शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 380, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें३८० ] [ श्रीशारदा तिलक न्यास करे ।५८। मूर्द्धा, मुख, हृदय, गुह्य, पाद में उनका पुनः ऊर्ध्वादि वक्त्रोंमें न्यास करे । फिर अंगोंकी कल्पना करनी चाहिए । तार पंचक का समुच्चारण करके सर्वज्ञायःयह हृदय कहा गया है । फिर मृते तेजो मालिनि तृप्ताह--'यह पद कहे उसके अन्त में 'ब्रह्म शिर से' शिर है 'अंग ज्वलित शिख शिखाय' इसके आगे 'अनादि बोधाय' यह उसकी शिखा है ।५६-६१। 'वज्रिणे वज्रहस्ताय स्वतन्त्राय'-यह तनुच्छदहै। सौ वौं ह्रौं--यह कहकर आगे 'अलुप्त शक्तये नेत्र' कहा गया है । 'श्लीं पशु हूँ फट्' और अन्त में 'अनन्त शक्तये'--यह अस्त्र बताया गया है । इस प्रकार श्रेष्ठ विधि से षडंगों को करे ।६२-६३। पूर्वदक्षिणपाश्चात्यसोममध्येपु पंचसु । वक्त्रेषु पञ्च विन्यस्येदीशानस्य कलाः क्रमात् ।६४ ईशानः सर्वविद्यानां शशिनी प्रथमा कला । ईश्वरः सर्वभूतानामङ्गदा तदनन्तरम् ।६५ ब्रह्माधिपतिशब्दते ब्रह्मणोऽधिपतिः पुनः । ब्रह्मेष्टदा तृतीया स्याच्छिवी में अस्तुतत्परः ।६६ मरीचिः कथितस्तन्त्वे चतुर्थी च सदाशिवोम् । अंशुमालिन्यथपरा प्रणवाद्या नमोऽन्विताः ।६७ पूर्वपश्चिमयाम्योदग्वक्त्रे षु तदन्तरम् । चतस्रो विन्यसेन्मन्त्री पुरुषस्य कलाः क्रमात् ।६८ पूर्व, दक्षिण, पश्चिम, सोम के मध्यों में पाँच वक्त्रों में ईशान की कलाओं का क्रम में विन्यास करना चाहिए ।६४। ईशान सब विद्याओं की शशिनी प्रथमा कला है। सब भूतों का अंगदा इसके अनन्तर में है । 'ब्रह्माधिपति, शब्दके अन्तसे ब्रह्माका अधिपति यह ब्रह्मेष्टदा तीसरी कला होती है । 'शिवो में अस्तु त्पर मरीचि मन्त्र में कहा गया है। यह चौथी सदा शिवी कला होती है । 'अंशुमालिनी' अन्य कला है जिनके आदि में प्रणव तथा अन्त नमः--इस में समन्वित है ।६४-६५। इसके