प्रभु की पूजा करनी चाहिए । इस के प्रभाव से मनुष्य बहुत बड़ी लक्ष्मी को तथा अतुल वैभव को प्राप्त किया करता है ॥५२॥ आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य और यम के अभीष्टों की प्राप्ति किया करता है। ऽयारि के पुष्पों से नित्य ही यथाविधि अर्चन करके शशि के पुष्पों के द्वारा एक सहस्र आठ बार होम करना चाहिये । इसके प्रभाव से एक ही मास में सम्पूर्ण नृप वश में हो जाने वाले हो जाया करते हैं ॥५३-५४॥ पके हुए बेल के फलों द्वारा होम करके अनिन्दित श्री को मानव प्राप्त कर लेता है । खिले हुए अरुण कमलों से होम करके वही फल प्राप्त कर लेता है ॥५५॥ ज्योतिष्मती के तैल से एक हज़ार आठ आहुतियाँ देकर भली भाँति सुभगा लक्ष्मी सबको प्राप्त हो जाया करती है-इसमें कुछ भी संशय नहीं है ॥५६॥ विधानेनामुवा मन्त्री महारोगात्प्रमुच्यते । अश्वत्थसमिधां होमः पराहृतधनप्रदः (नावहः) ॥५७ आज्याक्तदूर्वाहोमेन मुच्यते महतोभयात् ॥५८ यस्य नामयुतं मन्त्रं जपेदयुतसंख्यया । स भवेद्दासवत्तस्य नात्र कार्या विचारणा ॥५६ वह्नि किसिहोक्तेन मनुना साधकोत्तमः । साधयेत्सकलान्कामान् साक्षाद्विष्णुरिवापरः ॥६० उत्तिष्ठ पदमाभाष्य श्री क्रोकपोधिशहुतशानौ । वह्निजायावर्म्मिन्त्रो वस्वक्षरसमन्वितः ॥६१