भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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३८२ ] [ श्रीशारदा तिलक है । इसके उपरान्त घोरान्त में पीछे क्षमा होती है जिसको तृतीया कहा गया है । ।७३। 'घरतरों' से निद्रा होती है । सबसे सबमें तत्परा व्याधि पाँचवीं कही गयी है । इसके अनन्तर सब से मृत्यु छठवीं कही गई है । उसके आगे नमस्ते अस्तु क्षुधा सातवीं होती है । रुद्र रूपेभ्या कही गई तृषा आठवीं बतायी गयी है । इनके आदि में ध्रुव है और अन्त में ये नमः--इसमें समन्वित होती है । गुह्य, मुष्क, ऊरुयुग्म, दोनों जानु और जंघायें, स्फिच युगल, कटि, दोनों पार्श्व में त्रयोदश वाम कलाओं में न्यास करना चाहिए ।७४-७६। कठयां पार्श्वद्वये वावकला न्तस्तेत्तत्रयोदश ।७७ स्याज्ज्येष्ठाय नमो रक्षा द्वितीया परिकीर्त्तिता । स्याद्रुद्राय नमः पश्चात्ृतीया रति रीरिता ।७८ बालाय नमइत्यन्ते पालिनी परिकीर्त्तिता । कला कामा पञ्चमी स्यात्तनो विकरणाय च ।७६ मन संयमनी षष्ठी कथिता तदनन्तरम् । बलक्रिया समादिष्टा कला विकरणाय च ।८० नमोवृद्धिरष्टमी स्याद्वलान्ते च स्थिरा कला । पश्चात्प्रमथनायान्ते नमोरात्रिरुदीरिता ।८१ सर्वभूतद नाय नमौऽन्तेभ्रामणी कला । नमोऽन्ते मोहिनी प्रोक्ता मन्त्रैर्द्वादशी कला ।८२ ‘स्यात् ज्येष्ठाय नमो रक्षा’—यह द्वितीया कही है । ‘स्यात् रुद्राय नमः'—यह तीसरी रति कही गई हैं । ‘बलाय नमः’–इसके अन्त में मालिनी कीर्त्तिता की गई है । कला कामा पाँचवीं होती है । फिर ‘विकरणाय मनः संयमनी’ छठवी होती है । इसके अनन्तर बल क्रिया कला बतायी गई है । और विकरण के लिये नमो वृद्धि अष्टमी होती है। और बलान्त में स्थिरा कला होती है । पीछे 'प्रमथनाय' के अंत 'नमो रात्रि' कही गयी है ।७७-८१। ‘सर्वभूत दमनाथ नमः'—इसके