शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
३६८ ] [ श्रीशारदा तिलक त्रिः सप्तवारं नृपतीन्निहत्य यस्तर्पणं रक्तमयं पितृभ्यः । चकार दौर्दण्डबलेन सम्यक् तमादिशूरं प्रणमामि भक्त्या ॥१६० कुले रघूणां रमवाप्य जन्म विधाय सेतुं जलधेर्जलान्तः । लङ्केश्वरं यः शमयाञ्चकार सीतापति तं प्रणमामिभक्त्या ॥१६१ हलेन सर्वानसुरान्विकृष्य चकार चूर्ण मुशलप्रहारैः । यः कृष्णमासाद्य बल बलीयान् भक्त्या जजेत बलभद्ररामम् ॥१६२ चार सागरों के आवरण वाली धरित्री जिसके चरणों में न्यास करने के लिए समर्थ नहीं हुई थी, सुरों के पद (स्थान) अन्य एक पद का नहीं था उन भगवान् त्रिविक्रम का जो सर्वगत है उसे मैं स्मरण करता हूँ ॥१५६। जिसने इक्कीस बार राजाओं का निहनन करके पितृ- गण का रक्तमय तर्पण किया था और भलीभाँति अपने महान बल के द्वारा ही किया था उन आदिशूर परशुराम का मैं भक्ति की भावना से स्मरण करता हूँ । अर्थात् प्रणाम करता हूँ ॥१६०. जिसने रघुकुल में जन्म ग्रहण करके समुद्र के जल के अन्दर सेतु बनवाकर लंकेश्वर रावण का शमन किया था, उन भगवान सीता के पति श्रीराम को मैं भक्ति भाव से प्रणाम करता हूँ ॥१६१। जिसने अपने हल के द्वारा समस्त असुरों को खींचकर मुशल के प्रहारों से उनका चूर्ण कर दिया ओर जो श्री कृष्ण के बल को प्राप्त करके बलीयान् थे उन श्री बलभद्र राम का मैं भक्ति से भजन करता हूँ ॥१६२। पुरा पुराणानसरान्विजेतुं सम्भावयन् चोवरचिह्ननेषु । चकार यः शास्त्रमोचकल्पं तं मूलभूतं प्रणताऽस्मि बुद्धम् ॥१६३ कल्पावसाने निखिलैः खुरैः स्वैः संघट्टयामास निमेषमात्रात् । यस्तेजसा निर्दहनातिभामो विश्वात्मकं तुं तुरग भजामः ॥१६४ शंख सुचक्रं सुगदां सरोजं दोर्भिर्दधानं गरुडाधिरूढम् । श्रीवत्सचिह्नं जगदादिमूलं तमालनीलं हृदि विष्णुमीडे ॥१६५ क्षीराम्बधौ शेषविशेषतल्पे शयानमन्तः स्मितशोभिवक्त्रम् । उत्फुल्लनेत्राऽम्बुजमम्बुजाभमाद्यं श्रुतीनामसकृत्स्मरामि ॥१६६
षोडष पटल ] [ ३६६ प्रणयेदनया स्तुत्या जगन्नाथं जगन्मयम् । धर्मार्थकाममोक्षाणामाप्तये पुरुषोत्तमम् ।१६७ जिसने पुराने असुरों पर विजय प्राप्त करने के लिये चीवर चिह्न डाले वेष की सम्भावनाये करते हुए अमोघ शास्त्र कल्प को किया था उन मूल भूत बुद्ध को मैं प्रणाम करता हूँ ।१६३। जिसने कल्प के अवसान के समय में अपने समस्त खुरोंके द्वारा निमेषपात्र में ही संघट्ट करा दिया था और दहन करने वाले तेज से जो अत्यन्त ही भीषण हो गये थे हम उन विश्वात्मक तुरंग का भजन करते हैं ।१६४। जो शंख चक्र-गदा और पद्म को धारण किये हुये हैं और गरुड़ पर अधिरूढ़ है-जिनके वक्षः स्थल में श्रीवत्स का चिह्न है और समस्त जगतों के आदिमूल हैं तथा जिनका वर्ण तमाल के समाल नील है उन भगवान् विष्णु का मैं अपने हृदय में स्तवन करता हूँ ।१६५। जो क्षीर सागर में शेष की विशेष शय्या पर शयन करने वाले हैं और अपने अन्दर स्थित से शोभित मुख वाले हैं जिनके नेत्र विकसित कमल की आभा से समन्वित हैं-जो श्रुतियों के आद्य हैं, उन भगवान् नारायण का मैं बारम्बार स्मरण करता हूँ ।१६६। इस स्तुति के द्वारा जगन्मय जगन्नाथ श्री पुरुषोत्तम को प्रसन्न करना चाहिये । इससे धर्म-काम- अर्थ और मोक्ष प्राप्ति होती है ।१६७।
षोडश पटल ॥ महेश प्रकरण ॥ अथ वक्ष्ये महेशस्य मन्त्रान् सर्वसमृद्धिदान् । यैः पूर्वमृषयः प्राप्ताः शिवतायुज्यमञ्जसा ।१
३७० ] [ श्रीशारदा तिलक हृदयं वपरं साक्षि लान्तानतान्वितो मरुत् । पञ्चाक्षरोमनुः प्रोक्तस्ताराद्योऽयं षडक्षरः । २ वामदेवो मुनिश्चन्दः पंक्तिरीशोऽस्य देवता ।। षड्भिर्वर्णैः षडङ्गानि कुर्यान्मन्त्रस्य देशिकः । ३ मन्त्रवर्णादिकान्यस्येत्पञ्चमूर्त्तियथाक्रमम् । तर्जनीमध्ययोरन्त्या नामिकाऽङ्गुष्ठकं पुनः ।४ ताः स्युस्तत्पुरुषाघोरसद्यवामेशसञ्जकाः । वक्त्रहृत्पादगुह्येषु निजमूर्द्धनि ताः पुनः :५ इसके अनन्तर सब समृद्धियों के प्रदार करने वाले भगवान् महेश मन्त्रों को बतलाया जायेगा जिनके द्वारा पहिले ऋषियों ने तुरन्त ही भगवान् शिव के सायुज्य की प्राप्ति करली थी ।१। अब मन्त्र का उद्धार बताया जाता है—हृदयं—नमः यह पद । वपरं—शः, साक्षि—— हकारयुक्त शि । लान्त – वः, अनन्त—आ, तदन्वित—वा, मरुत्—यः, यह पाँच अक्षरों वाला मन्त्र कहा गया है। इसके आदि में प्रणव (ॐ) है अतएव यह षट् अक्षरों वाला है ।२। इसका ऋषि वामदेव है और छन्द पंक्ति और ईश इसका देवता आचार्य को चाहिये कि छै वर्णों से इसके षट् अङ्गों को करे ।३। पाँच मूर्त्त वर्णादिक को यथाक्रम न्यास करे । तर्जनी, मध्यमा, कनिष्ठिका, अनामिका और अंगुष्ठ में करे । वे मूर्त्तियाँ तत्पुरुष, अघोर, सद्यो जात। वामदेव और ईशान संज्ञा वाले हैं मुख, हृदय, पाद गुह्य और अपने मूर्धा में न्यास करे ।४-५। प्राग्याम्यवारुणोदीच्यमध्यवक्त्रेषु पञ्चसु । मन्त्राङ्गानि न्यसेत्पश्चाज्जातियुक्तानि षट्क्रमात् ।६ कुर्वीत गोलकन्यास रक्षायै तदनन्तरम् । हृदि वक्त्रांसयोरूर्वोः कण्ठे नाभौ द्विपाश्र्वके ।७ पृष्ठे हृदि ततो मूर्द्धिन वदने नेत्रयोर्नसोः । दोः पत्सन्धिषु साग्रेषु नित्यसेत्तदनन्तरम् ।८
षोडष पटल ] [ ३७१ शिरोवदनहृत्कुक्षि सोरुपादद्वये पुनः । हृदि वक्त्राम्बुजे टङ्कमृगाभयवरेष्वथ ।६ वक्त्रांसहृत्सु पादोरुजठरेषु क्रमान्न्यसेत् । मूलमन्त्रस्य षड्वर्णांन्यथावद्देशिकोत्तमः ।१० मूर्ध्नि भालादरांसेषु हृदये ताः पुनर्न्यसेत् । पश्चादनेन मन्त्रेण कुर्वीत व्यापकं सुधीः ।११ नमोऽस्तु स्थाणुरूपायज्योतिर्लिङ्गामृतात्मने । चतुर्मूत्तिवपुश्छायाभासिताङ्गाय शम्भवे ।१२ एव न्यस्तशरीराऽसौ चिन्तयेत्पार्वतीपतिम् ।१३ ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचन्द्रावतंसम् । रत्नाकल्पोज्ज्वलाङ्गं परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम् ।। पद्मासीनं समन्तात् स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानम् । विश्वाद्यं विश्वरूपनिखिभयहरलं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रम् ।१४ पूर्व, याम्य, वरुण, उत्तर और मध्य वक्त्र पत्रों में मन्त्र के अङ्गों का न्यास करना चाहिए। पीछे जाति युक्तों को षट् क्रम से न्यास करे । उसके अनन्तर रक्षा के लिये गोलक न्यास करना चाहिए इसके अनन्तर हृदय में--मुख, अंसों में दोनों उरुओं में, कण्ठ में नाभि में, दोनों पार्श्वों में-बाहुओं में-पदों में और साग्र सन्धियों में विन्यास करे ।६-८। शिर, मुख, हृदय, कुक्षि, दोनों उरु, दानों पाद, मुख कमल, टंक ( परशु ) -मृग, अभय, वर, वक्त्र, अस जठर में क्रम से न्यास करना चाहिए । उत्तम आचार्य को चाहिये कि वह मूल मन्त्र के छै वर्णों को रीत्यानुसार उनका मूर्धा, भाल, उदर--अंस और हृदय में पुनः न्यास करे । पीछे इस मन्त्र के द्वारा सुधी पुरुष व्यापक न्यास करे ।६-११। स्थाणु रूपाय ज्योतिर्लिङ्गा- मृतात्मने चतुर्मूत्ति वपुश्छाया भासिताङ्गाय शम्भवे नमः । इस प्रकार से शरीर में न्यास करने वाला यह पार्वती के स्वामी का ध्यान करना चाहिये ।१२-१३। अब ध्यान बतलाया जाता है-चाँदी
३७२ ] [ श्रीशारदा तिलक के पर्वत के समान सुन्दर, चन्द्र के भूषण से संयुत, रत्नों के आकल्पों से उज्ज्वल अङ्ग वाले-कर कमलों में परशु, मृग, वरदान और अभय- दान धारण किए-प्रसन्न-पद्म के आसन पर विराजमान-चारों ओर से अमर गणों के द्वारा स्तवन किये गये-व्याघ्र के चर्म को धारण करने वाले विश्व के आद्य, विश्व के स्वरूप वाले, सम्पूर्ण भय को हरण करने वाले, पाँच मुखों से समन्वित, तीन नेत्रों से युक्त-महेश का नित्य ध्यान करना चाहिए।१४। तत्त्वलक्षं जपेन्मन्त्रं दीक्षितः शैववर्त्मना । तावत्संख्यासहस्राणि जुहुयात्पायसैः शुभैः ।१५ ततः सिद्धो भवेन्मन्त्रः साधकाभीष्टसिद्धिदः । देवं संपूजयेत्पीठेवामादिनव शक्तिके ।१६ वामा ज्येष्ठा ततोरौद्री काली कलपदादिका । विकरिण्याह्वया प्रोक्ता शलाद्याविकरिण्यथ ।१७ बलप्रमथनी पश्चात्सर्वभूतदमन्त्यथ । मनोन्मनीति संप्रोक्ताः शैवपीठस शक्तयः ।१८ मनो भगवते पश्चात्सकलादिवदेत्पुनः । गुणात्मशक्तियुक्ताय ततोऽनन्ताय तत्परम् ।१६ योगपीठात्मने भूयो नमस्तारादिको मनुः । अमुना मनुना दद्यादासनं गिरिजापतेः ।२० इस दन्त्र का चौबीस लाख जप शिव के मार्ग से दीक्षित होकर करे। उतने ही सहस्र संख्या में शुभ पायस से हवन करना चाहिये ।१५। इसके अनन्तर मन्त्र सिद्धहो जाता है और यह साधना करने वाले साधक के अभीष्टों की सिद्धि का प्रदान करने वाला है। वामादि नौ शक्तियों से समन्वित पीठ में देव का भली-भाँति पूजन करना चाहिये ।१६। वामा, ज्येष्ठा, रौद्री, काली, कलपदा, विकरिणी, आह्वया वलाद्या, अविकरिणी, बलप्रमथनी, सर्वभूतदमनी, मनोन्मनी, ये शैव पीठ की शक्तियां हैं ।१७-१८। अब मन्त्र का उद्धार बताया जाता
षोडष पटल ] [ ३७३ है- 'नमोभगवते - सकलगुणात्मशक्तियुक्ताय - अनन्ताययोगपीठात्मने नमः'। इसके आदि में प्रणव होता है। इस मन्त्र के द्वारा गिरिजापति देव को आसन अर्पित करना चाहिए ।१६-२०। मूत्ति मूलेन संकल्प्य तत्रावाह्य यजेच्छिवम् । कर्णिकायां यगेन्मूर्ती रोशमीशानदिग्गतम् ।२१ शुद्धस्फटिकसंकाश दिक्षु तत्पुषादिकाः । पीताञ्जश्वेतरक्ताः प्रधानसदृशायुधाः ।२२ चतुर्वक्त्रसमायुक्ता यथावत्यंप्रपूजयेत् । कोणेष्वर्च्यः निवृत्याद्यास्तेजोरूपाः कलाः क्रमात् ।२३ अङ्गानि केसरस्थानि विघ्नेशान्पत्रगान्यजेत् । अनन्तं सूक्ष्मनामानं शिवोत्तममनन्तरम् ।२४ एकनेत्रमकरुद्रं त्रिमूत्ति (नेत्रं) तदनन्तरम् । पश्चाच्छ्रीकण्ठनामान शिखण्डिनमनन्तरम् ।२५ रक्तपीतसितारक्तकृष्णरक्ताञ्जनासितम् किरीटापितवालेन्दुपद्मस्थान् भूषणान्वितान् ।२६ त्रिनेत्रात् शूलवज्रास्त्रचापसस्तान्मनोहरान् । उत्तरादि यजेत्पश्चादुमा चण्डेश्वरं पुनः ।२७ मूल मन्त्र के द्वारा मूत्ति की कल्पना करके वहां पर अर्थात् उस मूत्तिमें आवाहन करके भगवान् शिवका अभ्यर्चन करना चाहिये। कर्णिका में मूर्तियों का यजन करे। ईशान दिशा में संस्थित ईश का यजन करे ।२१। ईश देव शुद्ध स्फटिक मणि के सदृश हैं। दिशाओं में तत्पुरुष आदि का पूजन करना चाहिए। ये वर्णों में पीत, अञ्जन, श्वेत और रक्त है और प्रधान सदृश इनके आयुध हैं-इन सबके चार मुख हैं। इन सबका यथा रीति से अभ्यर्चन करना चाहिए। कोणों में जो तेजोरूपा निवृत्ति आदि कलाओं का क्रम से पूजन करे ।२२-२३। केसरों में संस्थित अंगों का तथा पत्रों में विराजमान विघ्नेश्वरों का यजन करे। अनन्त, सूक्ष्मनामा, शिवोत्तत, एकनेत्र, एकरुद्र त्रिमूत्ति-
१७४ ] [ श्रीशारदा तिलक श्रीकण्ठ नाम वाले—शिखंडी का पूजन करे ।२४-२५। इनका वर्णं, रक्त, पीत, सित, आरक्त, कृष्णरक्त, अञ्जन, और असित है । ये सब अपने किरीटों में बालेन्दु को अर्पित किये हुए है--सभी पद्मों के आसनों पर विराजमान है और सब भूषणों से विभूषित है ।२५-२६। ये सभी तीन नेत्रों से समन्वित हैं और शूल, वज्र, अस्त्र, चार हाथों में धारण किये हुये हैं----मनोहर हैं । उत्तरादि में पीछे उमामहेश्वर का पुनः यजन करना चाहिए ।२७। ततो नन्दिमहाकालौ गणेशदृषभो पुनः । अथ भृङ्गिरिटि स्कन्दमेतान्मृग्मासनस्थितान् ।२८ स्वर्णतोयारुणश्याममुक्तेन्दुसितपाटलान् । इन्द्रादयस्ततः पूज्या वज्राद्यायुधसंयुताः ।२६ इत्थ संपूज्योद्देशं नित्यशो जयते । सर्वपापविनिर्मुक्तः प्राप्नुयाद्वाञ्छिता श्रियम् ।३० द्विसहस्रं जपेद्रोगात्मुच्यते नात्र संशयः । त्रिसहस्रं जपेन्मन्त्रं दीर्घमायुरवाप्नुयान् ।३१ सहस्रत्रद्वया प्रजपन् सर्वान् कामानवाप्नुयान् । आज्यान्वितैस्तिलैः शृद्धैर्जुहुयाल्लक्षमादरात् ।३२ उत्पातज्जनितान् क्लेशान्नाशयेन्नात्र संशयः । शतलक्षं जपेत्साक्षाच्छिवोभवति मानवः ।३३ इसके अनन्तर नन्दी और महाकाल, गणेश और वृषभ, भृङ्गी, रिटि, स्कन्द को पूजित करे । ये सब पद्म के आसनों पर संस्थित हैं ।२८। ये सब स्वर्णतोय, अरुण, श्याममुक्ता, इन्दु, सित और पाटल वर्णों वाले है । इसके अनन्तर इन्द्र देव आदि का जोकि वज्र आदि आयुधों से समन्वित है अर्चन करना चाहिये ।२६। इस रीति से देव का भली भांति अर्चन करे और नित्य ही सहस्र मन्त्र का जप करना चाहिए । ऐसे करने वाले पुरुष सभी पापों निर्मुक्त हो जाया करते हैं और ये अपनी मनोवांछित श्री की प्राप्ति कर लिया करते हैं ।३०।
षोडष पटल ] [ ३७५ दो सहस्र मन्त्र का नित्य जप करे तो मनुष्य रोग से मुक्त हो जाता है--इसमें कुछ भी संशय नहीं है। तीन सहस्र यदि नित्य मन्त्र का जप करे तो जप करने वाला मानव दीर्घ आयु का लाभ प्राप्त किया करता है ।३१। इसी रीति से एक सहस्र की नित्य वृद्धि करने वाला पुरुष सभी कामनाओं को प्राप्त कर लिया करता है। शुद्ध आज्य से समन्वित तिलों से आदर के साथ एक लाख आहुतियाँ देवे तो उत्पातों से समु- त्पन्न क्लेशों का विनाश किया करता है--इसमें कुछ भी संशय नहीं है। वह शिव ही हो जाया करता है । ३२-३३। षडक्षरः शक्तिरुद्धः कथितोऽष्टाक्षरो मनुः । ऋषिश्छन्दः पुराप्रोक्तं देवता स्यादुमापतिः ।३४ अङ्गानि पूर्वमुक्तानि सोममीशं विचिन्तयेत् ।३५ बन्धूकाभं त्रिनेत्रं शशिशकलधरं स्मेरवक्त्रं वहन्तम् । हस्तैः शूलं कपालं वरदमभयदं चारुहारं भजामि । वामोरुस्तम्भगायाः करतलविलसच्चारुरक्तोत्पलायः । हस्तेनाश्लिष्ठदेहं मणिमयविलसद्भूषणायाः प्रियायाः ।३६ शक्ति से सम्पुटित षडक्षर 'अष्टाक्षर मन्त्र' कहा गया है इस मन्त्र के ऋषि और छन्द पहिले ही कहे हुए हैं। इसका देवता भगवान् उमापति है। इसके अङ्ग पूर्वमें कहे गये हैं। सोम और ईश का चिन्तन करना चाहिए ।३४-३५। अब ध्यान बतलाया जाता है । इसी के अनुसार देव के स्वरूप का चिन्तन करना चाहिए । ध्यान---बन्धूक के पुष्प के समान आभा से संयुत हैं---तीन नेत्रों से संयुत है-मस्तक में चन्द्रमा के खण्ड को धारण किए हुए हैं--मन्दस्मित से युक्त मुख वाले हैं--हाथों में शूल, कपाल, वरदान अभयदान धारण करने वाले हैं--सुन्दर हार से शोभित को मैं प्रणाम करता हूँ ।३५। आपके बाँये उरुस्तम्भ पर विराजमान और करतल में शोभित एवं सुन्दर रक्तोत्पल को लिए हुई है ऐसी प्रियतमा को, जो मणिमय कान्तियुक्त
३७६ ] [ श्रीशारदा तिलक भूषणों से भूषित हैं, अपने कर से देहार्लिंगन करने वाले देव का ध्यान करे ।३६। मनुलक्षां जपेन्मन्त्रं तत्सहस्र यथाविधि । जुहुयान्मधुरासिक्तैरारग्वधसमिद्वरैः ।३७ प्राक् प्रोक्ते पूजयेत्पीठे गन्धपुत्पैरूमापतिम् । अङ्गाबृत्तैर्बहिः पूज्या हृल्लेखाःद्या यथापुरा । मध्यप्राग्दक्षिणोदीच्यपश्चिमेषु विधानतः । हृल्लेखा गगना रक्ता चतुर्थी तु करालिका । ३८ महोच्छुवा क्रमादेताः पंचभूतसमप्रभाः । पाशांकुशवराभीतिधारिण्योऽमित्तभूषणाः ।३६ यजेत्पूर्वादिपत्रेषु वृषभाद्याननुक्रमात् । हिमालयाभं वृषभं तीक्ष्णशृङ्ग त्रिलोचनम् ।४० सर्वाभरणसंदीप्तं साक्षाच्छब्दस्वरूपिणाम् । कपालशूलबिलसत्करं कालधनप्रभम् ।४२ इस मन्त्र का एक लक्ष जप करे और दशांश विधि के अनुसार मधुरों में आसिक्त आरग्वध की श्रेष्ठ समिधाओं से हवन करना चाहिये ।३७। पूर्व में कहे हुये पीठ पर गन्ध पुष्पादि के द्वारा उमापति का पूजन करे। पूर्व की भाँति अंग वृतों के द्वारा हृल्लेखा आदि का बाहर पूजन करना चाहिए। मध्य-पूर्व-दक्षिणा--उत्तर-- पश्चिम में विधान के साथ पूजन करे। हृल्लेखा--गगना--रक्ता--करा- लिका-महोच्छुत्रा का क्रम से यजन करे। ये सब पाँच भूतों की प्रभा के तुल्य प्रभा वाली हैं। ये सब पाश ०।कुश-वरदान--अभयदान की धारण करने वाली है और समित भूषण वाली है ।३८-३। पूर्वादि पत्रों में अनुक्रम से वृषभादि का यजन करना चाहिये। वृषभ हिमालय के समान आभासे संयुक्त है, उसके तीक्ष्ण शृङ्ग हैं और तीन लोचनोंवाला है ।४०। समस्त आभरणों से श्रेष्ठ दीप्तिमान्--साक्षात् शब्द के स्वरूप वाले हैं। कमल और शूल से कर शोभित है और कामदेव के तुल्य
षोडष पटल ] [ ३७७ प्रभा से युक्त हैं ॥४१॥ ऐसे तीन नेत्रधारी और दिगम्बर (नग्न) क्षेत्र- पाल का अर्चन करे ।४२। क्षेत्रपालं त्रिनयनं दिगम्बरमथार्चयेत् । शूलटङ्काक्षवलयक्रमण्डलूल्लसत्करम् ।४३ रक्ताकारं त्रिनयनं चण्डेशमथ पजयेत् । चक्रशंखभयाभीष्टकरां मरकतप्रभाम् ।४४ दुर्गा प्रपूजयेत्सौम्यां त्रिनेत्रां चारुभूषणाम् । कल्पशाखा रत्नघण्टां दधानं द्वादशेक्षणम् ।४५ बालार्कभं शिशुं कान्तं षण्मुख पूजयेत्ततः । नन्दिनं पूजयेत्सौम्यं रत्नभूषणमण्डितम् ।४६ परश्वेणवराभीतिप्रारिणं श्यामविग्रहम् । पाशांकुशवराभीष्टधारिणं कुंकुमप्रभम् ।४७ विघ्ननायकमभ्यर्च्यच्चन्द्रार्द्ध कृत्तशेखरम् । श्यामरक्तोत्पलकरं बामाङ्गन्यस्ततत्करम् ।४८ त्रिनेत्रं रक्तावस्त्राढ्यं सेनापतिमर्चयेत् । ततोष्टमातरः पूज्या ब्राह्मयाद्याः प्रोक्तलक्षणाः ।४६ त्रिशूल-टङ्क-अक्षवलय--और कमण्डल से सुशोभित करो वाले ।४३। रक्त वर्ण से युक्त आकार वाले तीन नेत्रों को धारण किये हुए चण्डेश का पूजन करे । शंख, चक्र, अभय और अभीष्ट को करों में धारिणी--मरकतमणि की प्रभा से समन्वित--तीन नयनों वाली तथा मनोहर भूषणों से विभूषिता सौम्य स्वरूप वाली दुर्गा का अभ्यर्चन करना चाहिए । कल्प शाखा अर्थात् कल्प वृक्षकी डाली और रत्न घण्टा को धारण करने काले बारह नेत्रों से युक्त, बालार्क सूर्यके समान आभा वाले-परम कान्त शिशु षण्मुखका इसके अनन्तर अर्चन करना चाहिए । परम सौम्य और रक्त वर्ण के भूषणों से भूषित नन्दी का यजन करे । ।४६। परशु--वर--अभीति के धारी--कुंकुम के समान प्रभा से युक्त तथा अर्ध चन्द्रसे अपना मुकुट बनाये हुए भगवान् विघ्न नायक
३७८ ] [ श्रीशारदा तिलक का अभ्यर्चन करे । श्याम--रक्त उत्पल को कर में लिये हुये--उस कर को वामाङ्ग में न्यस्त करने वाले--तीन नेत्रों से युक्त तथा रक्त वर्णं के वस्त्रों से आवृत उमापति का अर्चन करना चाहिए । वहाँ पर ब्रह्माणी आदि आठ माताओं का पूजन करे जिनके लक्षण बताये जा चुके हैं ।४७-४६। इन्द्रादिकांल्लोकपालान् स्वस्वदिक्षु समर्चयेत् । वज्रादीनि तदस्त्राणि तद्बहिः क्रमशोऽर्चयेत् ।५० एव योभजते मन्त्री देवेश तमुमापतिम् । स भवेत्सर्वलोकानां प्रियः सौभाग्यसम्पदाम् ।५१ सान्तःसद्यान्तसंयु क्तो बिन्दुभूषितमस्तकः । षड्दीर्घयुक्तवीजेन षडङ्गविधिरीरितः । वामदेवो मुनिश्चन्दः पँक्तिदेवः सदाशिवः ।५३ ईशानादीर्घ्यं सेन्मूर्त्तिरङ्गुष्ठादिषु देशिकः । ईशानाख्यं तत्पुरुषमघोर तदनन्तरम् ।५४ वामदेवाह्वायं सद्यमासां वीजं क्रमाद्विदुः । ओकाराद्यैः पञ्चह्रस्वैर्विलोमात्संयु त वियत् ।५५ तत्तदङ्ग॰ लिभिर्भू यस्तत्तद्वीजादिकान्यसेत् । शिरोवदनहृद्गुह्यपादशेषे यथाक्रमम् ।५६ ऊर्ध्वप्राग्दक्षिणोदीच्यपश्चिमेषु मुखेषु ताः । ततः प्रविन्धसेद्विद्वानष्टत्रिंशत्कलास्तनौ ।५७ इन्द्र देव आदि लोकपालों का अपनी-अपनी दिशाओं में समर्चन करे । वज्र आदि जो उनके आयुध हैं उनके बाहर उनका क्रम से पूजन करना चाहिए । जो मन्त्र के धारण करने वाला पुरुष इस प्रकार से देवेश्वर उमापति का सेवन किया करता है वह पुरुष सब लोकों का प्रिय और सौभाग्य--सम्पदाओं का स्थान हों जाया करता है ।५१। अब प्रसाद मन्त्र को उद्धार के सहित बताया जाता है--सान्त--हः,
षोडष पटल ] [ ३७६ सद्यान्त--औ, इससे संयुक्त हो और मस्तक में बिन्दु अर्थात् अनुस्वार से भूषित होवे । यह प्रासाद नाम वाला मन्त्र कहा गया है जो सेवन करने वालोंको सब सिद्धियाँ प्रदान करने वाला होता है । ५२। षडगदीर्घ युक्त बीज के द्वारा इस मन्त्र की षडङ्ग विधि कही गयी है । इस मन्त्र का ऋषि वाम देव हैं और छन्द पंक्ति कहा गया है । देव इसका सदा- शिव होते हैं । ५३। ईशानादि मूर्तियों का अंगुष्ठ आदि में न्यास करे । ईशान नामक, तत्पुरुष, अघोर--वामदेव और सद्य इन मूर्तियों के बीज क्रम से जान लेने चहिये । ओंकार आदि पाँच ह्रस्वों से विलोम से संयुत विप्त् को उस-उस अंगुलियों से फिर उन-उन बीजादि का न्यास करना चाहिये । शिर, मुख, हृदय, गुह्य, पाद, शेष में क्रम के अनुसार न्यास करे । ऊर्ध्व, पूर्व, दक्षिण, उत्तर, पश्चिम में मुखों में उनका विद्वान् फिर तनु में अड़तीस कलाओं का विन्यास करे । ५ -५७। ईशानाद्या ऋचः सम्यगंगुलीषु यथाक्रमम् । द्यङ्गुष्ठादिकनिष्ठान्तां न्यसेद्देशिकसत्तम । ५८ मूर्द्धास्यहृदयाम्भोजगुह्यपादेषु ता पुनः । वक्त्रैषूद्द्वादिष न्यस्येदभूयोऽङ्गानि प्रकल्पयेत् ५६ तारपञ्चकमुच्चार्यसर्वज्ञाय हृदीरितम् । अमृते तेजोमालिनि तृप्तायेति पदं पुनः । ६० तदन्ते ब्रह्मशिरसे शिरोऽङ्गं ज्वलितं ततः । शिखि शिखाय परतोऽनादिबोधाय तच्छिखा । ६१ वज्रिणे वज्रहस्ताय स्वतन्त्राय तनुच्छतम् । मौं वौ हौंमिति संभाष्य पुरतोऽलुप्तशक्तये । ६२ नेत्रमुक्तं श्लींपशूहूँ फडन्तेऽनन्तशक्तये । अस्त्रमुक्तं षडंगानि कुर्याद्देशिकसत्तमः । ६३ श्रेष्ठ आचार्य को चाहिए कि वह ईशा नाद्य ऋचाओं का भली भांति क्रम के अनुसार अंगुष्ठ से आदि लेकर कनिष्ठिका के अन्त पर्यन्त
३८० ] [ श्रीशारदा तिलक न्यास करे ।५८। मूर्द्धा, मुख, हृदय, गुह्य, पाद में उनका पुनः ऊर्ध्वादि वक्त्रोंमें न्यास करे । फिर अंगोंकी कल्पना करनी चाहिए । तार पंचक का समुच्चारण करके सर्वज्ञायःयह हृदय कहा गया है । फिर मृते तेजो मालिनि तृप्ताह--'यह पद कहे उसके अन्त में 'ब्रह्म शिर से' शिर है 'अंग ज्वलित शिख शिखाय' इसके आगे 'अनादि बोधाय' यह उसकी शिखा है ।५६-६१। 'वज्रिणे वज्रहस्ताय स्वतन्त्राय'-यह तनुच्छदहै। सौ वौं ह्रौं--यह कहकर आगे 'अलुप्त शक्तये नेत्र' कहा गया है । 'श्लीं पशु हूँ फट्' और अन्त में 'अनन्त शक्तये'--यह अस्त्र बताया गया है । इस प्रकार श्रेष्ठ विधि से षडंगों को करे ।६२-६३। पूर्वदक्षिणपाश्चात्यसोममध्येपु पंचसु । वक्त्रेषु पञ्च विन्यस्येदीशानस्य कलाः क्रमात् ।६४ ईशानः सर्वविद्यानां शशिनी प्रथमा कला । ईश्वरः सर्वभूतानामङ्गदा तदनन्तरम् ।६५ ब्रह्माधिपतिशब्दते ब्रह्मणोऽधिपतिः पुनः । ब्रह्मेष्टदा तृतीया स्याच्छिवी में अस्तुतत्परः ।६६ मरीचिः कथितस्तन्त्वे चतुर्थी च सदाशिवोम् । अंशुमालिन्यथपरा प्रणवाद्या नमोऽन्विताः ।६७ पूर्वपश्चिमयाम्योदग्वक्त्रे षु तदन्तरम् । चतस्रो विन्यसेन्मन्त्री पुरुषस्य कलाः क्रमात् ।६८ पूर्व, दक्षिण, पश्चिम, सोम के मध्यों में पाँच वक्त्रों में ईशान की कलाओं का क्रम में विन्यास करना चाहिए ।६४। ईशान सब विद्याओं की शशिनी प्रथमा कला है। सब भूतों का अंगदा इसके अनन्तर में है । 'ब्रह्माधिपति, शब्दके अन्तसे ब्रह्माका अधिपति यह ब्रह्मेष्टदा तीसरी कला होती है । 'शिवो में अस्तु त्पर मरीचि मन्त्र में कहा गया है। यह चौथी सदा शिवी कला होती है । 'अंशुमालिनी' अन्य कला है जिनके आदि में प्रणव तथा अन्त नमः--इस में समन्वित है ।६४-६५। इसके
षोडष पटल ] [ ३८१ अनन्तर पूर्व पश्चिम दक्षिण उत्तर में रहने वाले मुखों में पुरुष की चारों कलाओं का मन्त्रधारी पुरुष विन्यास करे ।६८। आद्या तत्पुरुषायेति विद्महे शान्तिरीरिता । महादेवाय शब्दान्ते धीमहि स्यात्ततःपरम् ।६६। विद्या द्वितीया कथिता तन्नो रुद्रः पदं ततः । प्रतिष्ठा कथिता पश्चात्त्ृतीया स्यात्प्रचोदयात् ।७० निवृत्तिस्तत्पराः सर्वाः प्रणवाद्या नमोऽन्विताः । हृद्ग्रीवांसद्वयेनाभौ कुक्षौ पुच्छेऽथ वक्षसि ।७१ अघोरस्य कला न्यस्येदष्टौ मन्त्री यथाविधि । अघोरेभ्यस्तथा पूर्वमीरिता प्रथमा कला ।७२ अवघोरेभ्य इत्यन्ते मोहा स्यात्तदनन्तरम् । घोरान्ते स्यात्क्षमा पश्चात्त्ृतीया परिकीर्तिता ।७३ घोरतरेभ्यो निद्रा स्यात्सर्वतः सर्वतत्परा । व्याधिस्तु पञ्चमी प्रोक्ता सर्वेभ्यस्तदनन्तरम् ।७४ मृत्युर्निगादिता षष्ठी नमस्ते अस्तु तत्परम् , क्षुधा स्यात्सप्तमी रुद्ररूपेभ्यः कथिता तृषा ।७५ अष्टमी कथिता एतद् ध्रुवाद्या नमसाऽन्विताः । गुह्यमुष्कोरुयुग्मेषु जानुजंघायुगे स्फिचो. ।७६ आद्या तत्पुरुषाय यह है । विद्महे शान्ति कही गयी है । महा- देवाय--इस शब्द के अन्त में धीमहि है उससे आगे विद्या दूसरी कही गयी है । इसके अनन्तर तन्नो रुद्र--यह पद होता है। पीछे प्रतिष्ठा कही गयी है यह तृतीया है । प्रचोदयात् निवृत्ति है । उससे आगे सब ऐसी है जिनके आदि में प्रणव होता है। और अन्त में 'नमः--इस पद से अन्वित होती है । मन्त्रधारी पुरुष को चाहिए कि वह हृदय--ग्रीवा दोनों कन्धे, नाभि, कुक्षि, पुच्छ, वक्षः स्थल मेंने विधि के अनुसार अघोर आठ कलाओं का न्यास करे । अघोरों से तथा पूर्वमें प्रथवा काल कही गयी है ।६६-७२।
३८२ ] [ श्रीशारदा तिलक है । इसके उपरान्त घोरान्त में पीछे क्षमा होती है जिसको तृतीया कहा गया है । ।७३। 'घरतरों' से निद्रा होती है । सबसे सबमें तत्परा व्याधि पाँचवीं कही गयी है । इसके अनन्तर सब से मृत्यु छठवीं कही गई है । उसके आगे नमस्ते अस्तु क्षुधा सातवीं होती है । रुद्र रूपेभ्या कही गई तृषा आठवीं बतायी गयी है । इनके आदि में ध्रुव है और अन्त में ये नमः--इसमें समन्वित होती है । गुह्य, मुष्क, ऊरुयुग्म, दोनों जानु और जंघायें, स्फिच युगल, कटि, दोनों पार्श्व में त्रयोदश वाम कलाओं में न्यास करना चाहिए ।७४-७६। कठयां पार्श्वद्वये वावकला न्तस्तेत्तत्रयोदश ।७७ स्याज्ज्येष्ठाय नमो रक्षा द्वितीया परिकीर्त्तिता । स्याद्रुद्राय नमः पश्चात्ृतीया रति रीरिता ।७८ बालाय नमइत्यन्ते पालिनी परिकीर्त्तिता । कला कामा पञ्चमी स्यात्तनो विकरणाय च ।७६ मन संयमनी षष्ठी कथिता तदनन्तरम् । बलक्रिया समादिष्टा कला विकरणाय च ।८० नमोवृद्धिरष्टमी स्याद्वलान्ते च स्थिरा कला । पश्चात्प्रमथनायान्ते नमोरात्रिरुदीरिता ।८१ सर्वभूतद नाय नमौऽन्तेभ्रामणी कला । नमोऽन्ते मोहिनी प्रोक्ता मन्त्रैर्द्वादशी कला ।८२ ‘स्यात् ज्येष्ठाय नमो रक्षा’—यह द्वितीया कही है । ‘स्यात् रुद्राय नमः'—यह तीसरी रति कही गई हैं । ‘बलाय नमः’–इसके अन्त में मालिनी कीर्त्तिता की गई है । कला कामा पाँचवीं होती है । फिर ‘विकरणाय मनः संयमनी’ छठवी होती है । इसके अनन्तर बल क्रिया कला बतायी गई है । और विकरण के लिये नमो वृद्धि अष्टमी होती है। और बलान्त में स्थिरा कला होती है । पीछे 'प्रमथनाय' के अंत 'नमो रात्रि' कही गयी है ।७७-८१। ‘सर्वभूत दमनाथ नमः'—इसके
षोडश पटल ] [ ३८३ अन्त में भ्रामणी कला होती है । मन्त्रों के ज्ञान [रखने वालों के द्वारा नमः के अन्त में बारहवीं मोहिनी कला होती है ।८२। उन्मनाम नमः पश्चाज्जरा प्रोक्ता त्रयोदशी । प्रणवाद्याश्चतुर्थ्यन्ता नमोऽन्तास्ताः प्रकीर्तिताः ।८३ पाददोस्तननासासु मूर्ध्नि बाहुयुगे न्यसेत् । सद्योजातोद्भूवाः सभ्यगष्टौ मन्त्री कलाः क्रमात् ।८४ सद्योजातं प्रपद्यामि सिद्धिःस्यात्प्रथमा कला । सद्योजाताय वै भूयो नमः स्याद्वृद्धिरीरिता ।८५ भवेद्युतिस्तृतीया स्यादभवे तदन्तरम् । लक्ष्मीश्चातुर्थी कथिया ततो नातिभवे पदम् ।८६ मेधा स्यात्पञ्चमी प्रोक्ता कला भूयो भवस्वमाम् । प्रज्ञा समीरिता षष्ठो भवान्ते स्यात्प्रभा कला ।८७ उद्भवाय नमः पश्चात्स्वधा स्यादष्टमी कला । प्रणवाद्याश्चतुर्थ्यन्ताः कलाः सर्वा नमोन्विताः ।८८ उन्मनाम नमः-उसके पीछे जरा तेरहवीं कला कही गयी है । ये सब के आदि मे प्रणव वाली-चतुर्थी विभक्ति अन्त वाली है और इनके अन्त में नमः-यह पद कहा गया है ।८३। इनका पद-बाहु-स्तिमा नासिका-मूर्धा और दोनों बाहुओं में न्यास करना चाहिये । मन्त्रधारो पुरुष क्रमसे सद्योजातोद्भाव आठ कलाओं का न्यास करे ।८४।सद्योजात प्रपद्यामि-यह सिद्धि होती है-प्रथमा कला में । सद्योजायत वैभूयो नमः स्याहे--यह वृद्धि कही गई है ।८२। भवेद्युवि तीसरी होती है । इसके अनन्तर लक्ष्मी चौथी कही गयी है । इसके उपरान्त 'नातिमनेपदम् मेधा होती है--पांचवी कला कही है । फिर 'भवस्वमाम् प्रज्ञा' छठवीं बताई गई है । भवान्तमें प्रभा कला होती है ।८६-८७। 'उद्भववाय नमः पश्चात्'-यह स्वधा आठवीं कला है । सब कलायें नमः-इससे अन्वित ओर प्रणव के आदि वाली चतुर्थ्यन्त होती है ।८८। अष्टत्रिंशत्कलाः प्रोक्ताः पञ्चब्रह्मापदान्तिकाः । इति विन्यस्तदेहोऽसौ भवेन्द्रङ्गाधारः स्वयं ।८६
३८४ । । श्रीशारदा तिलक ततः समाहितो भूत्वा ध्यायेद्देवं सदाशिवम् ।६० मुक्तापीतपयोदमौक्तिकजपावर्णैर्मुखैः पञ्चभिः । त्र्यक्षैरञ्जितमीशमिन्दुमुकुटं पूर्णेन्दुकोटिप्रभम् । शूलं टङ्ककृपाणवज्रदहनन्नागेन्द्रघण्टाकुशान् । पाशं भीतिहरं दधानममिताकल्पोज्ज्वलं चिन्तयेत् ।६१ एवं ध्यात्वा जपेन्मन्त्रं पञ्चलक्षं मधुप्लुतैः । प्रसूनैः करवीरोत्थैर्जुहुयात्तद्दशांशकम् ६२ पूर्वोदिते यजेत्पीठे मूर्तिं मूलेन कल्पयेत् । आवाह्य पूजयेत्तस्या मूर्त्याद्यावरणैः सहः ।६३ ये अड़तीस कलायें कही गयी हैं इसमें पाँच ब्रह्म पदान्तिक हैं । इस रीति से देह में विन्यास किया हुआ पुरुष स्वयं गगा का आधार हो जाया करता है ।८६। अतएव परम सावधान होकर इस रीति से ही भगवान् सदाशिव का ध्यान करना चाहिए ।६०। अब ध्यान करने का प्रकार बतलाया जाता है--मुक्ता (मोती) पीत, पयोद, मौक्तिक और जपा के पुष्प के वर्णों वाले पांच मुखों से समन्वित है--तीन लोचनों से अञ्जित है-चन्द्र के मुकुट को धारण करने वाले हैं-- करोड़ों पूर्ण चन्द्रों की प्रभा से संयुत है--अपने कर कमलों के द्वारा शूल, टङ्क, कृपाण, वज्र, दहन, नागेन्द्र, धारा, कुश, पाश, भीति का हरण को धारण करते हुये-अमित कल्पोज्ज्वल ईश का चिन्तन करना चाहिए ।६१। इस रीति से ध्यान करके पाँच लाख मन्त्र का जप करे और मधुर से प्लुत करवीरों के पुष्पों से जप का दशांश होम करना चाहिए ।६२। सूर्य के उदित होने पर पीठ में यजन करे । और मन्त्र के मूल भाग के द्वारा मूर्त्ति की कल्पना करनी चाहिए । उसमें आवाहन करके मूर्त्यादि आवरणों के सहित पूजन करे ।६३। शक्तिं डमरुकाभीतिवरान्सन्दधतं करैः । ईशानं त्रीक्षणं शुभ्रमैशान्यां दिशि पूजयेत् ।६४
षोडश पटल ] [ ३८५ अक्षस्रजं मृगपाशौ सृणि डमरुकं ततः । खट्वागं निशितं शूलं कपालं बिभ्रतं करैः ।६५ परश्वेणवराभीतीर्दधानं विद्युदुज्ज्वलम् । चतुर्मुखं तत्पुरुषं त्रिनेत्रं पूर्वतोऽर्चयेत् ।६६ अब्जनाभ चतुर्वक्त्रं भीमदष्ट्रं भयावहम् । अघोरं त्रीक्षणं याम्ये पूजयेन्मन्त्र वित्तमः ।६७ कुंकुमाभं चक्रवक्त्रं वामदेवं त्रिलोचनम् । वराभयाक्षवलयकुठारं दधतं करैः ।६८ विलासिन् स्मेरवक्त्रं सौम्ये सम्यक्समर्चयेत् । कर्पूरेन्द्रनिभं सौम्यं सद्योजात त्रिलोचनम् ।६६ हरिणाक्षगुणाभीतिवरहस्तं चतुर्मुखम् । बालेन्दुशेखरोल्लासि मुकुटं पश्चिमे यजेत् ।१०० करों के द्वारा डमरू—शक्ति अभयदान और वरदान को धारण करते हुए—तीन नेत्रों से युक्त और परम शुभ्र ईशान देव का ईशानी दिशा में अर्चन करना चाहिए ।६४। कर कमलों में अक्ष, स्रज, मृग, पाश, सृणि, डमरू, खट्वांग, निशित, शूल और कपाल को धारण करने वाले हैं। परशु—ऐश—वर और अभय को धारण किये हुए हैं और विद्युल्लता के समान उज्ज्वल स्वरूप से युक्त है । चार मुखों से युक्त- तीन नेत्रों वाले तत्पुरुष का पूर्व में अर्चन करना चाहिए ।६५-६६। नाभि में अब्ज को रखने वाले, चार मुखों से युक्त, भीषण दाढ़ों वाले, भयदाता, तीनों नेत्रों से युक्त अघोर मन्त्र के ज्ञाता पुरुष का याम्य दिशा में पूजन करना चाहिए ।६७। कुंकुम के तुल्य आभा से युक्त, चार मुखों वाले, तीन लोचनों से युक्त, कर कमलों द्वारा वर अभय, अक्षयमाला और कुठार को धारण करते हुए, विलासी, स्मेर युक्त मुख वाले वामदेव का सौम्य दिशा में भली भाँति अर्चन करे ।६८। कर्पूर और इन्दुके तुल्य-सौम्य-विलोचन-हरिण, अक्षमाला, अभय और वरदान को हाथों में रखने वाले-बाल चन्द्रके शेखरसे उल्लसित मुकुट
३८६ ० ] [ श्री शारदा तिलक धारी-चार मुखों से युक्त सद्योजात का पश्चिम में यजन करना चाहिए । ।६६-१००। निवृत्त्याद्यास्ततः कोणे तेजोरूपाः कलाः क्रमात् । केसरेषु षडङ्गानि पूर्ववत्पूजयेत्सुधी ।१०१ विश्वेश्वराननन्ताद्यान्पत्त्रेषु परितो यजेत् । उमादिकास्ततोबाह्ये शक्राद्यानायुधैः सह ।१०२ इति संपूज्य देवेशं भक्त्या परमया युतः । प्रीणयेन्नृत्यगीताद्यै स्तोत्रै र्मन्त्रैर्मनोहरैः ।१०३ तारो माया वियद् बिन्दुमनुस्वरसमन्वितम् । पंचाक्षरसमायुक्तो वसुवर्णो मनुर्मतः ।१०४ पंचाक्षरोक्तवत्कुर्यादङ्गन्यासादिकं बुधः ।१०५ सुधी को चाहिए वह फिर तेज के स्वरूप वाली निवृत्ति आदि कलाओं का क्रम से कोण में पूजन करे और केसरोंमें षडङ्गों का अर्चन करना चाहिए ।१०१। पत्रों में सब ओर विश्वेश्वर-अनन्त आदि का यजन करे । फिर उमादिक का अर्चन बाहर आयुधों के सहित इन्द्र आदि का अभ्यर्चन करना चाहिए ।१०२। इस प्रकारसे परम भक्ति की भावना से संयुत होकर देवेश्वर का भली भाँति पूजन करे । और फिर नृत्य गीत आदि स्तोत्रों के द्वारा तथा मनोहर मन्त्रों के द्वारा देवेश्वर को प्रीणित करे ।१०३। अब आठ अक्षरों वाले प्रसाद मंत्र का उद्धार बतलाते हैं । तार-प्रणव, माया-शक्ति का बीज, वियत्—हः, जो हकार बिंदु और अनुस्वार से संयुत होवे । यह मंत्राक्षरों से समन्वित आठ अक्षरों वाला मंत्र माना गया है ।१०४। बुध को चाहिए कि वह पंचा- क्षर में कहे हुए की ही भाँति अङ्ग न्यास आदि सब करे ।१०५। बन्दे सिन्दूरवर्णं मणिमुकुटलसच्चारुचन्द्रावतसम् । भालोद्यन्नेत्रमीशं स्मितमुखकमलं दिव्यभूषाङ्गरागम् । वामोरुन्यस्तपाणेररुणकुवलयं सन्दधत्याः प्रियायाः । वृत्तोत्तुङ्गस्तनाग्रे निहितकरतलं वेदटङ्केऽष्टहस्तम् ।१०६
षोडश पटल ] [ ३८७ अष्टलक्षं जपेदेनं मनुं मनुविदाम्बरः । तत्सहस्रं प्रजुहुयात्पायसान्न्र्घृतप्लुतैः १९०७ प्राक् पीठे मूलमन्त्रेण मूर्तिं संकल्प्य पूजयेत् । अङ्गै रावरौ पूवमनन्ताद्यै रनन्तरम् १९०८ उमादिभिः समुद्दिष्टं तृतीयं लोकनायकैः । चतुर्थं पञ्चमं तेषामायुधैः परिकीर्तितम् १९०६ एवं प्रतिदिनं देवं पूजयेत्साधकोत्तमः । पुत्र मित्रादिसहितां श्रियं प्राप्य प्रमोदते ।११० अब ध्यान बतलाते हैं—सिंदूर के समान वर्ण वाले, मणियों के मुकुट के समान चारु चन्द्रमा के अवतंस से विभूषित, भाल में उदीय- मान नेत्र से युक्त, मुस्कराहट से युत मुख वाले, दिव्यभूषा और अङ्ग राग से समन्वित, बांये उरु पर हाथ रखने वाली, अरुण कुवलय को करने वाली प्रिया के वृत्त ओर उत्तुङ्ग स्तनों के अग्रभाग में करतल को रक्खे हुए, दश हस्त में अष्ट हस्त वाले ईश की मैं वन्दना करता हूँ ।१०६। मंत्रों के ज्ञाता पुरुष को इस मंत्र का आठ लाख जप करना चाहिए। उस जप का दशांश सहस्रों का घृत में प्लुत पायसान्नों के द्वारा होम करना चाहिए ।१०७। पूर्व पीठ पर मूल मंत्र के द्वारा मूर्ति की कल्पना करके अभ्यर्चन करना चाहिए। इसके अनन्तर अमन्तादि अङ्गों से अनन्तर में आवरण पूजन करे ।१०८। यह उमादि के द्वारा समुद्दिष्ट किया है। तृतीय लोक नायकों से—चौथा और पाँचवा उनके आयुधों के द्वारा कीर्त्तित किया गया है ।१०६। इस प्रकार से साधकों में श्रेष्ठ पुरुष को प्रतिदिन देव की पूजा करनी चाहिए। वह पुरुष पुत्र मित्रादि के सहित श्री की प्राप्ति करके प्रमुदित होता है ।११० तारः स्थिरा सकणंन्दुर्भुगुः सर्गविभूषितः । अक्षरात्मा निगदितो मनुर्मृत्युञ्जयादिकः ।१११ ऋषिः कहोलोदेव्यादिगायत्रीच्छन्द ईरितम् । मृत्युञ्जयो महादेवो देवतास्य सुमीरितः ।११२