शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ
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षोडष पटल ] [ ३६६ प्रणयेदनया स्तुत्या जगन्नाथं जगन्मयम् । धर्मार्थकाममोक्षाणामाप्तये पुरुषोत्तमम् ।१६७ जिसने पुराने असुरों पर विजय प्राप्त करने के लिये चीवर चिह्न डाले वेष की सम्भावनाये करते हुए अमोघ शास्त्र कल्प को किया था उन मूल भूत बुद्ध को मैं प्रणाम करता हूँ ।१६३। जिसने कल्प के अवसान के समय में अपने समस्त खुरोंके द्वारा निमेषपात्र में ही संघट्ट करा दिया था और दहन करने वाले तेज से जो अत्यन्त ही भीषण हो गये थे हम उन विश्वात्मक तुरंग का भजन करते हैं ।१६४। जो शंख चक्र-गदा और पद्म को धारण किये हुये हैं और गरुड़ पर अधिरूढ़ है-जिनके वक्षः स्थल में श्रीवत्स का चिह्न है और समस्त जगतों के आदिमूल हैं तथा जिनका वर्ण तमाल के समाल नील है उन भगवान् विष्णु का मैं अपने हृदय में स्तवन करता हूँ ।१६५। जो क्षीर सागर में शेष की विशेष शय्या पर शयन करने वाले हैं और अपने अन्दर स्थित से शोभित मुख वाले हैं जिनके नेत्र विकसित कमल की आभा से समन्वित हैं-जो श्रुतियों के आद्य हैं, उन भगवान् नारायण का मैं बारम्बार स्मरण करता हूँ ।१६६। इस स्तुति के द्वारा जगन्मय जगन्नाथ श्री पुरुषोत्तम को प्रसन्न करना चाहिये । इससे धर्म-काम- अर्थ और मोक्ष प्राप्ति होती है ।१६७।
षोडश पटल ॥ महेश प्रकरण ॥ अथ वक्ष्ये महेशस्य मन्त्रान् सर्वसमृद्धिदान् । यैः पूर्वमृषयः प्राप्ताः शिवतायुज्यमञ्जसा ।१