भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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पृष्ठ 370

३७० ] [ श्रीशारदा तिलक हृदयं वपरं साक्षि लान्तानतान्वितो मरुत् । पञ्चाक्षरोमनुः प्रोक्तस्ताराद्योऽयं षडक्षरः । २ वामदेवो मुनिश्चन्दः पंक्तिरीशोऽस्य देवता ।। षड्भिर्वर्णैः षडङ्गानि कुर्यान्मन्त्रस्य देशिकः । ३ मन्त्रवर्णादिकान्यस्येत्पञ्चमूर्त्तियथाक्रमम् । तर्जनीमध्ययोरन्त्या नामिकाऽङ्गुष्ठकं पुनः ।४ ताः स्युस्तत्पुरुषाघोरसद्यवामेशसञ्जकाः । वक्त्रहृत्पादगुह्येषु निजमूर्द्धनि ताः पुनः :५ इसके अनन्तर सब समृद्धियों के प्रदार करने वाले भगवान् महेश मन्त्रों को बतलाया जायेगा जिनके द्वारा पहिले ऋषियों ने तुरन्त ही भगवान् शिव के सायुज्य की प्राप्ति करली थी ।१। अब मन्त्र का उद्धार बताया जाता है—हृदयं—नमः यह पद । वपरं—शः, साक्षि—— हकारयुक्त शि । लान्त – वः, अनन्त—आ, तदन्वित—वा, मरुत्—यः, यह पाँच अक्षरों वाला मन्त्र कहा गया है। इसके आदि में प्रणव (ॐ) है अतएव यह षट् अक्षरों वाला है ।२। इसका ऋषि वामदेव है और छन्द पंक्ति और ईश इसका देवता आचार्य को चाहिये कि छै वर्णों से इसके षट् अङ्गों को करे ।३। पाँच मूर्त्त वर्णादिक को यथाक्रम न्यास करे । तर्जनी, मध्यमा, कनिष्ठिका, अनामिका और अंगुष्ठ में करे । वे मूर्त्तियाँ तत्पुरुष, अघोर, सद्यो जात। वामदेव और ईशान संज्ञा वाले हैं मुख, हृदय, पाद गुह्य और अपने मूर्धा में न्यास करे ।४-५। प्राग्याम्यवारुणोदीच्यमध्यवक्त्रेषु पञ्चसु । मन्त्राङ्गानि न्यसेत्पश्चाज्जातियुक्तानि षट्क्रमात् ।६ कुर्वीत गोलकन्यास रक्षायै तदनन्तरम् । हृदि वक्त्रांसयोरूर्वोः कण्ठे नाभौ द्विपाश्र्वके ।७ पृष्ठे हृदि ततो मूर्द्धिन वदने नेत्रयोर्नसोः । दोः पत्सन्धिषु साग्रेषु नित्यसेत्तदनन्तरम् ।८