भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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पृष्ठ 368

३६८ ] [ श्रीशारदा तिलक त्रिः सप्तवारं नृपतीन्निहत्य यस्तर्पणं रक्तमयं पितृभ्यः । चकार दौर्दण्डबलेन सम्यक् तमादिशूरं प्रणमामि भक्त्या ॥१६० कुले रघूणां रमवाप्य जन्म विधाय सेतुं जलधेर्जलान्तः । लङ्केश्वरं यः शमयाञ्चकार सीतापति तं प्रणमामिभक्त्या ॥१६१ हलेन सर्वानसुरान्विकृष्य चकार चूर्ण मुशलप्रहारैः । यः कृष्णमासाद्य बल बलीयान् भक्त्या जजेत बलभद्ररामम् ॥१६२ चार सागरों के आवरण वाली धरित्री जिसके चरणों में न्यास करने के लिए समर्थ नहीं हुई थी, सुरों के पद (स्थान) अन्य एक पद का नहीं था उन भगवान् त्रिविक्रम का जो सर्वगत है उसे मैं स्मरण करता हूँ ॥१५६। जिसने इक्कीस बार राजाओं का निहनन करके पितृ- गण का रक्तमय तर्पण किया था और भलीभाँति अपने महान बल के द्वारा ही किया था उन आदिशूर परशुराम का मैं भक्ति की भावना से स्मरण करता हूँ । अर्थात् प्रणाम करता हूँ ॥१६०. जिसने रघुकुल में जन्म ग्रहण करके समुद्र के जल के अन्दर सेतु बनवाकर लंकेश्वर रावण का शमन किया था, उन भगवान सीता के पति श्रीराम को मैं भक्ति भाव से प्रणाम करता हूँ ॥१६१। जिसने अपने हल के द्वारा समस्त असुरों को खींचकर मुशल के प्रहारों से उनका चूर्ण कर दिया ओर जो श्री कृष्ण के बल को प्राप्त करके बलीयान् थे उन श्री बलभद्र राम का मैं भक्ति से भजन करता हूँ ॥१६२। पुरा पुराणानसरान्विजेतुं सम्भावयन् चोवरचिह्ननेषु । चकार यः शास्त्रमोचकल्पं तं मूलभूतं प्रणताऽस्मि बुद्धम् ॥१६३ कल्पावसाने निखिलैः खुरैः स्वैः संघट्टयामास निमेषमात्रात् । यस्तेजसा निर्दहनातिभामो विश्वात्मकं तुं तुरग भजामः ॥१६४ शंख सुचक्रं सुगदां सरोजं दोर्भिर्दधानं गरुडाधिरूढम् । श्रीवत्सचिह्नं जगदादिमूलं तमालनीलं हृदि विष्णुमीडे ॥१६५ क्षीराम्बधौ शेषविशेषतल्पे शयानमन्तः स्मितशोभिवक्त्रम् । उत्फुल्लनेत्राऽम्बुजमम्बुजाभमाद्यं श्रुतीनामसकृत्स्मरामि ॥१६६