भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 381, कुल 511 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 381

षोडष पटल ] [ ३८१ अनन्तर पूर्व पश्चिम दक्षिण उत्तर में रहने वाले मुखों में पुरुष की चारों कलाओं का मन्त्रधारी पुरुष विन्यास करे ।६८। आद्या तत्पुरुषायेति विद्महे शान्तिरीरिता । महादेवाय शब्दान्ते धीमहि स्यात्ततःपरम् ।६६। विद्या द्वितीया कथिता तन्नो रुद्रः पदं ततः । प्रतिष्ठा कथिता पश्चात्त्ृतीया स्यात्प्रचोदयात् ।७० निवृत्तिस्तत्पराः सर्वाः प्रणवाद्या नमोऽन्विताः । हृद्ग्रीवांसद्वयेनाभौ कुक्षौ पुच्छेऽथ वक्षसि ।७१ अघोरस्य कला न्यस्येदष्टौ मन्त्री यथाविधि । अघोरेभ्यस्तथा पूर्वमीरिता प्रथमा कला ।७२ अवघोरेभ्य इत्यन्ते मोहा स्यात्तदनन्तरम् । घोरान्ते स्यात्क्षमा पश्चात्त्ृतीया परिकीर्तिता ।७३ घोरतरेभ्यो निद्रा स्यात्सर्वतः सर्वतत्परा । व्याधिस्तु पञ्चमी प्रोक्ता सर्वेभ्यस्तदनन्तरम् ।७४ मृत्युर्निगादिता षष्ठी नमस्ते अस्तु तत्परम् , क्षुधा स्यात्सप्तमी रुद्ररूपेभ्यः कथिता तृषा ।७५ अष्टमी कथिता एतद् ध्रुवाद्या नमसाऽन्विताः । गुह्यमुष्कोरुयुग्मेषु जानुजंघायुगे स्फिचो. ।७६ आद्या तत्पुरुषाय यह है । विद्महे शान्ति कही गयी है । महा- देवाय--इस शब्द के अन्त में धीमहि है उससे आगे विद्या दूसरी कही गयी है । इसके अनन्तर तन्नो रुद्र--यह पद होता है। पीछे प्रतिष्ठा कही गयी है यह तृतीया है । प्रचोदयात् निवृत्ति है । उससे आगे सब ऐसी है जिनके आदि में प्रणव होता है। और अन्त में 'नमः--इस पद से अन्वित होती है । मन्त्रधारी पुरुष को चाहिए कि वह हृदय--ग्रीवा दोनों कन्धे, नाभि, कुक्षि, पुच्छ, वक्षः स्थल मेंने विधि के अनुसार अघोर आठ कलाओं का न्यास करे । अघोरों से तथा पूर्वमें प्रथवा काल कही गयी है ।६६-७२।