शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
३५० ] [ श्रीशारदा तिलक शशिप्रसूनजुहुयाद्वसुसंख्यसहस्रकम् । मासमात्रेण वशगास्तस्युः सकला नृपाः ॥५४ हुत्वा बिल्वफलैः पक्वैः श्रियं विन्देदनिन्दिताम् । प्रफुल्लैररुणाम्भोजैस्तामेव लभते पुनः ॥५५ हुत्वा ज्योतिष्मतीतैलं सहस्रं वसुसंख्यक्रम् । सुभखगा जायते सम्यक् सर्वेषां नात्र संशयः ॥५६ इस रीति से नित्य ही अर्चन करता हुआ यथा रीति से पुरुषोत्तम प्रभु की पूजा करनी चाहिए । इस के प्रभाव से मनुष्य बहुत बड़ी लक्ष्मी को तथा अतुल वैभव को प्राप्त किया करता है ॥५२॥ आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य और यम के अभीष्टों की प्राप्ति किया करता है। ऽयारि के पुष्पों से नित्य ही यथाविधि अर्चन करके शशि के पुष्पों के द्वारा एक सहस्र आठ बार होम करना चाहिये । इसके प्रभाव से एक ही मास में सम्पूर्ण नृप वश में हो जाने वाले हो जाया करते हैं ॥५३-५४॥ पके हुए बेल के फलों द्वारा होम करके अनिन्दित श्री को मानव प्राप्त कर लेता है । खिले हुए अरुण कमलों से होम करके वही फल प्राप्त कर लेता है ॥५५॥ ज्योतिष्मती के तैल से एक हज़ार आठ आहुतियाँ देकर भली भाँति सुभगा लक्ष्मी सबको प्राप्त हो जाया करती है-इसमें कुछ भी संशय नहीं है ॥५६॥ विधानेनामुवा मन्त्री महारोगात्प्रमुच्यते । अश्वत्थसमिधां होमः पराहृतधनप्रदः (नावहः) ॥५७ आज्याक्तदूर्वाहोमेन मुच्यते महतोभयात् ॥५८ यस्य नामयुतं मन्त्रं जपेदयुतसंख्यया । स भवेद्दासवत्तस्य नात्र कार्या विचारणा ॥५६ वह्नि किसिहोक्तेन मनुना साधकोत्तमः । साधयेत्सकलान्कामान् साक्षाद्विष्णुरिवापरः ॥६० उत्तिष्ठ पदमाभाष्य श्री क्रोकपोधिशहुतशानौ । वह्निजायावर्म्मिन्त्रो वस्वक्षरसमन्वितः ॥६१
पंचदश पटल ] [ ३५१ मन्त्रधारी इस विधान से महारोग से मुक्त हो जाया करता है। पीपल की समिधाओं के द्वारा किया हुआ होम दूसरों के द्वारा हरण किये हुए धन के प्रदान करने वाला होता है ।५७। घृत में अक्त की हुई दूर्वा के होम के द्वारा महान् भय से छुटकारा पा जाया करता है ।५८। जिसके नाम से युक्त मन्त्र का दश सहस्र की संख्या में जप करे तो वह मानव उसके दान की ही भाँति हो जाता है-इसमें विचारणा कभी नहीं करनी चाहिए ।५६। यहाँ पर इस विषय में बहुत अधिक कथन से क्या प्रयोजन है। इस मन्त्र के द्वारा साधक अपने सभी कामों का साधन करता है और साक्षात् दूसरे विष्णु के ही समान हो जाता है ।६०। अब श्री कर मन्त्र का उद्धार बतलाया जाता है--उत्तिष्ठ श्री कहकर ककार और रेफ कह कर स्वाहा-यह पद कहे। यह मन्त्र आठ अक्षरों वाला होता है ।६१। ऋषिरस्य भवेद्वामः पंक्तिश्छन्द उदाहृतम् । श्रीकराख्यो हरिः प्रोक्तो देवतास्य मनीषिभिः ।६२ हृदयं भीषय द्वन्द्वं त्रासयद्वितयं शिरः । शिखाप्रमर्दययुगं वर्मपध्वंसयद्वयम् ।६३ अस्त्रं रक्षयुगं सर्वे हुतन्ताः समुदीरिताः । मूर्द्धनि नेत्रद्वये कण्ठे हृदयोदरयोः पुनः ।६४ उरुजङ्घापदद्वन्द्वे मन्त्रवर्णान्प्रविन्ससेत् । मुखे न्यसेद्ब्राह्मणोस्य मुखमासीदिमं मनुम् ।६५ बाहूराजन्यः कृतोऽयं न्यैस्तत्र्यो बाहुयुग्मके । ऊरू तदस्य यद्वैश्य इममूरुद्वये न्यसेत् ।६६ पादद्वये न्यसेन्मत्रं पद्भ्यां शूद्रो अजायत । चक्रं शंखं गदां पद्मं हस्ताग्रेष्वथ विन्ययेत् ।६७ इस मन्त्र का ऋषि वाम देव है और पंक्ति इस का छन्द कहा गया मनीषियों ने इस मन्त्र का देवता श्रीकर नाम वाले हरि भगवान् को बताया है ।६२। भीषय का द्वन्द्व इसका हृदय है और त्रासय का जोड़ा
३५२ ] [ श्रीशारदा तिलक इस का शिर होता है । मर्दय का जोड़ा उग्रकी शिखा है । प्रध्वसद्- इसका युगल इसका वर्म होता है ।६३। रक्ष का युगल अस्त्रा है । ये सब हुम अन्त वाले कहे गये हैं । अर्थात् इन सबको अन्त में हुम यह होता है । मूर्धा, दोनों नेत्र, कण्ठ, हृदय, उदर, ऊरु, जंघा पद द्वन्द्व में मन्त्र के वर्णों का विन्यास करना चाहिए । ब्रह्मण इसका मुख है---इस मन्त्र का मुख में न्यास करे ।६५। बाहूराजन्यः कृत--- इसका दोनों बाहुओं में न्यास करे । 'ऊरू तदस्य यद् वैश्यः'--इसका ऊरू हृदय में न्यास करना चाहिए । 'पद्भ्याशूद्रो अजायत्--इसका दोनों पादों में विन्यास करे । हस्तौ के अग्र भागों में शंख, चक्र, गदा और पद्म का न्यास करना चाहिए ।६६।६७। इत्थं न्यासं तनौ कृत्वा देवं पूर्वोक्तमण्डपे । रक्तपद्मासनस्थस्य गरुडस्योपरि स्थितम् ।६८ काञ्चनाद्रिसमप्रभ कमलाननं कमलेक्षणम् । चक्रशंखगदासरोजधरं मनोहरदर्शनम् ।६६ कौस्तुभाङ्कितवक्षसं मुकुटाङ्गदादिविभूषणम् । तार्क्ष्यवाहनमच्युतं हृदि भावयामि जगत्पतिम् ॥७० अष्टलक्षं जपेन्मन्त्री मन्त्रमेतं दशांशतः । बिल्वक्षीरद्रुमोत्थाभिः समिद्द्भिररुणाम्बुजैः ।७१ पयोन्नैः सर्पिषा हुत्वा गुरुं सन्तोषयेद्धनैः । मृत्तौ मूलेन क्लृप्तायां पूजयेद्देवमन्वहम् ।७२ अङ्गान्यादौ समाराध्य दिक्पत्रेषु समर्चयेत । श्रियं धृतिं रतिं कान्तिं लोलापङ्कजधारिणीः ।७३ पीतारुणाः श्यामनीला विदिक्पत्रेषु पूजयेत् । वासुदेवादिका मूर्तीः पार्श्वयोर्निधियुग्मकम् ।७४ इस प्रकार से शरीर में न्यास करके पूर्व में कहे हुए मण्डप में देव का जो रक्त पद्म के आसन पर स्थित है---गरुड़के ऊपर विराजमान हैं सुवर्ण के पर्वत के समान प्रभा से संयुत---कमल जैसा जिनका मुख
पंचदश पटल } { ३५३ हैं तथा कमल के सदृश नेत्र हैं। जो शंख, चक्र, गदा और पद्म को धारण करने वाले हैं- जिनका दर्शन परम मनोहर है-जिनका वक्षःस्थल कौस्तुभ मणि से अंकित है-जो मुकुट, अङ्गद आदि भूषणों से विभूषि है जिनका गरुड़ वाहन है-जो अच्युत और जगतों के स्वामी हैं, मैं उनकी अपने हृदय में भावना करता हूँ ।६८-७०। मन्त्रधारी इस मन्त्र का आठ लाख जप करे और जप का दशांश भाग विल्व-क्षीर द्रुम की समिधाओं से-अरुण कमलों से-पयोऽन्नों से और घृत से हवन कर के अपने गुरुदेव को धनों से सन्तुष्ट करना चाहिए । मूल से कल्पित मूर्ति में देव का प्रतिदिन पूजन करना चाहिए ।७१-७२। आदिमें अङ्गों का समाराधन करके दिक्पत्रों में अर्चन करे। श्री, धृति, कान्ति का जो लीला पंकजों के धारण करने वाली है तथा पीत, अरुण, श्याम और नील है इनका विदिशाओं के पत्रों में अर्चन करना चाहिए । वासु- देव आदि मूर्तियों का पूजन करे। दोनों पाश्र्वों में दोनों विधियों का यजन करे ।७३-७४। विष्ण्ववसेनं यजेदीशे लोकपालानन्तरम् । एव सम्पूजयेद्देव ह्याधयेदिमात्मानः ।७५ दूर्वाचरुभ्या साज्यभ्यां जुहुयादयुतं बुधः । सपातितं चरु पश्चात्पाध्यो भुञ्जीत साधितम् ।७६ ब्राह्मणान् भोजयेत्सम्यङ् मधुरैर्वोमवासरे । तोषयेद्गुरुमर्थेन वस्त्रैर्धान्यैर्विभूषणैः ।७७ जित्वापमृत्युरोगादीन् दीर्घमायुः स विन्दति । आज्यसिक्तैः सरसिजैर्जुहुयादयुतत्रयम् ।७८ निवसेत्कमला तस्मिन्न त्यजेत्तत्सुवानपि । विल्ववृक्षसमिद्धोमात्साक्षाद्धनपतिर्भवेत् ।७६ पूगपुष्पसमायुक्तै स्तण्डुलैर्मधुरोक्षितैः । जुहुयादचिरादेव सम्पदं जायते निधिः ।८०
३५४ ] [ श्रीशारदा तिलक ईशदिशा में विष्वक्सेन का अर्चन करे और इसके अनन्तर लोक- पालों का अर्चन करे और इस रीति से देव का यजन करे तथा आत्मा के अभीष्ट का साधन करे ।७५। बुध को चाहिए कि घृत के सहित दूर्वा चरु से दश हजार आहुतियाँ देवे । पश्चात् सम्पतित चरु को जो साधित है साध्य खा लेवे ।७६। होम के दिन में मधुर पदार्थोंसे ब्राह्मणों को भली भाँति भोजन करावे । वस्त्रों से, धान्यों से, भूषणों से और अर्थ के द्वारा अपने गुरुदेव को सन्तुष्ट करे ।७७। वह मानव फिर अप- मृत्यु को जीत कर और रोगों पर विजय पाकर दीर्घ आयु का लाभ किया करता है आज्य से सिक्त कमलों के द्वारा तीन अयुत अर्थात् तीस हजार आहुतियां देनी चाहिए ।७८। उस पुरुष के गृह में कमला निवास किया करती है और उसके पुत्रों का भी कभी त्याग नहीं करती है । विल्व वृक्ष की समिधाओं के होम से मानव साक्षात् धनपति ही हो जाया करता है ।७९। पूग के पुष्पों समायुक्त तण्डुलों से जो मधुर में उक्षित होवें हवन करे तो शीघ्र ही वह सम्पदाओं का निधि हो जाया करता है ।८०। आज्येन जुहुयाल्लक्षं परान् जयति पार्थिवः । अब्जसूत्रं भुजेबद्धं मनुनानेन साधितम् ।८१ रोगापमृत्युदुःखानि नाशयेन्नात्र संशयः । जलाञ्जलिभिरात्मानमभिषिञ्चेद्दिनेदिने ।८२ स्नानकालेषु स भवेत् सौभाग्यश्रीसमृद्धिमान् । ऊर्ध्वबाहुर्द्वयो मन्त्री पश्यन्नादित्यमण्डले ।८३ सहस्रमानं प्रजपेन्नित्य निशिमधोर्मनुम् । सर्वे मनोरथास्तस्य सिद्ध्येयुर्नात्र संशयः ।८४ कृष्णाय पदमाभाष्य गोविन्दाय ततः परम् । गोपीजनपदस्यान्ते वल्लभाय द्वितावधिः ।८५ कामबीजादिराख्यातो मनुरष्टादशाक्षरः । नारदोऽस्य मुनिः प्रोक्तो गायत्रं छन्द उच्यते ।८६
पंचदश पटल ] [ ३५५ देवता कथितः कृष्णः सर्वकामफलप्रदः । चतुः करणवेदानेत्रसंख्याक्षरैः क्रमात् ॥ ८३ पञ्चाङ्गानि मनोः कुर्यान्मन्त्रविज्जातिसंयुतैः । स्मरेद्वृन्दावने रम्ये मोहयन्तं मनोरमम् ॥८८ गोविन्दं पुण्डरीकाक्षं गोपकन्याः सहस्रशः । आत्ममो वदनाम्नाम्भोजप्रेषिताक्षिमभ्रया ।८६ घृतसे एक लाख आहुतियां देवे तो राजा शत्रुओं पर विजय प्राप्त र् या करता है इस मन्त्र के द्वारा साधित अब्ज सूत्र को अपनी भुजा में बाँधे तो वह अपने रोग-अपमृत्यु और दुःखों का विनाश कर देता है इसमें कुछ भी संशय नहीं है । जल की अञ्जलियों के द्वारा दिनों दिन अपने अपका अभिषिञ्चन् करे और स्नान के समय में करे तो वह श्री और समृद्धिवाला होता है । दोनों बाहुओं का ऊपर की ओर करके मन्त्रधारी पुरुष आदित्य मण्डल में देखता हुआ मन्त्र को नित्य एक सहस्र जप करे तो पनी बुद्धि वाला होता है । उस मनुष्य के सब मनोरथ सिद्ध होते हैं--इसमें तनिक भी संशय नहीं है ।८१-८४। अब गोपाल मन्त्र का उद्धार करके बताया जाता - 'कृष्णाय' यह पद कह कर उसके पश्चात् 'गोविन्दाय' कहे । फिर 'गोपीजन' इस पद के अन्त में 'वल्लभाय' - यह कहे और अन्त में द्विष्ट् अर्थात् 'स्वाहा' बोले ।८५ काम वीज अर्थात 'क्लीं' यह आदि में कहा गया है। यह मन्त्रराज आठ अक्षरों वाला होता है । इसका ऋषि नारद और गायत्र छन्द बताया गया है ।८६। इसके देवता भगवान् श्री कृष्ण कहे गये हैं जो सब कामों के फल के प्रदान करने वाले हैं। चार करण-वेद (चार)-अब्धि तथा नेत्र (दो) की संख्या वा अक्षरों से क्रम से मन्त्र का वेत्ता जाति संयुतों से मन्त्र के पाँच अङ्गों को करे । रम्य वृन्दावन में मोहन करते हुए- मनोरम पुण्डरीकाक्ष गोविन्द का स्मरण करना चाहिए । सहस्रों गोप कन्याएं उनके मुख कमल में लगायी हुई आँखों के भ्रमरों वाली हैं ।८७-८६।
३५६ ] [ श्रीशारदा तिलक पीडिताः कामबाणेन चिरमाश्लेषणोत्सुकाः । मुक्ताहारलसत्पीनतुङ्गस्तनभारान्विताः ।६० स्रस्तधम्मिल्लवसना मदस्खलितभूषणाः । दन्तपङ्क्तिप्रभाद्भासिस्पन्दमानाधराञ्चिताः ।६१ विलोभयन्तीविवधैर्विभ्रमैर्भावगर्भितैः ।६२ फुल्लेन्दीवरकान्तिमिन्दुवमनं वर्हत्रियसप्रियम् । श्रीवत्माङ्कमुदारकोस्तुभधरं पीताम्बरं सुन्दरम् । गोपीनां नयनोत्पलार्चिततनुं गोपालसंचावृतम् । गोविन्दं कलवेणुवादनपरं दिव्याङ्गभूषं भजे ।६३ मन्त्रमेनं यथान्यायमयुतद्वितयं जपेत् । जुहुयादरुणाम्भोजैस्तद्दश श समाहितः ।६४ वैष्णवे पूजयेत्पीठे यथावद्देवकीसुतम् । अङ्गावरणमाराध्य पत्रेषु पूजयेत्प्रियाः ।६५ ये सभी गोप कन्ताएं कामबाण से पीड़ित है । और चिरकाल तक आश्लेषण करने के लिए समुत्सुक हो रही हैं। मोतियों के हार से शोभित स्थूल और ऊँचे स्तनों के भार से युक्त हैं—इसके धम्मिल के वस्त्र स्रस्त हो गये हैं-इनके मद से इनके भूषण स्खलित हो गये हैं ये दाँतों की पंक्ति की प्रभा से उद्भासित और स्पन्दमान अधरों से अञ्चित हैं-भावों को गर्भ में रखने वाले अनेक विभ्रमों से विलोभित करती हुई हैं। अब ध्यान बतलाया जाता है-विकसित इन्दीवर की कान्ति से संयुत चन्द्र के समान मुख वाले-मयूर पिच्छ के अवतंस से परम प्रिय, श्री वत्स के चिन्ह वाले-उदार कौस्तुभ को धारण करने वाले पीत वर्ण के वस्त्रधारी, सुन्दर, गोपियों के नेत्र कमलों से अर्चित शरीर वाले, गोपालों के समुदाय से आवृत्त-कल वेणु (वंशी) के वादन करने में तत्पर, दिव्य अङ्गों की भूषा से अन्वित श्री गोविन्द का भजन करता हूँ ।६०-६३। इस मन्त्र का विधि के अनुसार बीस हजार जप करे और जप के दशांश भाग का अरुण कमलों से परम समाहित होकर
पंचदश पटल } [ ३५७ होम करे । वैष्णव पीठ पर रीति के अनुसार देवकी सुत का अभ्यर्चन करना चाहिए। अङ्गावरण की आराधना करके पत्रोंमें प्रियाओं का पूजन करे ।६४-६५। कालिन्दीनग्नजित्याख्या मित्रविन्दा ततः परम् । चारुहासिन्यथपरा रोहिणी जाम्बवत्यथ । ६६ रुक्मिणी सत्यभामेति कथिताश्चारुभूषणाः । पोताम्बरधराः सौम्याः करास्बुजधृताम्बुजाः । ६७ ऐरावतदीनभ्यर्चेद्गजानष्टौ ततो बहिः । लोकपालान्यजेन्मन्त्री वज्राद्यस्त्राणि तद्बहिः । ६८ इति सम्पूजयेद्देवं गोविन्दं जगतां पतिम् । कुर्वीत कल्पनिर्दिष्टान्प्रयोगान्निजवाञ्छितान् । ६६ लक्ष्मीप्रसूनैर्जुहुयाच्छियमिच्छन्ननिन्दिताम् । साज्येनान्नेन जुहुयादाज्यान्नस्य समृद्धये । १०० श्री भगवत्प्रियाओं के भ नामों का परिगणन किया जात है- कालिन्दी, नग्नजिती, मित्र विन्दा, चारुहासिनी, रोहिणी, जाम्बवती, रुक्मिणी, सत्यभामा - ये उनके नाम हैं और ये सब परम चारुतम भूषणों के धारण करने वाली है । पीताम्बर धारिणी-सौम्य, अपने कर कमलों में अम्बुजों को धारण कर रही है । ६६-६७। उनके बाहिर ऐरावत प्रभृति गजों की, जो आठ हैं, अभ्यर्चन करे । मन्त्रधारी पुरुष लोकपालों का यजन करे और उनके बाहिर वज्र आदि उनके आयुधों का पूजन करना चाहिए । ६८। इसी रीति से जगतों के पति गोविन्द देव का भली भाँति यजन करे । फिर कल्प में निर्दिष्ट अपने वाञ्छित प्रयोगों का समाचरण करे । ६६। अनिन्दित श्री की इच्छा रखता हुआ लक्ष्मी के पुष्पों से होम करे । अन्न की समृद्धि के लिये घृत सहित अन्न से होम करना चाहिए ।१००। आरण्यैः कुसुमैर्विप्रान् जातिभिः पृथिवीपतीन् । प्रसूनैरसितैर्वैश्यान् शूद्रान्नीलोत्पलेर्नवैः । १०१
३१८ ] [ श्रीशारदा तिलक वशयेल्लवणैः सर्वान्पङ्कजैर्वनििताजनान् । गोशालासु कृतो होमः पायसेन ससर्पिषा ।१०२ गवां शान्तिं करोत्याशु नोविन्दगोकुलप्रियः । शिमुवेषधरं देवं किङ्किणीदामशोभितम् ।१०३ स्मत्वा प्रतर्पयेन्मन्त्रो दुग्धबुद्ध्या शुभैर्जलैः । धनधान्यांशुकादीनि प्रीतस्तस्मै ददातिसंः । १०४ पिण्डमूलेन वीतं दहनपुरयुगे कोणराजद्रसार्णं । कुर्यात्पद्मं दशार्णस्फुरितदशदलं कामबीजेन वीतम् । पद्मं किञ्जल्कसस्थं स्वरविकृतिदलप्रोल्लसत्षोडशार्णं किजल्कं व्यञ्जनाढ्यं विकृतियगदलेष्वर्पितानुष्टुवर्णम् । १०५ पाशांकुशाभ्यामावीतं क्षोणीपुरयुगास्रिषु । अष्ट्राक्षरेण लसितं यन्त्रं गोविन्ददैवतम् ।१०६ जंगली पुष्पों के द्वारा होम करने से विप्रों को, जाती के पुष्पों मे पार्थिवों को--आति पुष्पों से वैश्यों और नवीन नीलोत्सलो से शूद्रों को वश में कर लेता है तथा लवण के होम से सबको ओर पंकजो के द्वारा होम का समाचरण करने से वनिता जनों को वश में कर लिया करता है । गोशालाओं में घत के साथ पांयस से किये होम से शीघ्र ही गोओं में गोकुलप्रिय गोविन्द शान्ति किया करते हैं । किंकिणी दाम से शोभित--शिशु वेष को धारण करने वाले देव का स्मरण करके दूध कीभावना करके शुभ जलके द्वारा मन्त्रधारी तर्पण करे । वे परम प्रसन्न होकर उसके लिये धन-धान्य वस्त्र आदि दिया करते हैं । १०१-१०४। अब यन्त्र बतलाया जाता है--पिण्ड बीज को मूल से परिवीत करे । छै वर्णोसे रंजित कोण में दहन पुर युग में एक पद्मकी रचना करे । जो पद्म दस वर्णों से स्फुरित दश दलों वाला होता है। यह काम बीज से वीत होवे । किजल्क से व्यञ्जनों आढ्य होवे । बत्तीस दलों में अर्पित अनुष्टुप् वर्ण वाला करे । पाश और अंकुश से आवीत करे । तीनों में
पंचदश पटल ] [ ३५६ भूपुर के युग करे। आठ अक्षरों से शोभित यह गोविन्द के दैवत वाला यन्त्र होता है ॥१०५-१०६॥ धर्मार्थकामफलदं सर्वरक्षाकरं स्मृतम् । पञ्चान्तकोधरासंस्थोमनुबिन्दुभूषितः ॥१०७ पिण्डबीजमिदं प्रोक्तं सर्वसिद्धिकरपरम् । स्मरः कृष्णाय ठद्वन्द्वं षडर्त्तो मनुरीरितः ॥१०८ गोपीजनन्ते प्रवदेद्वल्लभमायाग्निसुन्दरी । अयं दशाक्षनीरोमन्त्रीदृष्टफलप्रदः ॥१०६ प्रणवं हृदयं कृष्ण ङऽन्तमुक्ता ततः परम् । साहश देवकीपुत्रं हूँ फट् स्वाहासमन्वितः ॥११० षोडषाक्षरमन्त्रोऽयं गोविन्दस्य समीरितः । पिण्ड रतितैर्बीजं नमो भगवते ततः ॥१११ नन्दपुत्राय वालादिवपुषे श्यामलाय च । गोपीजनपदस्यान्ते वल्लभाय द्विठावधिः ॥११२ यह मन्त्र धर्म—अर्थ और काम के फल को देने वाला है और सब को रक्षा करने वाला कहा गया है। अब पिन्ड बीज बताया जाता है— पञ्चान्तक—गः धरा—लः, इठः,-यः, यह मन्त्र विन्दु से भूषित होता है। यही पिण्ड बीज कहा गया है जो परम सिद्धि के करने वाला है। स्मर—काम बीज, कृष्णाय—और उद्धन्द्व—स्वाहा। यह छै वर्णो का मन्त्र होता है ॥१०७-१०८। अन्त में 'गोपीजन' कहे और पीछे 'वल्ल- भाय' कहे तथा अन्त में 'स्वाहा' कहे । यह दश अक्षरों वाला मन्त्र होता है जो दृष्ट और अदृष्ट के फल का दाता है ॥१०६। 'प्रणव' फिर हृदय—'नमः' यह पद कहे। उसके अनन्तर चतुर्थ्यन्त 'कृष्ण' पद कहे । उज प्रकार का देवकी पुत्र कहे और 'हूँ फट् स्वाहा'—यह कहे ॥११०। यस षोडश वर्णों वाला गोविन्द का मन्त्र बताया गया है पिड-काम बीज—पीछे 'नमो भगवते'—यह पद कहे ।१११। इसके अनन्तर 'नन्द पुत्राय—वालावपुषे और श्यामलाय-ये पद कहे। फिर । 'गोपीजन'
सूत्र चतुष्टय देवे । इससे शूल का आकार हो जाता है जो दो वृत्तों से
३६० ] [ श्रीशारदा तिलक इस पद के अन्त में 'वल्लभाय' कहे और अन्त ये 'स्वाहा, कहना चाहिए ॥११२ अनुष्टुप् मन्त्र आख्यातो गोपालस्य जगत्पतेः । अनङ्गः कृष्णगोविन्दो ङेन्तावष्टाक्षरो मनुः ॥११३ प्राक्प्रत्यग्दक्षिणादविविधवदभिलिखेत्स्पष्टरेखाचतुष्कं कोणोद्यच्छूलयुक्तं वलययुगयुतं मध्यपूर्वं तदन्तरम् । श्लोकस्यार्णान्परस्ताद्वसुपदविवरेष्वष्टवर्णं लिखित्वा तद्वा ो द्वादशार्णे स्तदनु परिवृत देवकीपुत्रयन्त्रम् ॥११४ तं सुकीदेवदेवे त तं देने वरतो रनम् ! त वा रतो ढत ख्यातं देवकीसुतम् ।११५ लिखित भूर्ज्जपत्रादौ तन्त्रमेतद्यथाविधि । विधृतं बाहुना नित्यं सर्वकामफलप्रदम् ॥११६ पलाशवृक्षफलके लिखितं साधुसाधितम् । गोस्थाने निखनेदेतद्गवां वृद्धिमवैत्सदा ॥११७ यह जगत्पति गोपाल का अनुष्टुप् मन्त्र बताया गया है काम बीज और चतुर्थ्यन्त कृष्ण तथा गोविन्द होते हैं । यह आठ अक्षरों वाला मन्त्र होता है ॥११३। अब काम लिङ्ग मन्त्र बताया जाता है— पूर्व और पश्चिम में दो रेखाएं लिखे तथा दक्षिण-उत्तर में दो रेखाएं लिखें । इस तरह से चार रेखाएं लिखनी चाहिए । मध्य कोण में कर्ण सूत्र चतुष्टय देवे । इससे शूल का आकार हो जाता है जो दो वृत्तों से युक्त करे । मध्य कोष्ठ से आरम्भ करके मध्य कोष्ठ में ही समाप्ति करे श्लोक के आठ वर्णों को आगे आठ पद विवरों में लिखे । उसके बाहर बारह वर्णों से उसके पीछे परिवृत करे । यह देवकी पुत्र का यन्त्र होता है ॥११४। सुकी देव में त-त देव में---त वरतो रत - अथवा तं रतो रूढ----त ख्यात और तं देवकी सुतम् है ॥११५। इस यन्त्र को विधि के साथ भोज पत्र आदि पर लिखे । इसे बाहु पर नित्य विधृत करे तो यह सब कामनाओं के फल को प्रदान करने वाला होता है ॥११६।
पंचदश पटल ] [ ३६१ ढाक वृक्ष के तख्ते पर लिखकर उसे साधु साधित करे। इस मन्त्र को गौओं के स्थान में गाड़ देवे तो इससे गौओं की वृद्धि सदा होती है। १ १७। श्लोक चतुः षष्टदेष भूर्ज शिवादि देत्यादि लिखेत्क्रमेण । तत्सर्वतोभद्रमिति प्रसिद्ध यन्त्रः श्रीविजयप्रदायि । ११८ फलके खादिरे कॢप्तं गवां गोष्ठे निवेशितम् । रक्षाकृच्चौरमारिघ्नं सवत्सानां गवां हितम् ।११६ क्षोरगोपवगीरक्षोरक्षमाक्षपक्ष र । योमानोनगनोमागोपक्षक्षक्षगक्षाप ।१२० ब्रह्मा भूम्या समासीनः शान्तिबिन्दुसमन्वितः । बीज मनोभुवः प्रोक्तं जगत्त्रितयमोहनम् । १२१ ऋषिस्सम्मोहनः प्रोक्तो गायत्रं छन्द ईरितम् । सर्वसम्मोहनः साक्षाद्देवता मकरध्वजः । बीजेन दीर्घयुक्तेन षड् ङ्गविधिरोरीतः । १२२ अब अन्य मन्त्र बताया जाता है-भोज पत्र में चौंसठ पदों में श्लोक को लिखे और क्रमसे शिवादि दैत्यादि लिखे । 'यह सर्वतो भद्र'- इस नाम से प्रसिद्ध है। यह यन्त्र यश, श्री और विजय के प्रदान करने वाला होता है ।११८। खादिर वृक्ष के तख्ते पर लिख कर गायों के गोष्ठ में निवेशित करे तो यह चोर आदि के हनन करने वाला तथा रक्षाप्रद होता है और वत्सों के सहित गौओं का हित करने वाला है ।११६। अक्षर वाला एक काम मन्त्र कहा जाता है—ब्रह्मा, कः, भूमि, लः, इस पर आसीन शांति-ई, विन्दु, अनुस्वार, इससे क्लीं हुआ । यह कामदेव का बीज कहा गया है। जो तीनों जगतोंका मोहने वाला होता है । १२० । १२१। इस मन्त्र का ऋषि सम्मोहन कहा गया है तथा इसका छन्द गायत्र है । इस मन्त्र का देवता साक्षात् सर्व सम्मोहन मकर ध्वज होता है । दीर्घ से युक्त बीजके द्वारा इसके षडङ्गों की विधि कही गयी है ।१२२।
३६२ ] [ श्रीशारदा तिलफ तपा (वा) रुणं नत्नविभूषणाढ्यं मीनध्वजं चारुकृताङ्गरागम् । कराम्बुजैरङ्कु शमिक्षु चापं पुष्पास्त्रपाशौ दधत भजामि ।२३ लक्षत्रयं जपेन्शं मधुरत्रयसंयुतैः । पुष्पैः किंशुकजैः फुल्लैर्जुहुयात्तद्दशांशतः । १२४ वक्ष्यमाणे यजेत्पीठे विधिना मकरध्वजम् । मोहिनी क्षोभिणी त्रासीस्तम्भन्याकर्षिणो पुनः ।१२५ द्राविण्युन्मादिनीक्लिन्नाक्लेदिन्यः पीठशक्तयः । बीजाद्यमासनं दत्त्वा मूर्त्ति मूलेन कल्पयेत् । १२६ अस्यां सम्यग्यजेद्देवं वक्ष्यमाणेन वर्त्मना । इष्ट्वाऽङ्गावरणं पूर्वं मध्ये दिक्षा यजेच्छरान् ।१२७ ड्राडाद्यं शोषणं पूर्वं द्रीडाद्यं मोहनं ततः । गंदीपनाख्यं क्लीमाद्यं क्लुमाद्यं तापनं ततः ।१२८ सगन्तंभृगुणा भूयो मादनं पञ्चमन्ततः । प्रणामबाणहृप्ताब्जा ध्येयास्ना बाणदेवताः ।१२६ अब ध्यान बताया जाता है-क्रान्तिसे युक्त अरुणरतनों के-भूषणोंसे समन्वित-मीन ध्वजा वाले-सुन्दर अङ्ग राग किये हुए-करकमलों में अंकुश इक्षुचाप-पुष्पास्त्र और पाश को धारण करने वाले का मैं भजन करता हूँ ।१२१। इस मन्त्र का तीन लाख जप करना चाहिए । और जप का दशांश भाग तीनों मधुरों में संयुक्त ढाक के पुष्पों से होम करें । आप बताये जाने वाले पीठ पर विधि के साथ मकरध्वज का अर्चन करना चाहिए । अब पीठ की शक्तियाँ बतलायी जाती हैं— मोहिनी— क्षोभिणी— स्तम्भिनी—आकर्षिणी—द्राविणी—उन्मादिनी— क्लिन्न—क्लेदिनी—ये पीठ की शक्तियाँ हैं बीजाद्य आसन देकर मूल मन्त्र के द्वारा मूर्त्ति की कल्पना करनी चाहिए । १२६-१२६। इस मूर्ति में आगे कहे जाने वाले मार्ग से भली भाँति देव का यजन करना चाहिए । पूर्व में अङ्गावरण का अर्चन करके मध्य में दिशाओं में शरों का अर्चन करना चाहिए ।१२७। पूर्व में डडाद्य—ड्रीडद्य—मोहन —
चतुर्दश पटल ] [ ३६३ दीपन-क्लीमाद्य-तापन-सर्गान्तभृगु अर्थात् सः, फिरमादन पाँचवां होता है। एक हाथ से प्रणाम और दूसरेसे अब्ज धारण करने वाले बाथ युक्त देवता है जिनका ध्यान करना चाहिए। वहां पर मध्य में क्रम के अनु- सार शक्तियों का पूजन करें। २८ १२६। सम्पूज्यास्तत्र मध्ययेषु शक्तयोऽष्टौ यथाक्रमम् । अनङ्गरूपान्याऽनङ्गमदनानङ्गमन्मथा ।।१३० अनङ्गकुसुमा पश्चादनङ्गमदुरा । अनंगशिशिरान ङ्गमेखलानंगदीपिका ।।१३१ लीलाकमलधारिण्यः स्मरवक्त्राः सुशोभितः ।।१३२ वह्निः षोडशपत्रेषु पूज्याः षोडश शक्तयः । युवतिविप्रलम्भान्या ज्योस्ना शुभ्रर्मदद्रवा ।।१३३ सुरता वारुणी लोभा कान्ति सौदामिनी पुनः । कामच्छत्रा चन्द्ररेखा शुकी स्यान्मदना पुनः ।१३४ ज्योतिर्मायावनी ता स्युः कहलारविलसत्कराः । स्मेरवक्त्रा युवतयो मदविभ्रममन्थराः ।१३५ उन शक्तियों के नाम बताये जाते हैं-अनङ्गरूपा-अनङ्गमदना- अनङ्गमन्मथा-अनङ्गकुसुमा-अनङ्गमदनातुरा-अनङ्गशिशिरा-अन- ङ्गमेखला-अनङ्गदीपिका ये हैं ।१३०-१३१। ये सब लीला कमलों के धारण करने वाली हैं, इनके मुख पर मन्द मुस्कान रहती है ओर ये सुशोभित हैं ।१३२। बाहर सोलह पत्रों में इन षोडश शक्तियों का पूजन करना चाहिए । उनके शुभ नामों का, परिगठन किया जाता है- युवतिविप्रलम्भा, ज्योत्स्ना, शुभ्र, मदद्रवा, सुरता, वारुणी, लोभा, कान्ति, सौदामिनी, कामच्छत्रा, चन्द्ररेखा, शुक्री, मदना, ज्योति, मायावती, ये इनके नाम हैं । ये सब कल्हार के शोभित करने वाली है इनका मुख स्मित से युक्त है-ये सब युवतियाँ है और मद के विभ्रमों से मन्थरा है ।१३३-१३५। दलाग्रेषु पुनः पूज्याः स्मरस्य परिचारिकाः । शोकमोही विलासोऽन्यो विभ्रमो मदनातुरः ।१३६
३६४ ] [ श्रीशारदा तिलक अपत्रयोयुवा कामी धृतपुष्पोरतिप्रियः । ग्रीष्मस्तपान्त ऊर्ज्जोऽन्यो [हेमन्तः शिशिरो मतः । १३७ इक्षुकामुकपुष्पेषुधरा रक्ता सुभूषिताः । अपराङ्गनिषङ्गाद्या वनितासक्तमानसाः । १३८ रतिप्रियानष्टदिक्षु यजेदष्टौ विशिष्टधीः । परभृत्यारसौ पश्चाच्छुकमेधाव्हयौ पुनः । १३६ अपाङ्गभ्रूविलासो द्वौ हावभावौ प्रकीर्तितौ । चतुरस्रस्य कोणेषु पूज्यास्तत्परिचारकाः । १४० माधवी मालती पश्चाद्धरिणाक्षी मदोत्कटा । सितचामरधारिण्यः सर्वाभरणभूषिताः । १४१ बाह्ये लोकेश्वरान्पश्चात्तदस्त्राण्यर्चयेत् क्रमात् । १४२ इत्थं योभजते देवं सुगन्धिसुमादिभिः । स भवेल्लब्धसौभाग्यो लक्ष्म्या जितधनेश्वरः । १४३ अशोकपुष्पैर्दध्यक्तैर्जुहुयाद्देवमत्रयम् । अष्टोत्तरसहस्रं यो स भवेज्जगतां प्रियः । १४४ गव्येनाज्येनः जुहुयान्मन्त्रो णाष्टोत्तरं शतम् । साधकेन्द्रः संसापातर्चिते हव्यवाह । १४५ सम्पाताज्येन वनिता भो येदात्मनः पतिम् । अनया यद्यदादिष्टं तत्तत्स कुरुते सदा । १४६ कन्यार्थी जुहुयाल्लाजैर्दध्यक्तमण्डलान्तरे । कन्यामिष्टामवाप्नोति सापि सत्पतिमाप्नुयात् । १४७ दलों के अग्रभागों में पुनः स्मर देव की परिचारकों का पूजन करना चाहिए । शोक, मोह विलास, विभ्रम, मदनातुर, अपत्रय, युवा, कामी, धृतपुष्य रति प्रिय, ग्रीष्म तपान्त, ऊर्ज्ज, हेमन्त, शिशिर, ये इनके नाम हैं ।१३६-१३७। ये सब इक्षुकार्मुक और पुष्पों के वाणों को धारण करने वाली हैं । इनका रक्त वर्ण है और ये सब सुभूषित है । अपराङ्ग, निष्कङ्ख्या --वनिताओ में आसक्त मानस हैं ।
पंचदश पटल ] [ ३६५ ये रति प्रिय है । विशिष्ठ बुद्धि वाले को चाहिये कि इन आठों का आठों दिशाओं में यजन करे । परभृत्, सारस, शुक, मेधा ।१३८-१३६। अपाङ्ग, भ्रूविलास, हावभाव कीर्त्तित किये गये । चतुरस्र के कोणों में उनके परिचारक पूजने चाहिए ।१४०। माधवी, मालती, हरिणाक्षी -मदोत्कटा-ये सित चमरों के धारण करने वाली तथा सब आभरणों से विभूषित हैं ।१५१। बाहर में लोकेश्वरों का तथा क्रम से उनके अस्त्रों का अर्चन करना चाहिये ।१४२। इस प्रकार से सुगन्धित कुसुम आदि से जो देव का भजन किया करता है वह सौभाग्य के प्राप्त करने वाला और लक्ष्मी से धनेश्वर को जीतने वाला हो जाया करता है ।१४३। जो पुरुष अशोक के पुष्पों की दधि से अक्त करके दिनदिन तक एक सहस्र आठ बार होम किया करता है वह समस्त जगतों का प्रिय होता है ।१४४। गौ के घृत से मन्त्र के द्वारा एक सौ आठ आहु- तियाँ दिया करता है अर्चि हैं हव्य वाहन में साधकेन्द्र को चाहिए सम्पात करे । उस सम्पात के घृत से वनिता अपने पति को भोजन करावे । उसके द्वारा जो-जो आदिष्ट होवे वह उस-उसको ही करे ।१४५-१४६। जो कन्याओं का अर्थी हो वह मण्डल के अन्दर में ही दध्यक्त लाजाओं के होम से प्राप्त कर लेता है और कन्या भी अपना सत्पति प्राप्त कर लिया करती है ।१४७। कामोल्लासितसाध्यमङ्गविलसतषट् कोणमेतद्बहि- र्गायत्रीगुणवर्णवद्धसुदल मालामनेारक्षरैः । षट्संख्यैः सहित्राष्टपत्रसहितं क्षोणीपुरेणावृतम् । कोणन्यस्तमनोभावेन कथितं यन्त्रं जगन्मोहनम् ।१४८ कामदेवाय शब्दान्तं विद्महे ङेऽन्तमीरयेत् । पुष्पवाणं धीमहिस्यात्तन्तोऽनङ्ग प्रचोदयात् ।१४६ नमोऽन्तकामदेवाय वदेत् सर्वजन ततः । प्रियास् सर्ववर्णान्ते जनसम्मोहनाय च ।१५०
३६६ ] [ श्रीशारदा तिलक ज्वलद्वयं प्रज्वलार्णान्विदेत् सर्वजनस्य च । हृदय मम शब्दान्ते वशंकुरुयुगं शिरः । १५१ अब मन्त्र बतलाया जाता है-षट्कोण के मध्य में कामबीज के अन्दर साध्य-साधक कर्म का नाम लिखना चाहिए । अग्नेयादि षट्कोणों में काम षडङ्गों को लिखे। उसके वाहिर अष्टदल के मध्य में वक्ष्यमाण गायत्रीके वर्गोंको तीन बार लिखकर माला मन्त्र के षट्-षट् अक्षरों को दलों के अग्रभागों में लिखना चाहिए। में न्यस्त मनो- भाव से भूपुर को आवृत्त करे। यह जगन्मोहन यन्त्र कहा गया है ।१४८। काम गायत्री का उद्धार बतलाया जाता है-'कामदेवाय' के अन्त में चतुर्थ्यन्त 'पुष्प वाण' लिखना चाहिए । फिर 'विदमहे'और 'धीमहि' लिखकर अनङ्ग प्रचोदयात लिखे ।१४६। माला मन्त्र बतलाते हैं- 'कामदेवाय नमः' यह कहकर 'सर्व नमः सर्व प्रियाग जन मोहनाय' लिखकर 'ज्वल' को दो वार और प्रज्वल वर्णों को कहे । फिर सर्व जनस्य हृदय मम वश कुरु कुरु स्वाहा' कहे-यह माला मन्त्र अड़तालीस अक्षरों से युक्त होता है । १५०-१५१। मालामन्तुरयं साष्टचत्वारिंशद्भिरक्षरैः ।१५२ साध्याख्यापुटितः स्मरैः परिवृतं कामं लिखेन्मध्यतः । पश्चात्तारविकारपक्षकपरान्नासाधिझिण्टीशघान् । शूलाढ्याष्टदलेषु साधुविलखेत्ताम्बूलपत्रोदरे । यन्त्रं या निशि खादयेत्कृतजपं वश्या भवेत्तस्य सा ।१५३ कथित पुष्प बाणस्यसांगोपाँगसमर्चनम् । सौभाग्यकान्तिविभवदारपुत्रसमृद्धिदम् ।१५४ अब अन्य यन्त्र बतलाया जाता है-आठ दलों की कर्णिका में मध्य में साध्य कर्म नाम से पुटित काम बीजों से परिवृत करके लिखे । पीछे तार-विकार पक्षक पर नासार्धिझिण्टीशयों की शूलाढ्य आठ दलों में भली भाँति लिखना चाहिए । फिर ताम्बूल के मध्य में रखकर रात्री में खावे ओर जप करे तो वह उसके वश्य हो
पंचदश पटल ] [ ३६७ जाती है ।१५३। यह पुष्प व.ण का साङ्ग-उपाङ्ग समर्चन कह दिया गया है। यह सौभाग्य-कान्ति-वैभव-दारा-पुत्र और समृद्धि के प्रदान कर ने वाला होता है ।१५४। आदाय वेदाः सकलाः समुद्रान्निहत्यांशङ्खासुरमत्युदग्रम् । दत्ताः पुरः येन पितामहाय विष्णुं तमाद्यं भज मत्स्यरूपम् ।१५५। दिव्यामतार्थं मथिते महाब्धौ देवैरसुरैर्वासुकिमन्दराभ्याम् । भूमेर्महावेगविधूनितायास्तं कूर्ममाधारगतं स्मरामि ।१५६। समुद्रकाञ्ची वसुन्धरा सरिदुत्तरीया मेरुकिरीटभारा । दंष्ट्राग्रतो येन समुद्धृता भूस्तमादिकोलं शरणं प्रपद्ये ।१५७ सक्तातिभङ्गक्षमया धिया यस्तम्भान्तरालादुदितोनृसिंह । रिपुं सुराणां निशितैर्नखाग्रैर्विदारयन्तं नच विस्मरामि ।१५८ अत्यन्त उग्र शंखासुर का निहनन करके सब वेदोंको लाकर जिसने पहले पितामह को दिये थे उन आद्य मत्स्य स्वरूप वाले भगवान् विष्णु का भजन करो ।१५५। देवों और असुरों के द्वारा वासुकि और मन्दरा- चल से दिव्य अमृत की प्राप्तिके लिये महासागर के मथन किए जाने पर महान वेग से विघूर्णित भूमि के आधार में स्थित उन भगवान् कूर्म का मैं स्मरण करता हूँ ।१५६। जिसकी काँची समुद्र है और जिसका उत्तरीय श्रेष्ठ सरिता है-मेरु के किरीट के भार वाली वसुन्धरा को जिसने अपनी दाढ़ के अग्रभाग पर धारण किया था उन आदि कोल (वाराह) की मैं शरणागति में गमन करता हूँ ।१५७। अपने भक्त की पीड़ा के भंग करने में समर्थ श्री से युक्त जो स्तम्भ के अन्तराल से समुदित हुये थे और जो सुरो के शत्रु हिरण्यकशिपु को अपने पैने नखों से विदीर्ण कर रहे थे उन भगवान् नृसिंह कामैं कभी भी विस्मरण नहीं करता हूँ ।१५८। यतुः समुद्राभरणा धारित्री न्यासाय नाल चरणस्य यस्य । एकस्य नान्यस्य पद सुराणां त्रिविक्रमं सर्वगतं स्मरामि ।१५६
३६८ ] [ श्रीशारदा तिलक त्रिः सप्तवारं नृपतीन्निहत्य यस्तर्पणं रक्तमयं पितृभ्यः । चकार दौर्दण्डबलेन सम्यक् तमादिशूरं प्रणमामि भक्त्या ॥१६० कुले रघूणां रमवाप्य जन्म विधाय सेतुं जलधेर्जलान्तः । लङ्केश्वरं यः शमयाञ्चकार सीतापति तं प्रणमामिभक्त्या ॥१६१ हलेन सर्वानसुरान्विकृष्य चकार चूर्ण मुशलप्रहारैः । यः कृष्णमासाद्य बल बलीयान् भक्त्या जजेत बलभद्ररामम् ॥१६२ चार सागरों के आवरण वाली धरित्री जिसके चरणों में न्यास करने के लिए समर्थ नहीं हुई थी, सुरों के पद (स्थान) अन्य एक पद का नहीं था उन भगवान् त्रिविक्रम का जो सर्वगत है उसे मैं स्मरण करता हूँ ॥१५६। जिसने इक्कीस बार राजाओं का निहनन करके पितृ- गण का रक्तमय तर्पण किया था और भलीभाँति अपने महान बल के द्वारा ही किया था उन आदिशूर परशुराम का मैं भक्ति की भावना से स्मरण करता हूँ । अर्थात् प्रणाम करता हूँ ॥१६०. जिसने रघुकुल में जन्म ग्रहण करके समुद्र के जल के अन्दर सेतु बनवाकर लंकेश्वर रावण का शमन किया था, उन भगवान सीता के पति श्रीराम को मैं भक्ति भाव से प्रणाम करता हूँ ॥१६१। जिसने अपने हल के द्वारा समस्त असुरों को खींचकर मुशल के प्रहारों से उनका चूर्ण कर दिया ओर जो श्री कृष्ण के बल को प्राप्त करके बलीयान् थे उन श्री बलभद्र राम का मैं भक्ति से भजन करता हूँ ॥१६२। पुरा पुराणानसरान्विजेतुं सम्भावयन् चोवरचिह्ननेषु । चकार यः शास्त्रमोचकल्पं तं मूलभूतं प्रणताऽस्मि बुद्धम् ॥१६३ कल्पावसाने निखिलैः खुरैः स्वैः संघट्टयामास निमेषमात्रात् । यस्तेजसा निर्दहनातिभामो विश्वात्मकं तुं तुरग भजामः ॥१६४ शंख सुचक्रं सुगदां सरोजं दोर्भिर्दधानं गरुडाधिरूढम् । श्रीवत्सचिह्नं जगदादिमूलं तमालनीलं हृदि विष्णुमीडे ॥१६५ क्षीराम्बधौ शेषविशेषतल्पे शयानमन्तः स्मितशोभिवक्त्रम् । उत्फुल्लनेत्राऽम्बुजमम्बुजाभमाद्यं श्रुतीनामसकृत्स्मरामि ॥१६६
षोडष पटल ] [ ३६६ प्रणयेदनया स्तुत्या जगन्नाथं जगन्मयम् । धर्मार्थकाममोक्षाणामाप्तये पुरुषोत्तमम् ।१६७ जिसने पुराने असुरों पर विजय प्राप्त करने के लिये चीवर चिह्न डाले वेष की सम्भावनाये करते हुए अमोघ शास्त्र कल्प को किया था उन मूल भूत बुद्ध को मैं प्रणाम करता हूँ ।१६३। जिसने कल्प के अवसान के समय में अपने समस्त खुरोंके द्वारा निमेषपात्र में ही संघट्ट करा दिया था और दहन करने वाले तेज से जो अत्यन्त ही भीषण हो गये थे हम उन विश्वात्मक तुरंग का भजन करते हैं ।१६४। जो शंख चक्र-गदा और पद्म को धारण किये हुये हैं और गरुड़ पर अधिरूढ़ है-जिनके वक्षः स्थल में श्रीवत्स का चिह्न है और समस्त जगतों के आदिमूल हैं तथा जिनका वर्ण तमाल के समाल नील है उन भगवान् विष्णु का मैं अपने हृदय में स्तवन करता हूँ ।१६५। जो क्षीर सागर में शेष की विशेष शय्या पर शयन करने वाले हैं और अपने अन्दर स्थित से शोभित मुख वाले हैं जिनके नेत्र विकसित कमल की आभा से समन्वित हैं-जो श्रुतियों के आद्य हैं, उन भगवान् नारायण का मैं बारम्बार स्मरण करता हूँ ।१६६। इस स्तुति के द्वारा जगन्मय जगन्नाथ श्री पुरुषोत्तम को प्रसन्न करना चाहिये । इससे धर्म-काम- अर्थ और मोक्ष प्राप्ति होती है ।१६७।
षोडश पटल ॥ महेश प्रकरण ॥ अथ वक्ष्ये महेशस्य मन्त्रान् सर्वसमृद्धिदान् । यैः पूर्वमृषयः प्राप्ताः शिवतायुज्यमञ्जसा ।१