भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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पंचदश पटल ] [ ३६७ जाती है ।१५३। यह पुष्प व.ण का साङ्ग-उपाङ्ग समर्चन कह दिया गया है। यह सौभाग्य-कान्ति-वैभव-दारा-पुत्र और समृद्धि के प्रदान कर ने वाला होता है ।१५४। आदाय वेदाः सकलाः समुद्रान्निहत्यांशङ्खासुरमत्युदग्रम् । दत्ताः पुरः येन पितामहाय विष्णुं तमाद्यं भज मत्स्यरूपम् ।१५५। दिव्यामतार्थं मथिते महाब्धौ देवैरसुरैर्वासुकिमन्दराभ्याम् । भूमेर्महावेगविधूनितायास्तं कूर्ममाधारगतं स्मरामि ।१५६। समुद्रकाञ्ची वसुन्धरा सरिदुत्तरीया मेरुकिरीटभारा । दंष्ट्राग्रतो येन समुद्धृता भूस्तमादिकोलं शरणं प्रपद्ये ।१५७ सक्तातिभङ्गक्षमया धिया यस्तम्भान्तरालादुदितोनृसिंह । रिपुं सुराणां निशितैर्नखाग्रैर्विदारयन्तं नच विस्मरामि ।१५८ अत्यन्त उग्र शंखासुर का निहनन करके सब वेदोंको लाकर जिसने पहले पितामह को दिये थे उन आद्य मत्स्य स्वरूप वाले भगवान् विष्णु का भजन करो ।१५५। देवों और असुरों के द्वारा वासुकि और मन्दरा- चल से दिव्य अमृत की प्राप्तिके लिये महासागर के मथन किए जाने पर महान वेग से विघूर्णित भूमि के आधार में स्थित उन भगवान् कूर्म का मैं स्मरण करता हूँ ।१५६। जिसकी काँची समुद्र है और जिसका उत्तरीय श्रेष्ठ सरिता है-मेरु के किरीट के भार वाली वसुन्धरा को जिसने अपनी दाढ़ के अग्रभाग पर धारण किया था उन आदि कोल (वाराह) की मैं शरणागति में गमन करता हूँ ।१५७। अपने भक्त की पीड़ा के भंग करने में समर्थ श्री से युक्त जो स्तम्भ के अन्तराल से समुदित हुये थे और जो सुरो के शत्रु हिरण्यकशिपु को अपने पैने नखों से विदीर्ण कर रहे थे उन भगवान् नृसिंह कामैं कभी भी विस्मरण नहीं करता हूँ ।१५८। यतुः समुद्राभरणा धारित्री न्यासाय नाल चरणस्य यस्य । एकस्य नान्यस्य पद सुराणां त्रिविक्रमं सर्वगतं स्मरामि ।१५६